‘देवजी’ के समर्पण से माओवाद के अंत का ऐलान… सवाल देवजी के साथ समर्पित माओवादियों के हथियार कहां हैं?

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सुरेश महापात्र।

बस्तर सहित पूरे दंडकारण्य क्षेत्र में दशकों से आतंक का पर्याय बने माओवादी नेता थिप्पिरी तिरुपति उर्फ देवजी के आत्मसमर्पण ने न केवल माओवादी संगठन की कमर तोड़ दी है, बल्कि उनकी जनताना सरकार के पूरे ढांचे को भी चरमरा दिया है। 24 फरवरी 2026 को तेलंगाना पुलिस के समक्ष समर्पण करने वाले देवजी के साथ संग्राम, चंद्रन्ना, दामोदर और गगन्ना जैसे वरिष्ठ नेता भी मुख्यधारा में लौट आए। यह घटना दंडकारण्य के जंगलों में माओवाद के सैन्य और राजनीतिक तंत्र का अंत मानी जा रही है।

देवजी, जो सीपीआई (माओवादी) के पोलितब्यूरो सदस्य और सेंट्रल कमेटी के प्रमुख नेता थे, 44 वर्षों तक जंगलों में सक्रिय रहे। तेलंगाना के जगतियाल जिले के कोरुटला गांव के निवासी इस दलित नेता ने छात्र राजनीति से अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत की और बाद में दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी के कमांडर बने। उन्होंने कई बड़े हमलों की योजना बनाई थी। उनके समर्पण के बाद संगठन की सेंट्रल कमेटी में अब केवल एक सक्रिय सदस्य शेष रह गया है, जबकि तेलंगाना की पूरी कमेटी लगभग निष्क्रिय हो चुकी है। तेलंगाना पुलिस प्रमुख ने इसे माओवाद के लिए निर्णायक झटका बताया है।

यह भी ध्यान देना जरूरी है कि माओवादी नेता देवजी पर बस्तर के वरिष्ठ आदिवासी नेता और पूर्व विधायक मनीष कुंजाम ने गंभीर आरोप लगाए थे। उनका कहना था कि नवंबर 2025 में आंध्र प्रदेश के मरुदुमिल्ली के जंगलों में हुई मुठभेड़ में माओवादी कमांडर माड़वी हिड़मा और उनकी पत्नी मड़कम राजे की मौत एक फर्जी मुठभेड़ थी, जिसकी साजिश देवजी ने राजनीतिक लाभ के लिए रची। कुंजाम ने दावा किया कि देवजी ने बस्तर के आदिवासी युवाओं को समर्पण के नाम पर आंध्र प्रदेश ले जाकर फंसाया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि आंध्र और तेलंगाना के बड़े माओवादी नेता बस्तर के आदिवासियों के कंधों पर बंदूक रखकर अपना आर्थिक साम्राज्य चलाते रहे, जबकि स्वयं सुरक्षित रहे।

इस घटना से पूर्व छत्तीसगढ़ के गृह मंत्री विजय शर्मा सुकमा के पुवर्ती गांव पहुंचे थे और हिड़मा की मां से मुलाकात कर समर्पण की अपील की थी। उस समय यह चर्चा थी कि हिड़मा समर्पण के इच्छुक था, किंतु देवजी ने इसका विरोध किया। पुलिस ने इन आरोपों को भ्रामक सूचना करार दिया, परंतु इससे माओवादी संगठन के भीतर की आंतरिक कलह उजागर हो गई।

अब देवजी सहित इन सभी नेताओं ने संवैधानिक ढांचे में शांतिपूर्ण जीवन व्यतीत करने का निर्णय लिया है। तेलंगाना सरकार की पुनर्वास नीति के तहत उन्हें पुरस्कार राशि और पुनर्वास पैकेज प्रदान किया जाएगा। कुछ सूत्रों के अनुसार, ये नेता अब लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेकर चुनाव लड़ने की तैयारी में भी हैं। यह भी उल्लेखनीय है कि देवजी के साथ समर्पित माओवादियों द्वारा हथियार सौंपा गया है या नहीं इसका भी उल्लेख कहीं नहीं है। देवजी ही वह चेहरा रहा जिसने बस्तर में माओवादी आतंकवाद को बढ़ावा देने में मुख्य भूमिका अदा की।

सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर बीजापुर के गणेश मिश्रा पत्रकार जिन्होंने इलाके में माओवादी घटनाओं में लगातार दशकों तक काम किया है वे भी देवजी के द्वारा हथियार नहीं सौंपे जाने पर सवाल उठा रहे हैं। उनकी पोस्ट में यह दर्ज है ’45 वर्षों से बस्तर में खूनी खेल को अंजाम देने वाले देवजी,दामोदर,संग्राम और गगन्ना हथियार लेकर क्यों नही आये? इनके और इनके टीम के 200 से अधिक ऑटोमेटिक हथियार कहाँ है?’

