Friday, January 23, 2026
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मुझे नहीं लगता इस सलीके से कोई और व्यक्ति यह काम कर सकता था जैसा रमेश भैय्या ने कर दिखाया… कुछ यादें कुछ बात… 14, दिवाकर मुक्तिबोध

  • दिवाकर मुक्तिबोध.

छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता के आधार स्तंभों में से एक दिवाकर जी… ने पत्रकारिता को पढ़ा है, जिया है और अब भी जी रहे हैं… वे अपना सफ़रनामा लिख रहे हैं… कुछ यादें कुछ बातें-14

रमेश गजानन मुक्तिबोध

82 के हो गए हैं रमेश भैय्या। रमेश गजानन मुक्तिबोध। मेरे बडे भाई। हम भाइयों , मैं, दिलीप व गिरीश में सबसे बड़े। भिलाई स्टील प्लांट की नौकरी से रिटायर होने के बाद उन्होंने भाइयों के साथ ही रहना पसंद किया। हम चारों भाई रायपुर के सड्डू इलाके की एक कालोनी मेट्रो ग्रीन्स में रहते हैं। रो हाउसेज हैं। चारों के एक जैसे घर, एक दूसरे से सटे हुए और अलग-थलग भी। चारों घरों के बीच में कोई बाउंड्री वाल नहीं है। यानी एक घर से दूसरे घर में जाना हो तो गेट खोलकर बाहर सडक पर निकलने की जरूरत नहीं। भीतर से ही एक एक दूसरे के यहां आना जाना हम लोग करते हैं। यह सुविधाजनक है।

यह अति संक्षिप्त जानकारी। रमेश भैय्या पर कुछ लिखने के पूर्व मुझे लगा हमारे स्थायी ठिकाने के बारे में बताना चाहिए। यह काम हो गया सो अब उन दिनों, महीनों व वर्षों की ओर लौटते हैं जहां से गुजरते हुए हम सभी अलग-अलग तिथियों में साठ पार कर गए। गिरीश चूंकि सबसे छोटा है अतः उसने अभी-अभी इस आंकड़े को स्पर्श किया है।

भाइयों में रमेश भैय्या के बाद मेरा ही नंबर है। हम उन्हें रमेश भाऊ कहकर संबोधित करते हैं।नागपुर के उन दिनों में जब हम छोटे थे तब उनके साथ खेलना-कूदना खूब चला। उन्हें पतंगबाजी का जबरदस्त शौक था। पतंगें वे उडाते थे, लडाते थे, काटते, कटते थे और मेरा काम था चक्री पकडना और वो काटा, वो काटा का शोर मचाना। कटी पतंगें व धागे को लूटना मेरे भी हिस्से का काम था जो और भी आनंददायक था।

हालत यह थी कि गणेश पेठ के अपने मकान की छत पर हम दोनों घंटों डटे रहते थे। आंखें आसमान की ओर टंगी रहती थी। पेंच लडती पतंगों को देखना व कटने पर छत से गुजरते मांजे या पतंग को पकडना बहुत मजा देता था। और जब हमारे पास उडाने के लिए अपनी पतंग नहीं रहती थी तब कटी पतंगों को लूटने का खेल चलता था।

आसमान में हिचकोले खाती, नीचे आती कटी पतंगों को ताकते, अन्य लड़कों से स्पर्धा करते हम तेजी से सडक पर दौडते थे, अनेक दफे राहगीरों से टकराते थे, उनकी गालियां खाते थे पर पतंग लूटने का मोह नही छोड़ते थे। अनेक दफे लडकों के साथ लुटी पतंग के लिए छीना झपटी होती थीं।

नतीजतन पतंग के अवशेष हाथ लगते थे। लेकिन जब कभी साबूत लुटी पतंग हाथ लगती तो उसका आनंद अद्भुत रहता था। यहीं हाल मांजा लूटने का भी। उसे लूटने के चक्कर में उंगलियां कट जातीं, खून निकल आता था पर हम परवाह नहीं करते थे और इस बात का ध्यान रखते थे कि घर में किसी को हवा न लगे कि उंगलियां घायल हैं।

