क़ीमती बिवाइयाँ, पीर देश की..!
मनोज त्रिवेदी। आप कई राष्ट्रीय समाचार पत्रों में उच्च प्रबंधकीय दायित्व संभाल चुके हैं। लेखन के प्रति उनकी गहरी रूचि उनके सोशल मीडिया मंच पर नियमित प्रदर्शित होती है। बेहद संवेदनशील व्यक्ति किसी व्यवस्थागत पीड़ा को कैसे महसूस कर सकता है… यह इनके शब्दों से समझा जा सकता है… इस आलेख का स्पंदन… जस का तय पाठको के लिए… कहा जाता है जाके पैर ना पड़े बिवाई वो का जाने पीर पराई यूँ ही नही कही गई होगी, भूख, बीमारी, रोज़गार, स्वास्थ्य,परिवार,गाँव और देश,एक एक छालों में गहरी उतरी है।
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