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नक्सलियों के सामने तन गए आदिवासी…

सुदीप ठाकुर। अबूझमाड़ के जंगलों में नारायणपुर और दंतेवाड़ा जिलों की सीमा पर चार अक्टूबर को हुई भीषण मुठभेड़ के बाद पुलिस ने 31 माओवादियों के मारे जाने का दावा किया। इसके कुछ दिनों बाद माओवादियों के प्रवक्ता ने कहा कि मुठभेड़ में 35 माओवादी मारे गए। बीते चार दशक में बस्तर में यह माओवादियों के खिलाफ सबसे बड़ी मुठभेड़ है। करीब 14 साल पहले 6 अप्रैल, 2010 को नक्सलियों के अब तक के सबसे बड़े हमले में सुरक्षाबलों के 76 जवान मारे गए थे। ये दो घटनाएं एक दूसरे

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रमेश बैस : अब आगे क्या ? बड़ा सवाल – “भाजपा का केन्द्रीय नेतृत्व उनके दीर्घ अनुभवों का भविष्य में कोई लाभ लेगा अथवा नहीं?”

दिवाकर मुक्तिबोध। छत्तीसगढ़ की राजनीति की अज़ीम शख्सियत रमेश बैस अपने 46 – 47 वर्षों के अपने शानदार करियर के बाद ‘घर’ वापसी कर रहे हैं। महाराष्ट्र के राज्यपाल के रूप में उनका कार्यकाल 29 जुलाई 2024 को समाप्त हो गया। भाजपा का केन्द्रीय नेतृत्व उनके दीर्घ अनुभवों का भविष्य में कोई लाभ लेगा अथवा नहीं, इस बारे में पक्के तौर पर अभी कुछ नहीं कहा जा सकता। उनके स्थान पर झारखंड के राज्यपाल सी वी राधाकृष्णन को महाराष्ट्र का नया राज्यपाल बना दिया गया है। चूंकि 77 वर्षीय रमेश

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EditorialNazriya

साम, दाम, दंड, भेद की हार है 2024 का चुनाव…

त्वरित टिप्पणी। सुरेश महापात्र। हिंदुस्तान ने अपना फैसला सुना दिया है। जनादेश का पिटारा खुलने के पहले लगाए जा रहे सारे कयास विफल हो चुके हैं। हिंदुस्तान में नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट की सरकार बनना तय है। इसे बहुमत से मात्र 23 सीटे ज्यादा हासिल हुई हैं। पर यह बढ़त सरकार चलाने के लिए पर्याप्त है। विपक्ष के गठबंधन को करीब 235 सीटें मिलती दिख रही हैं। यानी बेहद मजबूत विपक्ष की भूमिका के साथ अब ‘मोदी सरकार’ की जगह एनडीए सरकार अपना काम करेगी। मोदी सरकार का नारा भारतीय जनता

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छत्तीसगढ़ : नक्सल मोर्चे पर अंतिम लड़ाई! क्या बस्तर में रुक पाएगी हिंसा?

दिवाकर मुक्तिबोध। साल 2015 में बीबीसी से बातचीत के दौरान छत्तीसगढ़ के तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉक्टर रमनसिंह ने कहा था, ‘नक्सली धरती माता के सपूत हैं और उनका मुख्य धारा में बच्चों की तरह स्वागत होगा.’ उन्होंने यह बात वार्ता की संभावना के मद्देनजर कही थी. उनका यह कथन अनायास इसलिए याद आ रहा हैं, क्योंकि बस्तर में केन्द्र व राज्य सरकार का नक्सलियों के खिलाफ जो चौतरफा अभियान चल रहा है, उसका एक महत्वपूर्ण हिस्सा नक्सलियों को मुख्य धारा में लाना भी है. रमनसिंह की सरकार में सबसे ज्यादा नक्सली

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Kanak Tiwari ने पत्रकारिता पर दो अत्यंत महत्वपूर्ण आलेख लिखे… भारतीय पत्रकारिता के मौजूदा दौर पर यह लेख और उसकी टिप्पणियां संजोकर रखने लायक हैं…

फेसबुक वॉल से… सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर हर तरह के लोग और समूह हैं। कुछ विचारवान लेखक, पत्रकार और वैचारिक तौर पर विचारधारा से जुड़े प्रख्यात लेखक भी इसका हिस्सा हैं। इनमें से एक ऐसे ही गांधीवादी और कांग्रेस विचारधारा से जुड़े वरिष्ठ अधिवक्ता, पूर्व पत्रकार, लेखक और प्रखर विचारशील वक्ता कनक तिवारी भी हैं। दर्जनों पुस्तकें लिखीं हैं। इन्होंने दो खंडों में भारतीय पत्रकारिता की वर्तमान दशा और दिशा पर लेख लिखा। इस लेख को वरिष्ठ पत्रकार रूचिर गर्ग ने अपनी वॉल पर शेयर किया। इस लेख को पढ़ने

