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Articles By Namesafarnama

साहित्यिक बिरादरी उन्हें साहित्यकार नहीं मानती तथा पत्रकार खालिस पत्रकार का दर्जा नहीं देते… साहित्यिक पत्रकारिता में सुधीर जरूरी हस्ताक्षर है इसलिए संभव है निकट भविष्य में इस विधा में भी कोई संकलन सामने आए…

छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता के आधार स्तंभों में से एक दिवाकर जी… ने पत्रकारिता को पढ़ा है, जिया है और अब भी जी रहे हैं… वे अपना सफ़रनामा लिख रहे हैं… कुछ यादें कुछ बातें-12

कवि-पत्रकार मित्र सुधीर सक्सेना पर संस्मरण की इस कड़ी के साथ ही ‘कुछ यादें कुछ बातें’ शृंखला पर अल्प विराम। इसी शीर्षक से कुछ और यादें जो प्रदीर्घ हैं, कुछ ठहरकर फ़ेसबुक पर नमूदार होंगी। समापन कड़ी के साथ पत्रकारिता की यादों के इस सफ़र में मुझे सबसे अच्छी बात यह लगी कि मित्रों ने प्रतिक्रिया में अपनी यादें साझा की, सभी को दिल से याद किया, आदरांजलि दी। मेरा मक़सद पूरा हुआ।तो फिर मिलते हैं कुछ समय बाद। शुक्रिया…

-दिवाकर मुक्तिबोध.

सुधीर सक्सेना, एक ऐसा कवि पत्रकार जो इस बात से बेचैन है कि साहित्यिक बिरादरी उन्हें साहित्यकार नहीं मानती तथा पत्रकार खालिस पत्रकार का दर्जा नहीं देते। एक लेखक – पत्रकार की ऐसी बेचैनी स्वाभाविक है। सुधीर ने मन की इस पीड़ा को कहीं व्यक्त किया था। चूंकि ऐसी कोई बातचीत मेरे सामने या मुझसे नहीं हुई इसलिए कह नहीं सकता इसमें कितनी सत्यता है लेकिन यदि वह सच है तो क्या सुधीर का यह क्षणिक असंतोष था जो अनायास बाहर फूट पड़ा? अपनी पहचान को लेकर वे इतने उद्वेलित क्यों हुए? उन्हें इस बात का मलाल क्यों हैं जबकि वे अच्छीी तरह जानते हैं कि रचनात्मकता का मूल्यांकन एवं रचना कर्मियों का दर्जा समाज तय करता है, बिरादरियां तय करती हैं। साहित्यिक बिरादरी, पत्रकार बिरादरी।

इसलिए सुधीर सक्सेना को विचलित होने की जरुरत नहीं है कि उन्हें देश-प्रदेश का विशाल पाठक वर्ग किस रुप में देखता है और किस रुप में ज्यादा पसंद करता है। इस संदर्भ में एक बात तो निश्चित तौर पर कही जा सकती है कि वे विलक्षण प्रतिभा के धनी हैं और हिंदी साहित्य व पत्रकारिता में तेज दखल रखने वालों की जमात में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। ऐसा स्थान जो हर किसी को नसीब नहीं होता। आखिरकार ऐसे लोग उंगलियों पर गिने जा सकते हैं, जो कवि, लेखक होने के साथ पत्रकार भी रहे हैं और जिनकी साहित्यिक पत्रकारिता को भी बड़ा मान सम्मान मिला हुआ है।

पिछली पीढ़ी के अज्ञेय, श्रीकांत वर्मा, मुक्तिबोध, रघुवीर सहाय, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, धर्मवीर भारती, विनोद भारद्वाज आदि और वर्तमान दौर के मंगलेश डबराल, प्रयाग शुक्ल, किशन कालजयी, ललित सुरजन, तेजेंदर, आशुतोष भारद्वाज सहित अन्य कई नाम है जिन्होने मूल्यपरक पत्रकारिता की। ऐसा लेखन किया जिससे इस विधा को नई दिशा मिली। मेरी दृष्टि में सुधीर भी इसी श्रेणी के पत्रकार हैं।सुधीर से मेरा संपर्क बरसो पुराना है। हमारी मैत्री को लगभग चार दशक हो गए है। संपर्क में अनिरंतरता के बावजूद आत्मीयता कायम रही और अभी भी है। दरअसल सुधीर यायावर थे, रायपुर में कुछ ही बरस रहे फिर कुछ नया हासिल करने के लिए उनकी जिंदगी में भटकाव का दौर शुरु हुआ। कभी यहां – कभी वहां, इस शहर से उस शहर। हालांकि वे लंबे समय तक भोपाल में रहकर ‘माया’ को देखते रहे, विशेष संवाददाता के रुप में।

