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रायपुर : विशेष लेख : छत्तीसगढ़ के 25 वर्ष: संघर्ष, संकल्प और समग्र विकास की स्वर्णिम यात्रा

रायपुर : विशेष लेख : छत्तीसगढ़ के 25 वर्ष: संघर्ष, संकल्प और समग्र विकास की स्वर्णिम यात्रा रायपुर 1 नवंबर 2000 को भारत के मानचित्र पर छत्तीसगढ़ एक नए राज्य के रूप में उभरा। मध्यप्रदेश से पृथक होकर बने इस राज्य ने 25 वर्षों की यात्रा में न केवल अपनी पहचान गढ़ी, बल्कि विकास, सामाजिक न्याय और सुशासन के कई नए प्रतिमान भी स्थापित किए। प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर, आदिवासी संस्कृति से समृद्ध और कृषि प्रधान छत्तीसगढ़ की यह यात्रा चुनौतियों से शुरू होकर आत्मविश्वास और उपलब्धियों तक पहुँची है।

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विष्णु के सुशासन का दो वर्षीय सफर – विकास, शांति और पारदर्शिता की नई इबारत…

सुरेश महापात्र। छत्तीसगढ़ के लिए दिसंबर का महीना हमेशा खास रहा है। 1 नवंबर 2000 को राज्य के गठन के साथ ही यह महीना नई शुरुआत का प्रतीक बन गया। लेकिन 2023 के दिसंबर में एक और ऐतिहासिक मोड़ आया, जब भाजपा ने विधानसभा चुनावों में शानदार जीत दर्ज की और विष्णुदेव साय चौथे मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण कीं। आदिवासी समाज से आने वाले साय ने अपने दो वर्षीय कार्यकाल में न केवल राज्य को नक्सलवाद की जकड़न से मुक्त करने की दिशा में ठोस कदम उठाए, बल्कि

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अमित शाह और छत्तीसगढ़…

– दिवाकर मुक्तिबोध। अमित शाह केन्द्र सरकार के ऐसे पहले गृह मंत्री हैं जो हर चार-पांच महीनों में छत्तीसगढ का फेरा लगाते हैं. उनके पहले केन्द्र में किसी भी राजनीतिक पार्टी की सरकार रही हो , किसी भी गृह मंत्री को इतनी फुर्सत नहीं मिलती थी कि वे छत्तीसगढ जैसे छोटे प्रदेश का दर्जनों बार दौरा करें. अभी हाल ही में बस्तर दशहरा उत्सव में शामिल होने के लिए अमित शाह रायपुर आए. यद्यपि भाजपा शासित एक छोटे विकासशील राज्य के प्रति गृह मंत्री का इतना प्रेम चकित करता है

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बस्तर में टाटा संयंत्र का अधूरा सपना: डा. रमन को भले ही इसका मलाल हो पर क्या थीं वजहें?

सुरेश महापात्र। वर्तमान में विधानसभा अध्यक्ष डा. रमन सिंह ने मंगलवार को स्वदेशी मेला में शामिल होने के बाद जगदलपुर में स्थानीय लोगों से मुलाकात की और पत्रकारों से चर्चा की। इस दौरान उन्होंने इस बात का जिक्र किया कि लोहण्डीगुड़ा में टाटा संयंत्र नहीं लगा पाने की टीस है। बस्तर, छत्तीसगढ़ का वो इलाका, जो हरे-भरे जंगलों और खनिजों से भरा है, हमेशा से खास रहा है। यहाँ की आदिवासी संस्कृति और प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ नक्सलवाद की चुनौती भी है। Read moreCJI के खिलाफ जांच से हटे जस्टिस

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बस्तर : बस छह माह और…

दिवाकर मुक्तिबोध। अब मात्र छह महीने रह गए हैं. मार्च 2026 तक छत्तीसगढ में नक्सलवाद और नक्सली अतीत में गुम हो जाएंगे! केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह पिछले डेढ वर्ष में जितनी बार भी रायपुर आए, हर बार उन्होंने दोहराया कि नक्सलियों के खात्मे की डेड लाइन तय कर दी गई है – मार्च 26. इस समय सीमा के भीतर छत्तीसगढ में सक्रिय तमाम नक्सली व उनके नेता या तो मारे जाएंगे अथवा आत्मसमर्पण करने विवश हो जाएंगे. गृह मंत्री का यह संकल्प पूरा होता दिख रहा है. केन्द्रीय सुरक्षा

