कुंडली में शनि वक्री: स्वभाव में बदलाव और इससे मिलने वाले अनुभव
यदि शनिदेव कुंडली में तृतीय, षष्ठ और एकादश भाव में आसीन हों, तो अपनी दशा में हानि नहीं लाभ का कारक बनते हैं। तब शनि से संबंधित कर्म अपार धन, संपत्ति व सफलता का सबब बनते हैं। तब तेल, चमड़े, लोहे, स्टील, मशीनरी, सर्विसिंग, कोयले व खनिज के क्षेत्र में बड़ी सफलता मिलती है। शनि यदि कुंडली के दशम स्थान में हों, तो व्यक्ति न्यायप्रिय, भाग्यशाली, उदार और धनवान होता है। ये लोग विलक्षण सुप्त क्षमता के मालिक होते हैं। जो कहा जाता है या दिखाया जाता है, ये उसे
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