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अमित शाह और छत्तीसगढ़…

– दिवाकर मुक्तिबोध। अमित शाह केन्द्र सरकार के ऐसे पहले गृह मंत्री हैं जो हर चार-पांच महीनों में छत्तीसगढ का फेरा लगाते हैं. उनके पहले केन्द्र में किसी भी राजनीतिक पार्टी की सरकार रही हो , किसी भी गृह मंत्री को इतनी फुर्सत नहीं मिलती थी कि वे छत्तीसगढ जैसे छोटे प्रदेश का दर्जनों बार दौरा करें. अभी हाल ही में बस्तर दशहरा उत्सव में शामिल होने के लिए अमित शाह रायपुर आए. यद्यपि भाजपा शासित एक छोटे विकासशील राज्य के प्रति गृह मंत्री का इतना प्रेम चकित करता है

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बस्तर में टाटा संयंत्र का अधूरा सपना: डा. रमन को भले ही इसका मलाल हो पर क्या थीं वजहें?

सुरेश महापात्र। वर्तमान में विधानसभा अध्यक्ष डा. रमन सिंह ने मंगलवार को स्वदेशी मेला में शामिल होने के बाद जगदलपुर में स्थानीय लोगों से मुलाकात की और पत्रकारों से चर्चा की। इस दौरान उन्होंने इस बात का जिक्र किया कि लोहण्डीगुड़ा में टाटा संयंत्र नहीं लगा पाने की टीस है। बस्तर, छत्तीसगढ़ का वो इलाका, जो हरे-भरे जंगलों और खनिजों से भरा है, हमेशा से खास रहा है। यहाँ की आदिवासी संस्कृति और प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ नक्सलवाद की चुनौती भी है। Read moreCJI के खिलाफ जांच से हटे जस्टिस

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‘पप्पू’ की छवि से बाहर निकलते ‘राहुल गांधी’ का नया रंग और विपक्ष की आक्रामकता

सुरेश महापात्र। भारतीय राजनीति के बदलते परिदृश्य में 2025 का मानसून सत्र एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में सामने आया है। कांग्रेस, जो पिछले एक दशक से अपनी खोई हुई जमीन को पुनः प्राप्त करने के लिए संघर्षरत रही है, अब एक नए जोश और रणनीति के साथ उभरती दिख रही है। इस बदलाव के केंद्र में हैं लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी, जिन्होंने अपनी पुरानी ‘पप्पू’ वाली छवि को पीछे छोड़ते हुए एक आक्रामक और तथ्यपरक नेतृत्व का परिचय दिया है। बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR)

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छत्तीसगढ़ में भाजपा की सेकेंड लाइन पॉलिटिक्स और डा. रमन सिंह का भविष्य

सुरेश महापात्र। छत्तीसगढ़ में हाल ही में हुए मंत्रिमंडल विस्तार ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की राजनीतिक रणनीति को एक बार फिर स्पष्ट कर दिया है। यह विस्तार न केवल क्षेत्रीय और जातिगत संतुलन को मजबूत करने की कवायद है, बल्कि यह भी संदेश देता है कि पार्टी अब अपनी दूसरी पंक्ति के नेतृत्व को आगे बढ़ाने पर केंद्रित है। इस प्रक्रिया में नए चेहरों को मौका दिया गया है, लेकिन पुराने दिग्गजों को मंत्रिमंडल में शामिल न किए जाने से कई सवाल उठ रहे हैं। खास तौर पर, अब

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सरकार की योजनाओं का नतीजा अब समर्पण करने सामने आ रहे नक्सली लीडर…

बस्तर में चल रही है छत्तीसगढ़ में माओवाद के खिलाफ निर्णायक लड़ाई… विशेष संपादकीय। सुरेश महापात्र। छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में गुरुवार को 61 माओवादियों द्वारा एक साथ आत्मसमर्पण करना न केवल राज्य सरकार की नीतियों की जीत है, बल्कि माओवादी उग्रवाद के खिलाफ एक ऐतिहासिक कदम भी है। करीब सवा दो करोड़ रुपये के इनामी नक्सलियों का आत्मसमर्पण इस बात का प्रमाण है कि विष्णुदेव साय सरकार की रणनीति और विकासपरक योजनाएं, विशेष रूप से “नियद नेल्लानार” (आपका अच्छा गांव) योजना, नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में न सिर्फ शांति स्थापित

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झीरम घाटी से अबूझमाड़ तक: माओवादी विद्रोह के खिलाफ संघर्ष का दौर और परिणति…