पतंगबाजी से छुट्टी पाने के बाद कभी भंवरा, कभी गिल्ली डंडा व कांच की कंच्चियां हाथ में आ जातीं। छुट्टियों में करीब-करीब दिन भर हम दोनों बाहर ही रहते थे। कोई रोक टोक नहीं थी। बडे भैय्या साथ में थे, ढाल की तरह। कभी कभार घर में थोड़ी बहुत चिल्ला चोट होती तो भी अपन बचे रहते। अपने से बडे का मौजूद रहना, उनकी सरपरस्ती कितनी महत्वपूर्ण रहती है यह तब तो नहीं, बाद के वर्षों में ठीक समझ में आती है। उसकी अहमियत मालूम पडती है। उनकी मौजूदगी से मन में निश्चिंतता का भाव हमेशा बना रहता है।

रमेश भैय्या की प्राथमिक व मिडिल तक की शिक्षा उज्जैन में हुई। दादा-दादी के यहां। फिर वे हमारे साथ रहने नागपुर आए। शायद 54-55 में। मैं पांच छह साल का था। तब तक मुझे ज्ञात नहीं था कि मेरा कोई बडा भाई भी है। मुझे शंका हैं कि क्या उन्हें भी मालूम था कि उनके कितने भाई-बहन हैं व उनके नाम क्या हैं ? दादा दादी के पास बरसों रहे, इसलिए संभव है जैसे कि मैं नहीं जानता था, वे भी न जानते हों। लेकिन उनसे सत्य जानने की कोशिश जब मैं यह लिखने बैठा हूं ,तब भी नहीं की जबकि मैं उनसे आराम से पूछ सकता था।

दरअसल उनसे बीते हुए कल पर बातें कम ही होती हैं। खैर, मुद्दे पर लौटते हैं। नयी शुक्रवारी के मकान में एक दिन एक नया लडका नजर आया। मां ने बताया वे हमारे रमेश भैय्या थे। बडके भैय्या। यह पहला परिचय था। उन्हें देख बहुत प्रसन्नता हुई। हम दोनों के बीच उम्र का काफी अंतर था पर खेलने के लिए नया साथी मिल गया था। इसी वजह से मुझे शहर नागपुर स्मृतियों में अधिक प्रिय है क्योंकि हमने यहां बचपन के बहुत मजे लिए हैं।

1956 में नये राज्य के रूप में मध्यप्रदेश के अस्तित्व में आने के बाद जो घटनाएं घटीं उनमें महत्वपूर्ण थीं पिताजी का आल इंडिया रेडियो की नौकरी छोडना व बतौर संपादक ‘ नया खून ‘ साप्ताहिक का संपादन करना। बाद के क्रम में नागपुर से बोरिया बिस्तर समेट कर राजनांदगांव में शिफ्ट होना। राजनांदगांव ही वह पडाव था जहां मां व पिताजी ने महसूस किया होगा कि बडा लडका बडा हो गया है। लडके का बडा होना या ऊंचाई में पिता के कद के समकक्ष आना सुखद अनुभूति देता है जिसमें संतोष इस बात का रहता है जरूरत पडने पर बेटा भार उठा लेगा अथवा जिम्मेदारी बांट लेगा।

दुर्भाग्य से पिताजी को राजनांदगांव में जीवन के सात-आठ बरस से अधिक नहीं मिले। इस दौरान रमेश भाऊ ने दिग्विजय महाविद्यालय से बीएससी का इम्तिहान पास कर लिया था। वे ग्रेजुएट हो गये। जब लंबी बीमारी के बाद 11 सितंबर 1964 को नयी दिल्ली में पिताजी का देहांत हुआ तो स्वाभाविक रूप से बडे होने के नाते घर-परिवार को संभालने की जिम्मेदारी भैय्या पर आ गई । यह अच्छी बात रही कि उसी दौरान उन्हें भिलाई स्टील प्लांट में नौकरी मिल गई थी। हमारे जीने का , जीवन में सम्हलने का प्रबंध हो गया था।

पिताजी के निधन के बाद परिवार भिलाई शिफ्ट हो गया था। सहारे के लिए, परवरिश के लिए घर में मां थीं। दिन भर खटती थी। कही आना-जाना नहीं। राजनांदगांव में काफी घर थे जहां वे अपनी सहेलियों से मिलती थीं पर भिलाई उनके लिए एकदम ड्राई। उपर से ,पिताजी के असामयिक निधन के शोक से वे वर्षों तक उबर नहीं पाई। बात-बात में उन्हें याद करके उनकी आंखें भर आती थीं। यह सिलसिला उनके जीवन के अंत तक चलता रहा। समय के साथ वह कम हुआ पर मिटा नहीं। मिट भी नही सकता था। ऐसे में रमेश भैय्या मां के साथ हमारे भी सबसे बडे संबल बने हुए थे।