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चीन यात्रा, वैश्विक चुनौतियां और आत्मनिर्भरता की राह…

सुरेश महापात्र आज भारत दुनिया में तेजी से अपनी जगह बना रहा है। G20, BRICS और क्वाड जैसे मंचों पर भारत की सक्रियता और आर्थिक तरक्की इसे एक बड़ा खिलाड़ी बनाती है। लेकिन बड़ी ताकतें जैसे अमेरिका, चीन और रूस अक्सर भारत को दूसरी प्राथमिकता देती हैं। अमेरिका और चीन पहले पाकिस्तान को तवज्जो देते हैं, और रूस अब चीन की तरफ ज्यादा झुका है। ऐसे में भारत के सामने मौका भी है और चुनौती भी। पहले अमेरिका ने आतंकवाद और अफगानिस्तान की वजह से पाकिस्तान को अहमियत दी। हाल

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‘पप्पू’ की छवि से बाहर निकलते ‘राहुल गांधी’ का नया रंग और विपक्ष की आक्रामकता

सुरेश महापात्र। भारतीय राजनीति के बदलते परिदृश्य में 2025 का मानसून सत्र एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में सामने आया है। कांग्रेस, जो पिछले एक दशक से अपनी खोई हुई जमीन को पुनः प्राप्त करने के लिए संघर्षरत रही है, अब एक नए जोश और रणनीति के साथ उभरती दिख रही है। इस बदलाव के केंद्र में हैं लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी, जिन्होंने अपनी पुरानी ‘पप्पू’ वाली छवि को पीछे छोड़ते हुए एक आक्रामक और तथ्यपरक नेतृत्व का परिचय दिया है। बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR)

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छत्तीसगढ़ में भाजपा की सेकेंड लाइन पॉलिटिक्स और डा. रमन सिंह का भविष्य

सुरेश महापात्र। छत्तीसगढ़ में हाल ही में हुए मंत्रिमंडल विस्तार ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की राजनीतिक रणनीति को एक बार फिर स्पष्ट कर दिया है। यह विस्तार न केवल क्षेत्रीय और जातिगत संतुलन को मजबूत करने की कवायद है, बल्कि यह भी संदेश देता है कि पार्टी अब अपनी दूसरी पंक्ति के नेतृत्व को आगे बढ़ाने पर केंद्रित है। इस प्रक्रिया में नए चेहरों को मौका दिया गया है, लेकिन पुराने दिग्गजों को मंत्रिमंडल में शामिल न किए जाने से कई सवाल उठ रहे हैं। खास तौर पर, अब

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सरकार की योजनाओं का नतीजा अब समर्पण करने सामने आ रहे नक्सली लीडर…

बस्तर में चल रही है छत्तीसगढ़ में माओवाद के खिलाफ निर्णायक लड़ाई… विशेष संपादकीय। सुरेश महापात्र। छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में गुरुवार को 61 माओवादियों द्वारा एक साथ आत्मसमर्पण करना न केवल राज्य सरकार की नीतियों की जीत है, बल्कि माओवादी उग्रवाद के खिलाफ एक ऐतिहासिक कदम भी है। करीब सवा दो करोड़ रुपये के इनामी नक्सलियों का आत्मसमर्पण इस बात का प्रमाण है कि विष्णुदेव साय सरकार की रणनीति और विकासपरक योजनाएं, विशेष रूप से “नियद नेल्लानार” (आपका अच्छा गांव) योजना, नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में न सिर्फ शांति स्थापित

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झीरम घाटी से अबूझमाड़ तक: माओवादी विद्रोह के खिलाफ संघर्ष का दौर और परिणति…

सुरेश महापात्र। 25 मई 2013 को छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले की झीरम घाटी में हुए नक्सली हमले ने भारतीय इतिहास में एक काला अध्याय जोड़ा। यह पहली बार था जब भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) ने किसी राजनीतिक दल, विशेष रूप से कांग्रेस के नेतृत्व, पर सीधा निशाना साधा। इस हमले में 32 लोगों की जान गई, जिनमें पंडित विद्या चरण शुक्ला, महेंद्र कर्मा और नंद कुमार पटेल जैसे प्रमुख नेता शामिल थे। आज उसकी बरसी है। आज का दिन उन सभी शहीदों को याद करने का दिन भी है। महेंद्र