अपने ही एक और पोस्ट पर उन्होंने फिर लिखा है ‘बटालियन के नाम पर हिड़मा और देवा तो सिर्फ मोहरा थे। जिसके हांथो में वास्तविक कमान थी वो तो CM के साथ फोटो सेशन कर रहा है। नरसिम्हा रेड्डी उर्फ़ गगन्ना उर्फ़ सन्नू दादा…’ वैसे वर्ष 2025-26 में ही 544 से अधिक माओवादी कैडर समर्पण कर चुके हैं। तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी ने इन नेताओं से भेंट कर उनका स्वागत किया।

इस पोस्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए सेवानिवृत्त पुलिस उप महानिरीक्षक कमलोचन कश्यप जिन्हें हाल ही में संविदा नियुक्ति प्रदान की गई है उन्होंने कहा है ‘यह बात आज लोगों को समझ में आ रही है आज से 25 वर्ष पहले जब हम यह बात लोगों को बोलते थे तो लोग मानने को तैयार नहीं थे और उन लोगों को लगता था कि ये नक्सली बहुत बड़ा सामाजिक आर्थिक समानता के लिए क्रांति लेकर आए हैं लेकिन उनकी नियत को समझने की कोई कोशिश नहीं कर रहा था…’

आत्मसमर्पित माओवादियों के बड़े कैडर द्वारा चुनाव लड़ने के संकेत पर मीडिया के सवाल का जवाब देते छत्तीसगढ़ के गृहमंत्री विजय शर्मा ने साफ कर दिया है कि ‘यदि कोई हिंसा का रास्ता छोड़कर लोकतंत्र के रास्ते से चुनाव लड़कर जनता की सेवा करना चाहता है तो कोई दिक्कत नहीं है।’

यह समर्पण दंडकारण्य में माओवादियों की समानांतर जनताना सरकार के अंत का प्रतीक माना जा रहा है। दशकों तक स्कूलों, अस्पतालों, पुलिस चौकियों और विकास योजनाओं को निशाना बनाकर माओवादियों ने आदिवासी क्षेत्रों में अपना प्रभाव बनाए रखा था, किंतु अब सुरक्षा बलों की सघन कार्रवाइयों, सड़कों के निर्माण, मोबाइल टावरों की स्थापना और विकास कार्यों ने उनके प्रभाव को काफी हद तक समाप्त कर दिया है।

केंद्र सरकार ने बस्तर को नक्सल-मुक्त बनाने की अंतिम तिथि 31 मार्च 2026 निर्धारित की है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने अनेक अवसरों पर कहा है कि इस तिथि तक देश से नक्सलवाद का पूर्ण उन्मूलन कर दिया जाएगा। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में सुरक्षा, पुनर्वास और विकास की त्रिस्तरीय रणनीति तीव्र गति से लागू की जा रही है।

बस्तर में परिवर्तन स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। जंगलों में नई सड़कें बन रही हैं, प्रशासन की पहुंच बढ़ी है और निरंतर अभियानों से माओवादी नेटवर्क कमजोर हुआ है। समर्पित कैडरों को ड्राइविंग, सिलाई, विद्युत कार्य, कृषि और लघु उद्योगों का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। परिवार पुनर्मिलन, स्वास्थ्य, शिक्षा और मनोवैज्ञानिक परामर्श जैसी सुविधाएं भी उपलब्ध कराई जा रही हैं। गांवों में बिजली, पानी, अस्पताल, विद्यालय, मोबाइल टावर और बस सेवाएं पहुंच चुकी हैं। आधुनिक कृषि, मत्स्य पालन तथा आदिवासी विरासत के संरक्षण पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। बस्तर ओलंपिक जैसी पहल से युवा मुख्यधारा से जुड़ रहे हैं और राष्ट्रीय पर्व खुले रूप में मनाए जा रहे हैं।

अमित शाह ने स्पष्ट कहा है कि जो लोग हथियार छोड़ेंगे, उन्हें रोजगार और सम्मान प्रदान किया जाएगा। बस्तर अब संघर्ष की सीमा से निकलकर मुख्यधारा की ओर अग्रसर है। जहां पहले बंदूकों की गूंज सुनाई देती थी, वहां अब विकास की ध्वनि सुनाई दे रही है।

देवजी के समर्पण ने न केवल दंडकारण्य में माओवाद की जनताना सरकार को समाप्ति की ओर अग्रसर किया है, बल्कि बस्तर के आदिवासियों को नई आशा भी दी है। आंध्र-तेलंगाना के नेताओं द्वारा बस्तर के आदिवासियों के कथित शोषण का अध्याय अब समाप्ति की ओर है। 31 मार्च 2026 की समय-सीमा केवल एक तिथि नहीं, बल्कि बस्तर के लाखों आदिवासियों के सपनों को साकार करने का संकल्प है। यदि सुरक्षा, विकास और पुनर्वास की यह मुहिम निरंतर जारी रही, तो दंडकारण्य शीघ्र ही शांति और समृद्धि का प्रतीक बन सकता है। यह माओवाद के अंत और बस्तर के एक नए युग की शुरुआत का संकेत है।

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