Author: news editor

Naxal

जवानों ने भेदा नक्सलियों का किला,इरनार के जंगल मे मुठभेड़, एक का शव बरामद,और नक्सलियों के मारे जाने का दावा,
मौके से हथियार, विस्फोटक सहित नक्सल सामग्री जप्त

By Ganesh Mishra जिले में नक्सल हिंसक गतिविधियों के जबाव में सुरक्षा बल ने बड़ी कार्रवाई करते हुए माओवादियों के किले में धावा बोला। जिसमे एक माओवादी मारा गया, जबकि और माओवादियों के मारे जाने का दावा भी किया गया है। बीजापुर।। गत 25 सितंबर को दंतेवाड़ा और बीजापुर जिले से डीआरजी, एसटीएफ और सीआरपीएफ की ज्वाइंट एंटी नक्सल ऑपरेशन पार्टी गंगालूर ईलाक़े में बड़े ऑपरेशन को अंजाम देने निकली थी। तीन दिन से जंगल की खाक छानने के बाद रविवार को पीड़िया ईलाक़े में पुलिस और नक्सलियों के बीच

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राजधानी में आज रात 12 बजे से लॉकडाउन होगा खत्म… सुबह 8 से रात 8 तक खुलेगा मार्केट…

इम्पेक्ट न्यूज. रायपुर। रायपुर में आज रात 12 बजे लॉकडाउन खत्म हो जायेगा। राजधानी में हुई जिला स्तरीय अहम बैठक में इस बात का निर्णय लिया गया है। हालांकि राजधानी में लॉकडाउन तो खत्म हो जायेगा, लेकिन कुछ शर्तें अभी भी बनी रहेगी। कल से सभी दुकानें रात 8 बजे तक खुलेगी। वहीं होटलों को होम डिलेवरी के लिए 10 बजे तक की छूट रहेगी। इस दौरान मास्क, सोशल डिस्टेंसिंग, सैनिटाइजर सहित अन्य जरूरी चीजों को रखना जरूरी होगा।सभी दुकानों को रात 8 बजे तक खोलने की छूट दे दी

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Naxal

पीड़िया के जंगल में नक्सलियों से भिड़े जवान,एक माओवादी का शव और हथियार बरामद, और भी नक्सलियों के मारे जाने का दावा

⚡ BREAKING⚡ बीजापुर।।पुलिस-माओवादी मुठभेड़। मुठभेड़ में एक माओवादी ढेर। घटनास्थल से मारे गए माओवादी के शव के साथ हथियार और विस्फोटक बरामद। तीन दिन से एंटी नक्सल आपरेशन पर निकले थे जवान। अलग-अलग इलाके में चार बार माओवादियों से हई मुठभेड़। कुछ और माओवादियों के मारे जाने की भी है खबर। गंगालूर थानाक्षेत्र के पीड़िया, हिरानार-पेद्दापाल के जंगलों में हुई मुठभेड़। आईजी पी.सुंदरराज ने की घटना की पुष्टि।

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सत्यजीत भट्टाचार्य – बस्तर में रंगकर्म के एक युग का अवसान

राजीव रंजन प्रसाद। विनम्र श्रद्धांजलि आप रचनात्मकता को कम से कम शब्दों में कैसे पारिभाषित कर सकते हैं? इस प्रश्न के लिये मेरा उत्तर है – सत्यजीत भट्टाचार्य। बस्तर की पृष्ठभूमि से रंगकर्म को आधुनिक बनाकर देश-विदेश में चर्चित कर देने वाले सत्यजीत अपने चर्चित नाम बापी दा से अधिक जाने जाते थे। वे अपने आप में नितांत जटिल चरित्र थे, चटखीले रंगों की टीशर्ट, भरे भरे बालों वाला सर और दाढी से ढका पूरा चेहरा; पहली बार की मुलाकात से आप न व्यक्ति का अंदाजा लगा सकते थे, न

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Editorial

पत्रकार कमल पर हमले के बहाने… चाहे रमन हों या भूपेश दोनों की सरकारों में ज्यादा कुछ जमीन पर नहीं बदला…

सुरेश महापात्र। छत्तीसगढ़ में पत्रकारों पर हमले की यह कोई पहली या अंतिम कड़ी नहीं है। नए प्रदेश के गठन के बाद से अब तक बीते दो दशक में ऐसे दर्जनों उदाहरण हैं जब पत्रकारिता चोटिल हुई है। लिखने वाले मारे गए, नक्सल मामले में फंसाए गए, नक्सलियों ने हत्या की, पुलिस ने फर्जी केसों में उलझा दिया। अखबार के दफ्तर पर बुलडोजर चलाया गया। राजनीतिक, प्रशासनिक, पुलिस और नक्सल के खौफ के साए में पत्रकारिता कूलांचे मारती रही… हर हादसे के बाद बड़े अखबारों में करोड़ों खर्च कर सरकार

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