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तो यह तय मान लेना चाहिए कि नक्सल मुक्त बस्तर की डेडलाइन 31 मार्च 2026 ही है…

सुरेश महापात्र। नक्सल मोर्चे पर अविश्वसनीय सफलता के बाद माओवादियों का गढ़ ढहता दिखाई दे रहा है। बस्तर में बड़ी तेजी के साथ परिस्थितियाँ बदलती दिखाई देने लगी। इसके पीछे का रहस्य एक ऐसी कहानी है जो न केवल रणनीतिक कौशल और नेतृत्व की दृढ़ता को दर्शाती है, बल्कि सामाजिक-आर्थिक बदलाव और स्थानीय समुदायों के विश्वास को जीतने की शक्ति को भी उजागर करती है। छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में नक्सलवाद का खात्मा लंबे समय से एक असंभव सपना माना जाता था। यह क्षेत्र माओवादियों का गढ़ रहा है, जहां

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ऑपरेशन कगार : शांति वार्ता क्यों न हो?

– दिवाकर मुक्तिबोध। तेलंगाना में नक्सलियों ने आगामी छह माह के लिए संघर्ष विराम की घोषणा की है. क्या ऐसी कोई घोषणा माओवादी छत्तीसगढ में भी करेंगे जो भीषण रूप से नक्सल प्रभावित है ? शायद यह तब तक संभव नहीं है जब तक कि सरकार सुलह वार्ता का संकेत न दें. छत्तीसगढ के गृह मंत्री विजय शर्मा पहले ही नक्सलियों की शांति वार्ता की पेशकश को ठुकरा चुके है. दरअसल 25 अप्रैल को भारत की कम्युनिस्ट पार्टी ( माओवादी ) के उत्तर पश्चिम सब ज़ोनल ब्यूरो ने अपनी ओर

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नहीं लगता शांति वार्ता की जरूरत है… बशर्ते?

विशेष टिप्पणी। सुरेश महापात्र। बस्तर में माओवादियों के साथ संघर्ष का लंबा इतिहास रहा है। इसमें ना जाने कितने लोगों की मौत दर्ज है। किसे शहीद कहें और किसे मौत? यह भी बड़ा सवाल रहा है। चार दशक पुराने इस माओवादी इतिहास में बस्तर एक अघोषित युद्ध क्षेत्र की तरह ही रहा है। अब पहली बार ऐसा साफ दिखाई दे रहा है कि बस्तर में लंबे समय तक बैकफुट पर रहे सशस्त्र बलों का आत्मबल कामयाबी से बढ़ा है। हर उस इलाके में सशस्त्र बलों का अब दबदबा साफ दिखाई

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भ्रष्टाचार के मामले और अदालतों की क्लीन चिट… क्या आरोप महज राजनीति का हिस्सा थे?

विशेष टिप्पणी। सुरेश महापात्र। यूपीए यानी यूनाईटेड प्राग्रेसिव अलायंस की सरकार पहली बार 2004 में चुनकर आई। इसके बाद एक सबसे बड़ी बहस ने जन्म लिया कि क्या यूपीए के प्रमुख होने के कारण कांग्रेस के सर्वोच्च नेता सोनिया गांधी अब प्रधानमंत्री बन सकतीं हैं। सवाल आसान था और जवाब उतना ही कठिन क्योंकि तब प्रमुख विपक्षी दल की ओर से सुषमा स्वराज, उमा भारती ने यह तक ऐलान कर दिया कि यदि सोनिया गांधी भारत की प्रधानमंत्री बनती हैं तो वे अपना सिर मुंडवा लेंगीं। पूरे देश में गहमा—गहमी

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माफ कीजिएगा…

सुरेश महापात्र। आज सुबह से ही मैं मीडिया के संपर्क से बाहर रहा। यदि रहा भी तो अपने हिस्से के पन्ने पर… रात 12 बजे बाद जब टहलने निकला मीडिया के भीतर तो सबसे पहले Rashmi Drolia की पोस्ट पर नज़र पड़ी… पूरा समझ नहीं पाया… कि क्या हुआ? कहाँ और कैसे? पहले लगा कि किसी एक को आतंकवादी ने गोली मार दी है। फिर चिंता बढ़ी तो बेचैनी को शांत करने के लिए मेन स्ट्रीम मीडिया में निकल गया। Read moreदो बड़े घटनाक्रम और उनका जिक्र जरूरी तो है…दैनिक

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