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‘धाकड़’ सरकार को सांसदों की जरूरत ही नहीं…

सुरेश महापात्र। जिन लोगों का जन्म मेरी तरह 1971 के बाद हुआ है उनके लिए इस वक्त सबसे बड़ा वक्त है। वे अपनी आंखों से सरकार की ताकत देख सकते हैं। क्योंकि इससे पहले जन्म लेने वाले ज्यादातर ने इंदिरा के युग को देख ही लिया होगा यह माना जा सकता है। हिंदुस्तान में कांग्रेस पर इस बात को लेकर आरोप लगता रहा है कि इसने हिंदुस्तान में 70 बरस तक अपनी सरकार चलाई। इसके साथ ही यह भी आरोप लगता रहा है कि इतने ही बरस तक नेहरू और

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‘ अर्धविराम ‘ के बहाने कुछ बातें…

दिवाकर मुक्तिबोध। दो मई को प्रेस क्लब में पत्रकार सनत चतुर्वेदी पर केन्द्रित किताब ‘अर्धविराम ‘ के लोकार्पण कार्यक्रम में मुझे शामिल होना था। समय था शाम साढे पांच बजे । आधे घंटे पहले मैं घर से निकल ही रहा था कि एकाएक मौसम बुरी तरह बिगड़ गया। तेज आंधी तूफान के साथ बरसात भी शुरू हो गई। करीब एक सवा घंटे के बाद आसमान साफ हुआ। अंधड शांत हुआ और बरसात भी थम गई पर विलंब हो चुका था लिहाजा मेरा जाना रूक गया। जबकि इस कार्यक्रम में शामिल

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रतन टाटा की सादगी की पूरी दुनिया में तारीफ… बॉडीगार्ड के बिना Nano गाड़ी से पहुंचे ताज होटल…

इम्पैक्ट डेस्क. भारत के जाने-माने उद्योगपति रतन टाटा अपनी सादगी के लिए जाने जाते हैं। दुनिया में यदि विनम्र व्यवसायियों की गिनती होती है तो उन्हें पहले स्थान पर रखा जाता है। इसी क्रम में एक ताजा वाकया सामने आया है जहां उनकी सादगी ने सोशल मीडिया पर लोगों का दिल जीत लिया है और लोग उन्हें ‘लीजेंड’ कह रहे हैं। आइए बताते हैं आखिर रतन टाटा एक बार फिर से क्यों सुर्खियों मे हैं। दरअसल, सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें टाटा ट्रस्ट के चेयरमैन रतन

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दलित परिवार को श्मशान घाट के चबूतरे पर अंतिम संस्कार से रोका… 3 गिरफ्तार…

इंपैक्ट डेस्क. मध्य प्रदेश के गुना जिले में कुछ लोगों ने एक दलित परिवार को श्मशान घाट के चबूतरे पर अपने एक परिजन का अंतिम संस्कार करने से कथित तौर पर रोका गया। मामले में पुलिस ने तीन लोगों को गिरफ्तार किया है। एक अधिकारी ने सोमवार को यह जानकारी दी। जानकारी के मुताबिक, रोके जाने के बाद दलित परिवार ने श्मशान घाट में ऊंचे चबूतरे के पास ही जमीन पर रिश्तेदार का अंतिम संस्कार किया। घटना गुना जिला मुख्यालय से 62 किलोमीटर दूर कुंभराज थाना क्षेत्र के चांदपुरा गांव

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सुलगते सिलगेर पर बाहरी हवा का दबाव… 

सुरेश महापात्र। बस्तर के साथ अक्सर ऐसा ही होता रहा है। नक्सली और पुलिस यहां की दो धुरी है। जिनके इर्द-गिर्द समूचा सिस्टम संचालित होता रहा है। इस सिस्टम में पंचायत के सरपंच से लेकर जिला कलेक्टर तक शामिल हैं। पर जिन्हें सीधे तौर पर इस सिस्टम का हिस्सा होना चाहिए वे कहीं दिखते नहीं हैं। यानी बस्तर की जनता जिन्हें विधायक और सांसद चुनकर भेजती है वे नदारत रहते हैं।  नक्सली यानी माओवादियों की सेंट्रल कमेटी से लेकर जन मिलिशिया जिन्हें माओवादियों की कथित जनताना सरकार के क्षेत्र का