लेकिन इस दौरान उनसे संवाद की रफ्तार धीमी पड़ती गई और अंतत: थम सी गई। मुझे याद है वर्ष 1978 के वे कुछ दिन। रायपुर में फूल चौक वाली गली में समाचार एजेंसी ‘समाचार भारती’ के दफ्तर में वे काम करते थे, शहर एवं गाँव-देहातों के समाचारों के संकलन का। मैं था देशबंधु में। वहीं उनसे पहली मुलाकात हुई। यह मुलाकात जल्द ही दोस्ती में बदल गई। मेल मुलाकात का सिलसिला चल निकला। उस वक्त तक मुझे ज्ञात नहीं था कि सुधीर कविताएं भी लिखते हैं। मैं उन्हें विशुद्ध पत्रकार समझता था जिनकी समग्र समाज को देखने की पत्रकारीय दृष्टि बहुत पैनी थी तथा जिनके पास शब्दों का अकूत भंडार था हालांकि न्यूज एजेंसी में अमूमन भाषाई कौशल की जरूरत नहीं पड़ती।

सीधी सपाट शैली में खबरें लिखी जाती हैं जो हर आम आदमी की समझ में आए। इसलिए सुधीर मेरे लिए सिर्फ एक न्यूज एजेंसी के पत्रकार थे। सुधीर को मैं प्रखर सुधीर तब समझने लगा जब ‘माया’ में उसकी रिपोर्ट्स छपने लगी। ऐसा भाषाई सामर्थ, तथ्यामकता के साथ कथात्मकता व मोहक शैली में छपने वाली उनकी राजनीतिक एवं गैरराजनीतिक रिपोर्ट्स से मुझे अहसास हुआ कि सुधीर बड़े पत्रकार हैं। निष्पक्ष और पेशे के प्रति ईमानदार।जैसा कि मैने कहा सुधीर से लगाव, आत्मीयता और मैत्री उनकी पत्रकारिता की वजह से बनी हालांकि कवि सुधीर से मेरी अनभिज्ञता बनी रही। हिन्दी साहित्य में मेरी खासी दिलचस्पी है, विशेषकर उपन्यासों का मै अच्छा पाठक हूं। बचपन से पढ़ता रहा हूं लेकिन कविताओं में मेरी कोई खास रुचि नहीं है।

भूले भटके अनायास कविता की कोई किताब हाथ में आ जाए तो उसमें डूबने का यत्न करता हूं। खुद होकर कविताओं को ढूंढने की कोशिश नहीं करता शायद इसलिए सुधीर के ‘कवि’ से मेरी कभी कोई मुलाकात नहीं हुई। मैं उन्हें पत्रकार के रूप में जानता रहा। 1978 के बाद अगले लगभग ढाई दशक तक सुधीर से मेरी यदा-कदा से ही बातचीत हुई वह भी फोन पर। हालांकि वे रायपुर-बिलासपुर आते रहे पर मुलाकातें नहीं हुई। एक साथ घंटों समय बिताने का कोई संयोग हाथ नहीं लगा अलबत्ता इस बीच में मै उनके साहित्यिक अवदान के बारे में काफी कुछ सुनता रहा। आम आदमी की जिंदगी से लिपटी उनकी कविताएं, उनका सौंदर्य और उनमें बेहतर कल की प्रतिध्वनियां एक दशक में काफी तेज सुनाई देने लगी थी।

वे एक प्रख्यात कवि और लेखक की श्रेणी में आ चुके थे। उनके काव्य संग्रह ‘कभी न छीने काल’, ‘बहुत दिनों बाद’, ‘समरकंद में बाबर’, ‘रात जब चंद्रमा बजाता है बांसुरी’, ‘किरच किरच यकीन’ और ‘कुछ भी नहीं है अंतिम’ चर्चित है। विशेषकर समरकंद में बाबर को खास प्रतिष्ठा हासिल है। उनकी सद्य प्रकाशित किताब ‘गोविंद की गति गोविंद’, कांग्रेस के बड़े नेता व रचनाधर्मी स्व. सेठ गोविंददास पर केंद्रित है। इस महती जीवन-गाथा को तैयार करने में उन्होंने खासी मेहनत की है और काफी वक्त दिया है।सुधीर सक्सेना की कलम यात्रा बीते चार दशक से अवनरत चल रही है। आश्चर्य होता है कि वे इतना विधिवता पूर्ण, विपुल और सार्थक लेखन कैसे कर लेते हैं। यात्राएं भी करते हैं। जीवन गाथाएं भी लिखते है।

