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सुरेश महापात्र।
27 फरवरी 2026 को दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने दिल्ली एक्साइज पॉलिसी (कथित शराब घोटाला) मामले में एक बड़ा फैसला सुनाया। विशेष सीबीआई अदालत ने अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, के. कविता और कुल 23 आरोपियों को पूरी तरह डिस्चार्ज कर दिया। कोर्ट ने साफ कहा कि सीबीआई द्वारा पेश चार्जशीट में कोई ठोस सबूत नहीं हैं—न कोई “ओवरआर्चिंग कांस्पिरेसी” (व्यापक साजिश), न कोई “क्रिमिनल इंटेंट” (अपराधी मंशा)।
जज जितेंद्र सिंह ने 598 पन्नों के आदेश में CBI जांच को “अनुमान और कयास” पर आधारित बताया, जिसमें सुनवाई के बिना ही कई प्रक्रियागत खामियां और गवाहों के बयानों में विरोधाभास थे। कोर्ट ने जांच अधिकारी पर विभागीय जांच के आदेश भी दिए, क्योंकि बिना पर्याप्त सामग्री के आरोप लगाए गए।यह फैसला डिस्चार्ज है, न कि एक्विटल—यानी ट्रायल शुरू होने से पहले ही केस खारिज हो गया, क्योंकि प्रारंभिक स्तर पर ही “ग्रेव सस्पिशन” (गंभीर संदेह) का अभाव था।
सीबीआई ने फैसले के कुछ घंटों बाद ही दिल्ली हाई कोर्ट में अपील दाखिल कर दी है, लेकिन फिलहाल यह AAP के लिए बड़ी राहत है। केजरीवाल ने खुद को “कट्टर ईमानदार” बताते हुए प्रधानमंत्री मोदी को दिल्ली में तुरंत चुनाव कराने की चुनौती दी है।इसके साथ ही एनफोर्समेंट डायरेक्टोरेट (ED) की भूमिका और PMLA (Prevention of Money Laundering Act, 2002) कानून पर सवाल उठ रहे हैं। ED ने CBI की FIR को आधार बनाकर 22 अगस्त 2022 को मनी लॉन्ड्रिंग का केस दर्ज किया था।
ED का आरोप था कि नीति में loopholes बनाकर चुनिंदा शराब व्यापारियों (साउथ ग्रुप) को फायदा पहुंचाया गया, बदले में AAP को kickback मिले—जिनमें से 100 करोड़ रुपये विजय नायर के जरिए आए और hawala/shell companies से लॉन्ड्रिंग हुए। ED ने केजरीवाल को “kingpin” बताया, संपत्तियां अटैच कीं और गिरफ्तारियां कीं (केजरीवाल 5 महीने, सिसोदिया 17 महीने जेल में रहे)। PMLA कानून के तहत मनी लॉन्ड्रिंग तभी साबित हो सकती है, जब कोई predicate offence (आधारभूत अपराध, जैसे भ्रष्टाचार) साबित हो।
CBI केस के collapse से ED का केस कमजोर पड़ सकता है, क्योंकि अब “proceeds of crime” का आधार ही खत्म हो गया है। हालांकि ED का दावा है कि उनकी जांच “standalone” है और उनके पास अलग सबूत हैं, लेकिन कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि predicate offence के बिना PMLA केस टिक पाना मुश्किल होगा।
आरोपियों की ओर से ED केस quash करने की याचिका दायर होने की संभावना है।राजनीतिक नजरिए से यह फैसला जांच एजेंसियों की विश्वसनीयता पर गहरा सवाल उठाता है। AAP इसे “राजनीतिक साजिश” और “केंद्रीय एजेंसियों के दुरुपयोग” का प्रमाण बता रही है, जबकि BJP ने पहले इसे “मदर ऑफ ऑल स्कैम्स” कहा था।
अब CBI केस के खारिज होने से विपक्षी एकता मजबूत हो सकती है, खासकर दिल्ली चुनावों के मौके पर। लेकिन अगर हाई कोर्ट में अपील सफल हुई या ED का PMLA केस मजबूत साबित हुआ, तो लड़ाई नया मोड़ ले सकती है।न्याय व्यवस्था ने दिखाया है कि बिना ठोस सबूत के कोई भी केस नहीं टिक सकता।
लेकिन जब जांच राजनीतिक हथियार बन जाती है, तो लोकतंत्र की नींव हिलती है। CBI और ED जैसी एजेंसियां भ्रष्टाचार रोकने के लिए हैं, न कि राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाने के लिए। इस मामले से सबक लेना होगा—साक्ष्य-आधारित जांच ही सच्चाई सामने ला सकती है, अनुमान नहीं। अंत में, सत्य की जीत होनी चाहिए, चाहे किसी की भी हो।
