Friday, January 23, 2026
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तो यह तय मान लेना चाहिए कि नक्सल मुक्त बस्तर की डेडलाइन 31 मार्च 2026 ही है…

सुरेश महापात्र। नक्सल मोर्चे पर अविश्वसनीय सफलता के बाद माओवादियों का गढ़ ढहता दिखाई दे रहा है। बस्तर में बड़ी तेजी के साथ परिस्थितियाँ बदलती दिखाई देने लगी। इसके पीछे का रहस्य एक ऐसी कहानी है जो न केवल रणनीतिक कौशल और नेतृत्व की दृढ़ता को दर्शाती है, बल्कि सामाजिक-आर्थिक बदलाव और स्थानीय समुदायों के विश्वास को जीतने की शक्ति को भी उजागर करती है। छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में नक्सलवाद का खात्मा लंबे समय से एक असंभव सपना माना जाता था। यह क्षेत्र माओवादियों का गढ़ रहा है, जहां

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नहीं लगता शांति वार्ता की जरूरत है… बशर्ते?

विशेष टिप्पणी। सुरेश महापात्र। बस्तर में माओवादियों के साथ संघर्ष का लंबा इतिहास रहा है। इसमें ना जाने कितने लोगों की मौत दर्ज है। किसे शहीद कहें और किसे मौत? यह भी बड़ा सवाल रहा है। चार दशक पुराने इस माओवादी इतिहास में बस्तर एक अघोषित युद्ध क्षेत्र की तरह ही रहा है। अब पहली बार ऐसा साफ दिखाई दे रहा है कि बस्तर में लंबे समय तक बैकफुट पर रहे सशस्त्र बलों का आत्मबल कामयाबी से बढ़ा है। हर उस इलाके में सशस्त्र बलों का अब दबदबा साफ दिखाई

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भ्रष्टाचार के मामले और अदालतों की क्लीन चिट… क्या आरोप महज राजनीति का हिस्सा थे?

विशेष टिप्पणी। सुरेश महापात्र। यूपीए यानी यूनाईटेड प्राग्रेसिव अलायंस की सरकार पहली बार 2004 में चुनकर आई। इसके बाद एक सबसे बड़ी बहस ने जन्म लिया कि क्या यूपीए के प्रमुख होने के कारण कांग्रेस के सर्वोच्च नेता सोनिया गांधी अब प्रधानमंत्री बन सकतीं हैं। सवाल आसान था और जवाब उतना ही कठिन क्योंकि तब प्रमुख विपक्षी दल की ओर से सुषमा स्वराज, उमा भारती ने यह तक ऐलान कर दिया कि यदि सोनिया गांधी भारत की प्रधानमंत्री बनती हैं तो वे अपना सिर मुंडवा लेंगीं। पूरे देश में गहमा—गहमी

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छत्तीसगढ़ : नक्सल मोर्चे पर अंतिम लड़ाई! क्या बस्तर में रुक पाएगी हिंसा?

दिवाकर मुक्तिबोध। साल 2015 में बीबीसी से बातचीत के दौरान छत्तीसगढ़ के तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉक्टर रमनसिंह ने कहा था, ‘नक्सली धरती माता के सपूत हैं और उनका मुख्य धारा में बच्चों की तरह स्वागत होगा.’ उन्होंने यह बात वार्ता की संभावना के मद्देनजर कही थी. उनका यह कथन अनायास इसलिए याद आ रहा हैं, क्योंकि बस्तर में केन्द्र व राज्य सरकार का नक्सलियों के खिलाफ जो चौतरफा अभियान चल रहा है, उसका एक महत्वपूर्ण हिस्सा नक्सलियों को मुख्य धारा में लाना भी है. रमनसिंह की सरकार में सबसे ज्यादा नक्सली

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Kanak Tiwari ने पत्रकारिता पर दो अत्यंत महत्वपूर्ण आलेख लिखे… भारतीय पत्रकारिता के मौजूदा दौर पर यह लेख और उसकी टिप्पणियां संजोकर रखने लायक हैं…

फेसबुक वॉल से… सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर हर तरह के लोग और समूह हैं। कुछ विचारवान लेखक, पत्रकार और वैचारिक तौर पर विचारधारा से जुड़े प्रख्यात लेखक भी इसका हिस्सा हैं। इनमें से एक ऐसे ही गांधीवादी और कांग्रेस विचारधारा से जुड़े वरिष्ठ अधिवक्ता, पूर्व पत्रकार, लेखक और प्रखर विचारशील वक्ता कनक तिवारी भी हैं। दर्जनों पुस्तकें लिखीं हैं। इन्होंने दो खंडों में भारतीय पत्रकारिता की वर्तमान दशा और दिशा पर लेख लिखा। इस लेख को वरिष्ठ पत्रकार रूचिर गर्ग ने अपनी वॉल पर शेयर किया। इस लेख को पढ़ने

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‘धाकड़’ सरकार को सांसदों की जरूरत ही नहीं…

सुरेश महापात्र। जिन लोगों का जन्म मेरी तरह 1971 के बाद हुआ है उनके लिए इस वक्त सबसे बड़ा वक्त है। वे अपनी आंखों से सरकार की ताकत देख सकते हैं। क्योंकि इससे पहले जन्म लेने वाले ज्यादातर ने इंदिरा के युग को देख ही लिया होगा यह माना जा सकता है। हिंदुस्तान में कांग्रेस पर इस बात को लेकर आरोप लगता रहा है कि इसने हिंदुस्तान में 70 बरस तक अपनी सरकार चलाई। इसके साथ ही यह भी आरोप लगता रहा है कि इतने ही बरस तक नेहरू और

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