बस्तर : सरकार के एजेंडा में नक्सली, खदान और विकास…

दबी जुबां से…/ सुरेश महापात्र

सरकार ‘विकास’ के एजेंडे पर काम करती है और माओवादी आदिवासियों के ‘विश्वास’ के एजेंडे पर टिके हैं…

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सरकार के 10 माह पूरे हो गए हैं। बीते दस माह में बहुत से बड़े फैसले लिए। कई बड़े फैसले लेते दिखती भूपेश सरकार अभी भी वैसा महसूस नहीं करा पा रही है जैसा अपेक्षित है, ऐसा लगता है कि कुछ कमी सी है। 90 सदस्यीय विधान सभा में अब 69 सीटें जीताकर कांग्रेस को जनता ने एक तरफा जनादेश दिया है। उपचुनाव के बाद बस्तर की अधूरी बाजी भी कांग्रेस ने पूरी तरह जीत ली है। पूरे 12 के 12 विधायक अब कांग्रेस के पास हैं। ऐसे में आम लोगों की उम्मीदों का परवान चढ़ना स्वाभाविक है।

एक बात तो तय है कि बस्तर हिंदुस्तान का सबसे संवेदनशील संभाग है। इसके सातों जिले माओवाद प्रभावित हैं। केंद्र सरकार भी बस्तर पर फोकस करते दिख रही है। हाल ही में केंद्रीय गृहसचिव ने जगदलपुर में बैठक लेकर हालात का जायजा लिया। वैसे यह भी पहली बार नहीं है। पूर्व में भी ऐसी कई बैठकें हो चुकी हैं।

इस बार की बैठक में बड़ी बात यह है कि केंद्र में अमित शाह जैसे कुशल राजनीतिज्ञ गृहमंत्री की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। उनकी कार्यशैली को लेकर पहले से ही यह अपेक्षित है कि अगर उन्होंने कह दिया कि समस्या खत्म का मतलब समस्या खत्म…! अब यह कब तक खत्म होगा वे ही जानें…

इसके उलट यह समझना जरूरी है कि बस्तर की समस्या अन्य आतंकवाद प्रभावित क्षेत्रों से अलग किस्म की है। बस्तर में आदिवासी समुदाय के साथ ‘विकास और विश्वास’ की बुनियादी लड़ाई है। सरकारें ‘विकास’ के एजेंडे पर काम करती हैं और माओवादी आदिवासियों के ‘विश्वास’ के एजेंडे पर टिके हैं।

डिपाजिट—13 में अडानी की कंपनी ‘एईएल’ के खनन संबंधित ठेके पर विवाद थमता नहीं दिख रहा है। इस विवाद के पीछे माओवादियों की संलिप्तता को लेकर किसी को संशय नहीं है। सब कुछ आसान है की तर्ज पर अडानी की कंपनी विवाद से पहले जिस तेजी के साथ बस्तर के जंगल में कूदती—फांदती घुसी थी, अब वह भी हौले से कदम रखने पर विश्वास कर रही है।

आंदोलन और विवाद के बाद फर्जी ग्राम सभा की शिकायतों पर जिला प्रशासन की गठित प्रशासनिक कमेटी की जांच चल रही हैं। निर्णय राज्य सरकार के पाले में है। ऐसे में सीएमडीसी और एनएमडीसी के साझा उपक्रम ‘एनसीएल’ की गतिविधियां भी थमी सी ही हैं।

नक्सलवाद के बस्तर से खात्मा की तैयारी के बीच बैलाडिला की खदानों में बहुत कुछ बदलता हुआ दिख रहा है। मसलन एस्सार स्टील से आर्सेलर मित्तल का सौदा करीब—करीब तय हो चुका है। जिंदल की प्रास्पेक्टिंग लीज की अवधि पूरा होने से पहले ही माइनिंग लीज की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। यानी लौह अयस्क के खदानों को माओवाद मुक्त किए बगैर वहां विकास की राह आसान नहीं है। इसके लिए समुचित ताकत का इंतजाम और उपयोग की रणनीति की दिशा में काम करने की स्थिति साफ दिखाई दे रही है।

सो यदि केंद्र सरकार अपनी पूरी ताकत लगाकर बस्तर को नक्सल मुक्त करने की दिशा में कदम उठा रही है तो परिणाम आने तक इंतजार करना होगा। आगामी समय में बस्तर में नया रण होगा। जिसमें सरकार के ‘विकास और माओवादियों के विश्वास’ के दरमियां फैसले सुनाए जाएंगे।

बड़ी बात…

कोई मानें या ना मानें राज्य में सरकार बदलने के बाद एनएमडीसी को थोड़ी दिक्कत तो हो ही रही है। क्योंकि पूर्व मुख्यमंत्री के करीबी एन बैजेंद्र कुमार सीएमडी हैं उन्हें राज्य सरकार को विश्वास में लेने के लिए ‘हां’ और ‘ना’ के मध्य में च्वाईस थी। पर कांग्रेस की सरकार में सीएम भूपेश बघेल की ‘हां’ हासिल करने के लिए थोड़ी एनएमडीसी को नरमी बरतना मजबूरी हो गया है। डिपाजिट—13 के विवाद में एनएमडीसी का काम ठप होने के बाद सीएमडी की मुलाकात रंग लाई। तब भी भूपेश बघेल कुछ बातें मनवाने में कामयाब रहे। सरकार को अब भी ऐसे ही अवसर की तलाश रहेगी। आज ही राज्य सरकार ने केंद्रीय मंत्री से एनएमडीसी के बस्तर में मुख्यालय को लेकर अपनी मांग रख दी है।

और अंत में…

एनएमडीसी को 2020 में खत्म हो रहे लीज के लिए सरकार की सहमति चाहिए थी। वह मिल गई पर इसके लिए सीएमडी ने जिस प्रोजेक्ट को करीब दो बरस तक टालकर रखा था उसे एक्सेप्ट करना पड़ा। सीएमडी 1200 करोड़ के हाउसिंग प्रोजेक्ट को करीब—करीब इंकार कर चुके थे। वे चाहते थे कि इस प्रोजेक्ट को एनएमडीसी ही करे। पर सरकार ने इस प्रोजेक्ट को राज्य सरकार के हाउसिंग बोर्ड के अधीन करवाने के लिए सहमति ले लिया। यानी बस्तर में जो कुछ हो रहा है वह सब कुछ सौदे में शामिल है। इसी तरह से आने वाले समय में राज्य सरकार और केंद्र सरकार के बीच मची रार भी सौदे से ही हल होने के आसार हैं…

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