सुरेश महापात्र। 25 मई 2013 को छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले की झीरम घाटी में हुए नक्सली हमले ने भारतीय इतिहास में एक काला अध्याय जोड़ा। यह पहली बार था जब भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) ने किसी राजनीतिक दल, विशेष रूप से कांग्रेस के नेतृत्व, पर सीधा निशाना साधा। इस हमले में 32 लोगों की जान गई, जिनमें पंडित विद्या चरण शुक्ला, महेंद्र कर्मा और नंद कुमार पटेल जैसे प्रमुख नेता शामिल थे। आज उसकी बरसी है। आज का दिन उन सभी शहीदों को याद करने का दिन भी है। महेंद्र

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तो यह तय मान लेना चाहिए कि नक्सल मुक्त बस्तर की डेडलाइन 31 मार्च 2026 ही है…

सुरेश महापात्र। नक्सल मोर्चे पर अविश्वसनीय सफलता के बाद माओवादियों का गढ़ ढहता दिखाई दे रहा है। बस्तर में बड़ी तेजी के साथ परिस्थितियाँ बदलती दिखाई देने लगी। इसके पीछे का रहस्य एक ऐसी कहानी है जो न केवल रणनीतिक कौशल और नेतृत्व की दृढ़ता को दर्शाती है, बल्कि सामाजिक-आर्थिक बदलाव और स्थानीय समुदायों के विश्वास को जीतने की शक्ति को भी उजागर करती है। छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में नक्सलवाद का खात्मा लंबे समय से एक असंभव सपना माना जाता था। यह क्षेत्र माओवादियों का गढ़ रहा है, जहां

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नहीं लगता शांति वार्ता की जरूरत है… बशर्ते?

विशेष टिप्पणी। सुरेश महापात्र। बस्तर में माओवादियों के साथ संघर्ष का लंबा इतिहास रहा है। इसमें ना जाने कितने लोगों की मौत दर्ज है। किसे शहीद कहें और किसे मौत? यह भी बड़ा सवाल रहा है। चार दशक पुराने इस माओवादी इतिहास में बस्तर एक अघोषित युद्ध क्षेत्र की तरह ही रहा है। अब पहली बार ऐसा साफ दिखाई दे रहा है कि बस्तर में लंबे समय तक बैकफुट पर रहे सशस्त्र बलों का आत्मबल कामयाबी से बढ़ा है। हर उस इलाके में सशस्त्र बलों का अब दबदबा साफ दिखाई

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भ्रष्टाचार के मामले और अदालतों की क्लीन चिट… क्या आरोप महज राजनीति का हिस्सा थे?

विशेष टिप्पणी। सुरेश महापात्र। यूपीए यानी यूनाईटेड प्राग्रेसिव अलायंस की सरकार पहली बार 2004 में चुनकर आई। इसके बाद एक सबसे बड़ी बहस ने जन्म लिया कि क्या यूपीए के प्रमुख होने के कारण कांग्रेस के सर्वोच्च नेता सोनिया गांधी अब प्रधानमंत्री बन सकतीं हैं। सवाल आसान था और जवाब उतना ही कठिन क्योंकि तब प्रमुख विपक्षी दल की ओर से सुषमा स्वराज, उमा भारती ने यह तक ऐलान कर दिया कि यदि सोनिया गांधी भारत की प्रधानमंत्री बनती हैं तो वे अपना सिर मुंडवा लेंगीं। पूरे देश में गहमा—गहमी

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आखिर क्यों टल रहा है छत्तीसगढ़ में मंत्रिमंडल का विस्तार…

इम्पेक्ट न्यूज। रायपुर। छत्तीसगढ़ में मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर बार-बार उठ रही चर्चाओं और इसके बार-बार टलने की स्थिति ने राजनीतिक हलकों में कई सवाल खड़े किए हैं। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार ने दिसंबर 2023 में सत्ता संभालने के बाद से ही मंत्रिमंडल विस्तार की संभावनाओं को लेकर सुगबुगाहट बनी हुई है। हालांकि, 16 अप्रैल 2025 तक यह प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी है, और यह आने वाले दिनों में कब होगा कोई नहीं जानता। इस टालमटोल के पीछे कई राजनीतिक, सामाजिक और

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राजनीतिक ‘महत्वाकांक्षा’ ने ‘आप’ की छवि को ‘बौना’ कर दिया… अब आगे क्या?

