साठ का दशक : तब जगदलपुर से भोपालपटनम तक का सफर का मतलब…

बस्तर संभाग के वरिष्ठ पत्रकार एस करीमुद्दीन ने अपने यादों के झरोखे से बीते बस्तर की तस्वीर बताई है… जिसे सुधि पाठकों के लिए प्रस्तुत किया गया है।

जगदलपुर से भोपालपटनम तक का सफर बड़ा रोमांचक रहा करता था. 60 के दशक तक. सुबह आठ बजे जगदलपुर से आनंद ट्रान्सपोर्ट कंपनी की एक बस चलती थी, जो रात आठ बजे के बाद करीब 12 घंटे की लगातार यात्रा के बाद भोपालपटनम पहुंचती थी. बीजापुर से भोपालपटनम तक की यात्रा के लिए नैमेड़ के हेमंनदास सेठ की एक बस चला करती थी जो कोयले से संचालित थी ठीक उस काल की रेलगाडि़यों की तरह जो वाष्प इंजन से संचालित हुआ करती थीं.
मेरे पिताजी बीजापुर और भोपालपटनम क्षेत्र से रेंजर थे अतः हमारे परिवार का जगदलपुर से इस मार्ग पर आना जाना बना रहता था मुझे अच्छी तरह याद है जब हम जगदलपुर से बीजापुर जाते थे रास्ते में जंगली जानवर सहज ही दिखाई देते थे जब हम भैरमगढ़ के करीब पहुंचते थे वहां एक बहुत बड़ा चढ़ाव था जिसे पार करने के लिए बस को बारंबार आग,े पीछे करना पड़ता था जिसकी आवाज भैरमगढ़ तक पहंुचती थी और लोग समझ जाते थे कि अब बस आ रही है. इस रास्ते में पड़ने वाली मरी नदी को पार करना तब इतना सहज नही था. बारिश के दिनों में नाव से पार करना पड़ता था एक बस नदी के दुसरे पाट पर रहती थी और एक बस इधर क्योंकि मरी नदी पर पुल नही बना था
भैरमगढ़ से माटवाड़ा तक का सफर जोखिम भरा हुआ करता था रास्ते के दोनों ओर घने जंगल जिसके कारण सूरज की किरण भी जमीन पर नही पड़ती थी इसी रास्ते में कभी कभी गवर और वन भैसा बस को घंटों रोक देते थे बस के सामने खड़े हो जाते थे कभी-कभी ये सींग से बस को मारने लगते थे. इससे सारे यात्री सहम जाते थे मैने यह नजारा अपनी आंखों से देखा है. इसी तरह भोपालपटनम से बीजापुर के सफर में घाट शुरू होते ही चीतल, सामर, आदि जंगली जानवर दिखाई पड़ने लगते थे. घाट उतरते ही, जहां आज मंदिर बना हुआ है उस जगह हमेशा बाघ दिखता रहा है. लगातार भोपालपटनम तक जानवर दिखाई देते थे. रास्ते में कई स्थान ऐसे थे जहां पर जमीन को या सड़क को सूर्य की किरणें छू भी नही पाती थी अर्थात जंगल इतना घना की नीचे जमीन पर दिन में भी अत्यन्त कम नाम मात्र का उजाला नजर आता था सड़क के दोनों ओर फल दार वृक्षों खास कर आम के वृक्षों की मीलों लंबी कतार बस के घंटों लंबे सफर को सुखद, सुहाना और यादगार बना देता था. जब भी कभी एकान्त शांत चित बैठकर हम उन बीते दिनों को और उन दिनों के सहज स्वाभाविक माहौल का स्मरण करते है तो आज भी हमारी आंखों के सामने वह सुहाना मंजर कौंध जाता है. जिसकी आज के परिवेश में कल्पना तक नहीं की जा सकती यह सब कुछ हमें यह सोचने के लिए मजबूर करता है कि वास्तव में हमने सुख, सुविधा, संपन्नता व संसाधन पाने की दौड़ में क्या-क्या खोया है। (क्रमशः) (एस. करीमुद्दीन,लेखक बस्तर के वरिष्ठ पत्रकार है.)

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