सुरेश महापात्र।
जब केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह छत्तीसगढ़ के बस्तर पहुंचते हैं, तो यह महज एक औपचारिक यात्रा नहीं होती। यह उस संकल्प का जीवंत प्रतीक होता है, जिसे केंद्र सरकार ने 31 मार्च 2026 तक पूरे देश से वामपंथी उग्रवाद को जड़ से उखाड़ फेंकने का लक्ष्य रखा है। इन दिनों बस्तर में जो घटनाक्रम हो रहा है, वह इसी लक्ष्य की अंतिम और निर्णायक कड़ी का संकेत देता है।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा बस्तर पंडुम महोत्सव का उद्घाटन और उसके समापन समारोह में अमित शाह की मौजूदगी केवल सांस्कृतिक आयोजन नहीं है। यह आदिवासी समाज को मुख्यधारा से जोड़ने, उनके मनोबल को मजबूत करने और नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में विकास की नई सुबह का प्रतीक है। पंडुम जैसे आयोजन अब केवल उत्सव नहीं रहे—वे नक्सल-मुक्त बस्तर की आकांक्षा का सामूहिक मंच बन चुके हैं।सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि गृहमंत्री के इस दौरे के ठीक आसपास दर्जनों नक्सली—जिनमें से कई पर लाखों-करोड़ों का इनाम था, ने हथियार डाल दिए।
बस्तर संभाग में पिछले कुछ दिनों में हुए सरेंडर का यह सिलसिला कोई संयोग नहीं है। यह सुरक्षा बलों के निरंतर दबाव, आत्मसमर्पण नीति की सफलता और स्थानीय लोगों के बढ़ते विश्वास का परिणाम है। अब बस्तर में नक्सल प्रभावित क्षेत्र महज 5 प्रतिशत रह गया है। यानी अंतिम पड़ाव पर खड़ा है वह संघर्ष, जिसने दशकों तक इस क्षेत्र को खून से सींचा।
अमित शाह का रायपुर में उच्चस्तरीय सुरक्षा समीक्षा बैठक बुलाना और उसके बाद बस्तर के अंदरूनी इलाकों में जाना स्पष्ट संदेश देता है—अब केवल समय गिनती का है। मार्च 2026 की डेडलाइन से महज कुछ हफ्ते बचे हैं। इस अंतिम चरण में रणनीति, समन्वय और संसाधनों का अंतिम आवंटन हो रहा है। केंद्र और राज्य सरकार के बीच का यह ‘डबल इंजन’ अब अंतिम गियर में है।
फिर भी कुछ सवाल अनुत्तरित हैं। क्या अंतिम छापेमारी और अभियानों में नागरिकों की सुरक्षा सर्वोपरि रहेगी? क्या सरेंडर करने वाले नक्सलियों के पुनर्वास और मुख्यधारा में शामिल होने की प्रक्रिया को और मजबूत किया जाएगा? क्या बस्तर में विकास की परियोजनाएं—सड़क, स्कूल, अस्पताल, रोजगार—नक्सलवाद के शून्य होने के बाद भी गति नहीं खोएंगी?
अमित शाह ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि मार्च 2026 के बाद अगला लक्ष्य 2030 तक बस्तर को देश का सबसे विकसित आदिवासी क्षेत्र बनाना है। यह महत्वाकांक्षी लेकिन आवश्यक विजन है। नक्सलवाद का अंत केवल बंदूकों से नहीं होगा—यह तब पूरा होगा जब बस्तर का हर गांव, हर परिवार विकास की रोशनी में सांस लेने लगे।
आज बस्तर एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है। अमित शाह का यह दौरा उस मोड़ को पार करने की अंतिम कड़ी है। यदि यह संकल्प पूरा होता है, तो यह न केवल छत्तीसगढ़, बल्कि पूरे देश के लिए एक नया अध्याय होगा, जहां ‘लाल आतंक’ की जगह ‘विकास की लहर’ लिखी जाएगी। समय कम है, लेकिन इच्छाशक्ति और रणनीति मजबूत दिख रही है। बस्तर अब इंतजार नहीं कर रहा—वह बदलाव की दहलीज पर है।