राजनांदगांव हमारे लिए तीर्थस्थल जैसा है। अमिट यादों का तीर्थस्थल। दिग्विजय कालेज में लेक्चररशिप मिलने के बाद पिताजी ने वसंतपुर में किराए का मकान लिया। बडे भैय्या पिताजी के साथ पहले ही राजनांदगांव आ गए थे। नागपुर से साजो सामान सहित हम लोग यानी मां व छोटे भाई बहन कुछ दिनों बाद नांदगांव आए। वसंतपुर उस समय शहर से काफी दूर बाहरी इलाके की छोटी सी बस्ती थी। रमेश भैय्या का एडमिशन महंत सर्वेश्वर दास हायर सेकंडरी स्कूल में हुआ जो कि नगर पालिका के अधीन था। इसी स्कूल के परिसर में प्राथमिक विद्यालय भी था जिसे गोल स्कूल कहा जाता है। यह भी पालिका के द्वारा ही संचालित था।

यहां मैं पढता था, कक्षा चौथी। रमेश भैय्या अक्सर सायकिल पर मुझे बैठाकर स्कूल छोडते व बाद में अपनी क्लास जाते। वे 11 वी में थे। भोजनावकाश के समय हम नजदीक ही स्थित टाउनहाल में चले जाते थे। वहां के बगीचे में किसी पेड़ के नीचे बैठकर खाना खाते थे। जब हम लोग वसंतपुर से दिग्विजय कालेज परिसर के मकान में शिफ्ट हुए तब यह सिलसिला बंद हुआ। कालेज प्रबंधन ने पुरानी जीर्णशीर्ण इमारत, जो छोटे से महल जैसी थी, को रहने लायक बना दिया था। मकान से हमारा स्कूल नजदीक ही था। इसलिए टाउनहाल का चक्कर समाप्त हो गया।

बडे भाई चूंकि बडे हो गए थे, कालेज पहुंच गए थे और उनके अनेक नये दोस्त भी बन गए थे लिहाजा बचपन के खेल हवा हो गए। और तो और पतंगबाजी का नशा भी उतर गया। चूंकि दिग्विजय कालेज का यह मकान काफी बडा था, दो मंजिला जिसके भूतल पर अलग-थलग दो कमरे थे , अतः उनमें से एक उन्हें मिल गया। वे कालेज के छात्र हो गए थे अतः उनकी दिनचर्या बदल गई थी। अब उनके साथ मिल बैठकर गप्पे लडाने के लिए खाली समय का अकाल सा पड गया था हालांकि मुझे कोई दिक्कत इसलिए नहीं हुई क्योंकि मैंने अनुज दिलीप को पकड़ लिया था जो मुझसे पांच साल छोटा था। उसके साथ भागमभाग करने के अलावा उन्हीं दिनों मुझे कहानियां व उपन्यास पढने का चस्का लग गया था। दादी के लिए पिताजी कालेज की लाइब्रेरी से उपन्यास लाते थे। वे भी पढती थीं, मैं भी। इसके अलावा कालेज परिसर में और भी दोस्त बन गए थे अतः आनंद ही आनंद था।

एक घटना याद आती है जब मैंने मां को बहुत परेशान व चिंतित होते देखा। पिताजी भी परेशान थे। दरअसल रमेश भैय्या एनसीसी में थे। दिग्विजय महाविद्यालय के एनसीसी केडेट्स का केम्प चेन्नई के पास कोडाईकनाल में लगा। शायद दस दिन का यह केम्प था। यह अवधि समाप्त होने के बाद शिविर के सभी केडेट्स अपने अपने घर लौट आए। मां व पिताजी भी भैय्या के लौटने की प्रतीक्षा कर रहे थे। जब एक एक करके दिन बितते गए और वे नहीं आए तो मां चिंता में पड गई। रोने धोने लग गई। परेशान पिताजी ने स्थानीय एनसीसी के कमांडिंग आफिसर से बातचीत की। उन्हे कोडाईकनाल से सूचना मिली कि समय पर केम्प खत्म हो गया। सब चले गए हैं। इस सूचना से चिंता द्विगुणित हो गई।

रिश्तेदारों से पूछताछ शुरू हुई तो पता चला कि भैय्या नागपुर में अपने चाचा शरच्चन्द्र जी के यहां हैं। कोडाईकनाल से वे राजनांदगांव न आकर चाचाजी के यहां चले गए थे। उन्होंने संभवतः कल्पना नहीं की थी कि समय पर घर न लौटने से परिवार विशेषकर मां पर क्या बितेगी। यकीनन बाद में उन्हें इस बात का पछतावा हुआ होगा कि उनसे गलती हुई। बहरहाल उनकी खैरियत की खबर पाकर मां की जान में जान आई तथा पिताजी भी चिंता मुक्त हुए। कुछ दिनों बाद भैय्या घर आ गए और बात आई गई हो गई। लेकिन मेरे मन में मां व पिताजी की भैय्या को लेकर वह परेशानहाल छवि स्थायी तौर पर अंकित हो गई।