सुरेश महापात्र। 2012 में आरएसएस—भाजपा के गर्भनाल से उपजे अन्ना आंदोलन के सह नेतृत्वकर्ता अरविंद केजरीवाल ने भ्रष्टाचार के खिलाफ रामलीला के मैदान में चल रही लड़ाई को राजनीतिक शक्ति की दिशा में मोड़ दिया। यहां से जन लोकपाल को लेकर अनशन कर रहे अन्ना हजारे और अन्ना आंदोलन के सह नेतृत्वकर्ता अरविंद केजरीवाल की दिशा अलग—अलग हो गई। इस तरह से आम आदमी पार्टी का जन्म हुआ। अन्ना हजारे ने आंदोलन के बाद इसके राजनीतिक उपयोग का शुरू से ही विरोध किया था। बावजूद इसके इस आंदोलन से जुड़े

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नेताओं से गलबहिया दिखाती तस्वीरें और पुलिस का बयान…पत्रकार मुकेश के हत्यारे की ढाल दिखाई दे रही है…

सुरेश महापात्र। इन तस्वीरों को देखकर हम जो भी अंदाज़ा लगाएँगे वह सही ही होगा यह गलत है… पत्रकार मुकेश चंद्राकर की हत्या करवाने वाले के साथ सोशल मीडिया पर भाजपा-कांग्रेस आपस में खेल रही हैं। सच्चाई यही है कि सड़क निर्माण से जुड़े भ्रष्टाचार को उजागर करने की कीमत मुकेश चंद्राकर ने जान देकर चुकाई है। Read moreयहां सरकार नहीं नक्सली देते हैं परमिशन, साधारण सी बैरिकेंटिंग में सभी के लिए संदेश “प्रवेश निषेध”! नक्सलगढ़ रिपोर्टिंग के लिए पहुंचे पत्रकार को खाली हाथ लौटना पड़ा…ठेकेदार जो इन दो तस्वीरों

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साय सरकार का एक साल : चुनावी वायदों के व्यतिरेक विकास की योजनाएं कागजों पर और नक्सल मोर्चे पर बेहतर

दिवाकर मुक्तिबोध। छत्तीसगढ़ में विष्णुदेव साय सरकार का एक वर्ष का कार्यकाल 13 दिसंबर को पूर्ण हो गया. पिछले वर्ष इसी दिन साय ने मुख्य मंत्री पद की शपथ ली थी. उनके नेतृत्व में भाजपा सरकार का यदि एक साल का ट्रेक रिकॉर्ड देखा जाए तो वह सामान्य से अधिक नहीं है. दरअसल जिन वायदों के साथ भाजपा ने 2023 के विधान सभा चुनाव में उल्लेखनीय प्रदर्शन किया था और सत्ता हस्तगत की थी, उनमें से कुछ योजनाएं सरकार ने तुरंत प्रारंभ कर दी जिसमे किसानों से बढी हुई दरों

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अब भारतीय जनता पार्टी की निगाह दिल्ली पर… दिल्ली की चुनौती बहुत बड़ी…

दिवाकर मुक्तिबोध। बीते एक वर्ष के दौरान पांच राज्यों मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ, राजस्थान,  हरियाणा तथा  महाराष्ट्र में धमाकेदार जीत दर्ज करने के बाद अब भारतीय जनता पार्टी की निगाह दिल्ली पर टिक गई है जहां आम आदमी पार्टी की वजह से करीब डेढ दशक से उसके लिए सूखा पड़ा हुआ है तथा वह सत्ता से बाहर है. दिल्ली राज्य विधान सभा का कार्यकाल आगामी 23 फरवरी 2025 को पूरा हो जाएगा और इस बीच वहां विधान सभा चुनाव सम्पन्न हो जाएंगे. वर्ष 2015 से इस राज्य में आम आदमी पार्टी की

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छत्तीसगढ़ उपचुनाव रायपुर दक्षिण : मुकाबला कांटे का…

दिवाकर मुक्तिबोध। रायपुर दक्षिण विधान सभा उपचुनाव में कांग्रेस की जीत संभावना पर शायद ही कोई यकीन करें लेकिन चमत्कार कही भी, कभी भी हो सकते हैं और राजनीति भी इससे परे नहीं है. कांग्रेस ने नये व युवा चेहरे के रूप में आकाश शर्मा को टिकिट देकर जो दावं खेला है यदि वह कारगर रहा तो रायपुर दक्षिण का परिणाम एक ऐसे कीर्तिमान के रूप में दर्ज हो जाएगा जिसकी प्रतीक्षा कांग्रेस डेढ दशक से कर रही है. लेकिन क्या ऐसा होगा ? सोचना कठिन है. खासकर इसलिए क्योंकि

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