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छत्तीसगढ़ में भाजपा की सेकेंड लाइन पॉलिटिक्स और डा. रमन सिंह का भविष्य

सुरेश महापात्र। छत्तीसगढ़ में हाल ही में हुए मंत्रिमंडल विस्तार ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की राजनीतिक रणनीति को एक बार फिर स्पष्ट कर दिया है। यह विस्तार न केवल क्षेत्रीय और जातिगत संतुलन को मजबूत करने की कवायद है, बल्कि यह भी संदेश देता है कि पार्टी अब अपनी दूसरी पंक्ति के नेतृत्व को आगे बढ़ाने पर केंद्रित है। इस प्रक्रिया में नए चेहरों को मौका दिया गया है, लेकिन पुराने दिग्गजों को मंत्रिमंडल में शामिल न किए जाने से कई सवाल उठ रहे हैं। खास तौर पर, अब

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सरकार की योजनाओं का नतीजा अब समर्पण करने सामने आ रहे नक्सली लीडर…

बस्तर में चल रही है छत्तीसगढ़ में माओवाद के खिलाफ निर्णायक लड़ाई… विशेष संपादकीय। सुरेश महापात्र। छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में गुरुवार को 61 माओवादियों द्वारा एक साथ आत्मसमर्पण करना न केवल राज्य सरकार की नीतियों की जीत है, बल्कि माओवादी उग्रवाद के खिलाफ एक ऐतिहासिक कदम भी है। करीब सवा दो करोड़ रुपये के इनामी नक्सलियों का आत्मसमर्पण इस बात का प्रमाण है कि विष्णुदेव साय सरकार की रणनीति और विकासपरक योजनाएं, विशेष रूप से “नियद नेल्लानार” (आपका अच्छा गांव) योजना, नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में न सिर्फ शांति स्थापित

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तो यह तय मान लेना चाहिए कि नक्सल मुक्त बस्तर की डेडलाइन 31 मार्च 2026 ही है…

सुरेश महापात्र। नक्सल मोर्चे पर अविश्वसनीय सफलता के बाद माओवादियों का गढ़ ढहता दिखाई दे रहा है। बस्तर में बड़ी तेजी के साथ परिस्थितियाँ बदलती दिखाई देने लगी। इसके पीछे का रहस्य एक ऐसी कहानी है जो न केवल रणनीतिक कौशल और नेतृत्व की दृढ़ता को दर्शाती है, बल्कि सामाजिक-आर्थिक बदलाव और स्थानीय समुदायों के विश्वास को जीतने की शक्ति को भी उजागर करती है। छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में नक्सलवाद का खात्मा लंबे समय से एक असंभव सपना माना जाता था। यह क्षेत्र माओवादियों का गढ़ रहा है, जहां

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नहीं लगता शांति वार्ता की जरूरत है… बशर्ते?

विशेष टिप्पणी। सुरेश महापात्र। बस्तर में माओवादियों के साथ संघर्ष का लंबा इतिहास रहा है। इसमें ना जाने कितने लोगों की मौत दर्ज है। किसे शहीद कहें और किसे मौत? यह भी बड़ा सवाल रहा है। चार दशक पुराने इस माओवादी इतिहास में बस्तर एक अघोषित युद्ध क्षेत्र की तरह ही रहा है। अब पहली बार ऐसा साफ दिखाई दे रहा है कि बस्तर में लंबे समय तक बैकफुट पर रहे सशस्त्र बलों का आत्मबल कामयाबी से बढ़ा है। हर उस इलाके में सशस्त्र बलों का अब दबदबा साफ दिखाई

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भ्रष्टाचार के मामले और अदालतों की क्लीन चिट… क्या आरोप महज राजनीति का हिस्सा थे?

विशेष टिप्पणी। सुरेश महापात्र। यूपीए यानी यूनाईटेड प्राग्रेसिव अलायंस की सरकार पहली बार 2004 में चुनकर आई। इसके बाद एक सबसे बड़ी बहस ने जन्म लिया कि क्या यूपीए के प्रमुख होने के कारण कांग्रेस के सर्वोच्च नेता सोनिया गांधी अब प्रधानमंत्री बन सकतीं हैं। सवाल आसान था और जवाब उतना ही कठिन क्योंकि तब प्रमुख विपक्षी दल की ओर से सुषमा स्वराज, उमा भारती ने यह तक ऐलान कर दिया कि यदि सोनिया गांधी भारत की प्रधानमंत्री बनती हैं तो वे अपना सिर मुंडवा लेंगीं। पूरे देश में गहमा—गहमी

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