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तो यह तय करना कठिन होगा कि उन्होंने न्याय किया या इन्होंने… इसलिए कृपया फर्जी मुठभेड़ों को न्याय मत मानिए…

सुरेश महापात्र। छत्तीसगढ़ में पुलिस और नक्सलियों के बीच मुठभेड़ की सैकड़ों कहानियों का सच किसी को अब तक पता नहीं। सैकड़ों माओवादियों की मौत मुठभेड़ के नाम दर्ज हैं। वहीं कई ऐसे मामले भी हैं जिनमें ना तो मुठभेड़ दर्ज किए गए और ना ही किसी पर आरोप तय किया जा सका। मौतें सहज तौर पर आदिवासियों की ही हुई। मारने वाले वर्दीदारी ही थे। वे पुलिस की वर्दी में थे या माओवादियों की वर्दी में इस बहस का कोई मायने इसलिए नहीं है क्योंकि बस्तर में कानून का

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क़ीमती बिवाइयाँ, पीर देश की..!

मनोज त्रिवेदी। आप कई राष्ट्रीय समाचार पत्रों में उच्च प्रबंधकीय दायित्व संभाल चुके हैं। लेखन के प्रति उनकी गहरी रूचि उनके सोशल मीडिया मंच पर नियमित प्रदर्शित होती है। बेहद संवेदनशील व्यक्ति किसी व्यवस्थागत पीड़ा को कैसे महसूस कर सकता है… यह इनके शब्दों से समझा जा सकता है… इस आलेख का स्पंदन… जस का तय पाठको के लिए… कहा जाता है जाके पैर ना पड़े बिवाई वो का जाने पीर पराई यूँ ही नही कही गई होगी, भूख, बीमारी, रोज़गार, स्वास्थ्य,परिवार,गाँव और देश,एक एक छालों में गहरी उतरी है।

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अदृश्य युद्ध के दौर में…

कुछ लोगों का लिक्खा सिर्फ इसलिए अच्छा नहीं हो जाता कि वे वैसे पद पर हैं जहां बुरा बोलने के लिए भी हैसियत चाहिए… पर इनके साथ ऐसा नहीं है… ये लिखते हैं तो मर्म को स्पर्श करते हैं इनके शब्द… तारण प्रकाश सिन्हा के फेसबुक वॉल से… निश्चित ही यह एक अकल्पनीय समय है। वह घटित हो रहा है, जो किसी ने कभी सोचा तक नहीं था। आगे बढ़ती हुई एक सदी अचानक थम गई, बीती हुई सदी अपने तमाम जख्मों के साथ फिर प्रकट हो गई। फिर वही

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फिर दमका देश का नया विश्वास… छत्तीसगढ़…

-उमेश मिश्र. फिर एक बार छत्तीसगढ़ ने देश का विश्वास जीता है । फिर एक बार मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की खांटी छत्तीसगढ़िया छवि और जमीनी रणनीति तारणहार बनी है।फिर एक बार साबित हुआ कि लीडर का जुनून और जनता से जुड़ाव बड़े से बड़े मर्ज का इलाज है ,वह मर्ज ‘कोरोना ‘ जैसा महाप्रलयंकारी अजूबा क्यों ना हो। एक बार फिर श्री बघेल का नेतृत्व और उसके साथ छत्तीसगढ़ विजेता बना है। ‘कोविड- 19 ‘ जिस रूप और जिस दौर में सात समंदर और सैकड़ों नदियों- पहाड़ों को लांघता हुआ

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पूर्व सीएम रमन को सीएम सलाहकार रूचिर का जवाब… आपके पत्र की भाषा सामंती…

इम्पेक्ट न्यूज. रायपुर। पूर्व मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह में कोरोना संकट को लेकर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को पत्र लिखा। जिसमें उन्होंने कई सलाह दी। इस पत्र के मजमून पर मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार रूचिर गर्ग का जवाबी पत्र अब सोशल मीडिया में वायरल हो रहा है। करीब 40 बरस तक पत्रकारिता के बाद विपत्ति काल में कांग्रेस का दामन थामना वाले रूचिर जब कहते हैं तो उसमें तथ्य ज्यादा होते हैं वे लेखन की बारीकियाँ को पकड़ लेते हैं पूर्व मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह के पत्र पर सामंती सोच का

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