एक और वाकया। मैं मिडिल का विद्यार्थी था जब एस्थमा ने मुझे अपनी गिरफ्त में लिया। बार बार दमे के अटैक से मां व पिताजी बहुत चिंतित थे। मां मुझे घंटों गोद में लेकर बैठती थीं। लेट नहीं सकता था क्योंकि ऐसा करने से सांसें और तेज हो जाती थीं। काफी दिनों तक चली दवाओं से जब कोई विशेष लाभ नहीं हुआ तो यह सोचा गया कि घर के आजूबाजू बडे तालाबों की वजह से हवा में जो आद्रता आती है वह एस्थमा का एक कारण हो सकता है अतः इस वातावरण से परे किसी दूसरी जगह मेरे रहने की व्यवस्था की जाए।

लिहाजा घर से तीन चार किलोमीटर दूर बीएनसी मिल्स एरिया की लेबर कालोनी में एक रूम किचन का क्वार्टर जिसमें सभी आवश्यक सुविधाएं थीं, किराए पर लिया गया। यहां मैं और भैय्या रहने लगे। घर से टिफिन आता था। कभी मां, कभी पिताजी लेकर आते तो कभी बडे भाई लेने चले जाते। हम जितने महीने यहां रहे, उन्होंने मेरा बहुत ध्यान रखा। यह आश्चर्यजनक था कि हवा पानी बदलते ही चंद महीनों के भीतर मेरा एस्थमा छूमंतर हो गया। मैं एकदम स्वस्थ हो गया। पर दुर्भाग्य से पिताजी बीमार पड़ गए। जानलेवा बीमारी ने उन्हें जकड़ लिया। तब लेबर कालोनी के मकान को छोड़कर हम घर लौट आए।

भैय्या के मिजाज के बारे में थोड़ा सा बता दूं। विनम्र हैं , मिलनसार हैं लेकिन वक्त जरूरत पर कठोर भी। फटाफट निर्णय लेते हैं और उस पर अडिग रहते हैं। तर्क शक्ति लाजवाब। व्यवस्था में नंबर एक। उनका हर काम व्यवस्थित, चीजें व्यवस्थित, हर वस्तु उसकी निश्चित जगह पर ताकि ढूंढने की गरज ही न पडे। इतना तगड़ा अनुशासन बहुत कम देखने में आता है। कम से कम मेरे बस का तो नहीं। सबसे महत्वपूर्ण बात, वे बहुत मेहनती है। जो भी काम हाथ में लेते हैं, उसे ढंग से पूरा करके छोडते हैं। उनका सर्वाधिक महत्वपूर्ण कार्य है पिताजी की समस्त अप्रकाशित रचनाओं का एकत्रीकरण, उनका संपादन, संयोजन व प्रकाशन।

यह बहुत जटिल व भारी मेहनत काम था जिसमें महीनों, बरसों लगना तो तय ही था, अधिक महत्वपूर्ण था रचनाओं के प्रति गहरी समझ रखना तथा विभिन्न विधाओं में किए गए लेखन का क्रम तय करना। रिटायरमेंट के बाद अपना समूचा वक्त देते हुए उन्होंने इस काम को पूरा किया। दरअसल राजनांदगांव में पिताजी के एकाएक बीमार पडने के बाद घर में सब कुछ अस्तव्यस्त था। मां, पिताजी की देखरेख के लिए भोपाल के हमीदिया हास्पीटल में थीं और उनकी गैरमौजूदगी में घर जैसे भांय भांय कर रहा था।

