इधर कोरोना जांच को लेकर हाय तौबा… राज्य सरकार कलेक्टरों को नियुक्ति का दे रही अधिकार और… दंतेवाड़ा में पैथालॉजिस्ट ने छ़ोड़ दी नौकरी…

  • सोशल मीडिया से…

दंतेवाड़ा के पत्रकार शैलेंद्र ठाकुर ने आज शाम फेसबुक पर एक पोस्ट डाली है कि दन्तेवाड़ा में प्रशासनिक अफसर की बदसलूकी के चलते जिला हॉस्पिटल के पैथोलॉजिस्ट डॉ दीपेंद्र भदौरिया ने नौकरी छोड़ी।

इस पोस्ट के मुताबिक पैथा​लॉजिस्ट को बीते 3 माह की सैलरी भी नही दी। इस मेडिकल कर्मी के साथ दंतेवाड़ा जिले में बीते दिनों लगाए गए धनीकरका मेगा हेल्थ कैम्प में जॉइंट कलेक्टर ने बदसलूकी की थी। जिसके बाद उसकी सैलरी का मामला भी अटका दिया गया।

परिणाम
इधर कोरोना का खतरा मंडरा रहा है और दंतेवाड़ा जिला हास्पिटल में अब ब्लड बैंक बंद होने की कगार पर पहुंच गया है। इसी पोस्ट पर दावा किया गया है कि इस संविदा कर्मी की सेवा रिन्यूअल के लिए राशि की डिमांड की गई थी।

क्या कहते हैं कलेक्टर

इस मामले को लेकर जब कलेक्टर टोपेश्वर वर्मा से सीजी इम्पेक्ट ने चर्चा की तो उन्होंने कहा कि ऐसे किसी घटना की जानकारी उन्हें नहीं दी गई है। फिलहाल एस्मा लगा हुआ है। वे इस संबंध में पता लगाएंगे और जरूरी कार्रवाई करेंगे।

सोशल मीडिया में आम लोगों के कमेंट्स

संपत झा लिखते हैं :
बस्तर में अफसरशाही ने ही बहाना बनाकर रखा है अन्यथा ऐसा नही है कि बस्तर की खाली पोस्ट में भर्ती न हो सके सिर्फ दंतेवाड़ा ही नही पूरा बस्तर का हाल है…

अफसर पढ़े लिखे सुविधा सम्प्पन होते है शायद बुरा मान जाए, आप जनप्रतिनिधियों से बात कीजिये शायद वो समझे जनता के मत से चुने हुए है। नही सुनते तो अखबार में जगह दीजिये…

विनोद सिंह लिखते हैं :
दीपेंद्र का बचपन यही गुजरा है।इसलिये उसे दन्तेवाड़ा से ज्यादा लगाव रहा है। जो भी हुआ अच्छा नही हुआ।हम सब को मिलकर इसकी शिकायत मुख्यमंत्री विधायक और प्रभारी मंत्री से करनी चाहिये।

मुकेश दिल्लीवार लिखते हैं :
ब्यूरोक्रेट्स तथा बाबू नामक प्रजाति की दादागिरी और भर्रा शाही तो पूरे प्रदेश में कुकुरमुत्ता की तरह व्याप्त है और यह लाइलाज और बेलगाम भी हो चुका है…

राजेंद्र ठाकुर लिखते हैं :
विपदा की इस घड़ी में साक्षात देवदूत बनकर कार्य कर रहे सभी आपातकालीन सेवाओ, स्वास्थ्य विभाग के सभी कर्मचारी, अधिकारियों को कोटि कोटि नमन है। पर हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि वे भी एक आम मनुष्य भी हैं, उनका भी अपना 1 परिवार है, उन्हें भी थोड़ा सा आराम चाहिए जिससे वे फिर से अपनी पूरी ऊर्जा के साथ मानव समाज के कल्याण में जुट सकें पर अफ़सोस की उन्हें मशीन समझ लिया जाता है और उनकी निजी समस्या पर अक्सर लोग ध्यान नहीं देते हैं।

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