यह संभवतः मार्च 1964 की बात है। हमारी स्कूली परीक्षाएँ प्रारंभ नहीं हुई थी। एप्रिल में उनके निपटने के बाद बडे भैया के साथ जब हम भाई-बहन राजनांदगांव से भोपाल गये तब पिताजी के लिखे कागजों का आधा खुला आधा बंद गठ्ठर एक कमरे में यों ही पडा हुआ था। चिंता पिताजी के स्वास्थ्य की थी। वे गर्मियों के दिन थे। बताते हैं एक दिन खूब तेज हवा चली और लिखे कागजात उडने लग गए। उन्हें किसने इकट्ठा किया, सभी मिले कि नहीं, मुझे ज्ञात नहीं। मैंने केवल इस बारे में सुना था। इसलिए कह नहीं सकता यह बात कहा तक सच है। बहरहाल भोपाल से हम लोग राजनांदगांव नहीं आ सके। प्रमोद वर्मा जी के साथ भिलाई आए , उनके यहां रहे जबकि मां, रमेश भैय्या व हरिशंकर परसाई जी अर्द्ध चेतनावस्था में पडे पिताजी को लेकर ट्रेन से दिल्ली गए जहाँ उन्हें एम्स में भर्ती किया गया।

पिताजी का लेखन विपुल था। विचारों के झंझावात में एक ही कविता के अनेक ड्राफ्ट बने थे। कुछ ऐसी ही स्थिति कहानी, निबंध व इतर लेखन की थी। अनेक लिखे पेपर इतने पुराने हो चुके थे कि पीले पड गए थे। हाथ से उठाने पर फटने का अंदेशा रहता था। कुछ के कोने फट गये थे लिहाजा शब्द अधूरे। कुल मिलाकर कठिन काम था, श्रमसाध्य। भाई साहब ने भिलाई स्टील प्लांट की नौकरी से रिटायरमेंट के बाद ठीक से मोर्चा संभाला। यद्यपि छुटपुट काम नौकरी के दिनों में भी चल ही रहा था। उन्होंने सबसे पहले लिखे का वर्गीकरण किया। कविता, कहानी, आलोचना, निबंध, समीक्षा, राजनीतिक लेख, राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय सवालों पर टिप्पणियां, अधूरी कविताएं, अधूरी कहानियां, अधूरी समीक्षाएं, अधूरे निबंध, अधूरी आलोचनाएं, अधूरे पत्र, आदि आदि। उन्होंने सभी का पुष्ट या संभावित रचनाकाल निकाला।

यह सब व्यवस्थित करने के बाद उन्होंने बहुतेरे लेखन का पुनर्लेखन किया तथा सभी की फोटोकॉपी कर अलग अलग सेट तैयार किये। पिताजी की लिखावट में जहां जो शब्द समझ में नहीं आए, वहां लोगों से परामर्श लिया। उन्होंने सर्वश्री अशोक वाजपेयी, विनोद कुमार शुक्ल व डा. राजेंद्र मिश्र से काफी मदद ली। यही नहीं, देश की विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित रचनाओं जिनकी मूल अथवा फोटो प्रति घर में उपलब्ध नहीं थी, उनकी जानकारी हासिल की व इसके लिए अनेक शहरों के दौरे भी किए।

भोपाल के माधव राव सप्रे संग्रहालय सहित अन्य शहरों के वाचनालयों में घंटों बैठकर उनका लेखन किया या फोटो कापियां निकालीं। इस कठोर परिश्रम का फल यह निकला कि 1984 में प्रकाशित छह खंडों की मुक्तिबोध रचनावली में दो नये खंड और जुड गए और वह बढकर ‘ मुक्तिबोध समग्र ‘ के नाम से आठ खंडों की हो गई। प्रायः हर पुराने खंड में नयी सामग्री जुड़ी व समग्र चार हजार से अधिक पन्नों का हो गया। इसके प्रकाशन के पूर्व, पूर्ण अथवा अधूरे राजनीतिक-गैर राजनीतिक रचनाओं व अन्य अप्रकाशित विविध लेखन की दो किताबें प्रकाशित हुई। पत्रों व संस्मरणों की वृहद किताब आई।

यानी पिताजी का तमाम अप्रकाशित साहित्य पाठकों के सामने आ गया। और यह भैय्या की वजह से संभव हुआ। मुझे नहीं लगता इस सलीके से कोई और व्यक्ति यह काम कर सकता था। इसीलिये अशोक वाजपेयी जी ने अनेक अवसरों पर भैय्या के परिश्रम का उल्लेख करते हुए ठीक कहा कि हिंदी साहित्य जगत को रमेश मुक्तिबोध का आभारी रहना चाहिए जिनकी बदौलत मुक्तिबोधजी का तमाम रचनाकर्म पाठक समाज के समक्ष आ सका। अब उनका ज्यादातर समय अध्ययन में बीतता है। हर रोज शाम को हम चारों भाई घंटे दो घंटे साथ में बैठते हैं। इधरउधर की खूब बातें करते हैं। जिंदगी मजे से चल रही है।

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