अब स्थायी ठिकाना दिल्ली है पर अभी भी एक पांव हमेशा बाहर रहता है। कभी भोपाल, रायपुर, बिलासपुर, दिल्ली, कोलकाता, पटना, लखनऊ। कितने-कितने शहरों के नाम लिए जाए। यकीनन यात्राएं जीवन के अनुभवों को नया आयम देती हंै। सामाजिक, सांस्कृतिक व राजनीतिक परिदृश्यों को यदि उनके समूचे अस्तित्व के साथ, पूरी समग्रता के साथ देखना, समझना हो तो एक उपाय यात्राएं भी हैं। जीवनानुभव की यात्राएं। सुधीर की पत्रकारिता इससे और समृद्ध हुई है। शहरों को देखने का इतना सूक्ष्म नजरिया, उनका सामाजिक द्वंद्व, आम जनजीवन की नब्ज को पकडऩे का सुधीर का तौर-तरीका और मन को बांधने वाली शैली लिखे गए और पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित उनके लेख साहित्यिक पत्रकारिता में एक नए अध्याय का सृजन करते है।

शहरों की जिंदगी का ऐसा जीवंत विश्लेषण कम देखने में आता है। उन्हें पढ़ते हुए यकायक मुक्तिबोध रचनावली के खण्ड 6 में संकलित लेख ‘जिंदगी के नये तकाजे और सामाजिक त्यौहार’ शीर्षक से शहर नागपुर पर मुक्तिबोधजी के लेख का स्मरण हो आता है।मुझे लगता है सुधीर पत्रकार पहले है, कवि बाद में। उनकी कुछ कविताएं जिन्हें मैं पढ़ पाया हूं, पत्रकारिता से होकर गुजरती है। उसके धरातल पर वे खड़े होती हैं जिन्हें हम काव्यात्मक पत्रकारिता कह सकते हैं। इस दृष्टि से वे अपनी पीढ़ी के पत्रकारों से सर्वथा अलग हैं। भिन्न हैं। इसमें कोई शक नहीं है कि पत्रकारिता और साहित्य को एक साथ जीना सहज नहीं है। यह असाधारण है कि दोनों विधाओं में कलम साथ-साथ चलें, लंबे समय तक चलें, निर्बाध।

सुधीर यह कर रहे हैं। उनकी पत्रकारीय दृष्टि किस कदर पैनी है इसकी मिसाल उनके मार्गदर्शन में प्रकाशित समाचार विचार की पत्रिका ‘दुनिया इन दिनों में’ उनके नियमित लेखन से मिलती है। साहित्यिक, सामाजिक, राजनीतिक मुद्दों पर उनकी टिप्पणियां बेबाक होती हैं और व्यवस्था पर कू्रर प्रहार करती है। ऐसा उनके विभिन्न मनीषियों के साथ किए गए साक्षात्कारों में भी परिलक्षित होता है। यह भी कम हैरत की बात नहीं कि वे अध्ययन के लिए कैसे समय निकाल पाते है। पिछले वर्ष छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी पर मैंने एक विस्तृत लेख लिखा था जो केवल मेरे ब्लॉग तक सीमित था। सुधीर का एक दिन फोन आया और उन्होंने उसे अपनी पत्रिका ‘दुनिया इन दिनों में’ छापने की इच्छा जाहिर की।

इससे पता चलता है कि वे पत्रकारिता में उतने ही रमे हुए है जितने कि साहित्य में। अन्यथा ढूंढ-ढूंढकर मीडिया में यत्र-तत्र बिखरे हुए विचारों को जानना, टिप्पणियों से निरंतर साक्षात्कार करना, वर्तमान दौर के पत्रकारों के लिए अब लगभग अरुचि का काम रह गया है। जाहिर है सुधीर अध्ययनशील और देश-दुनिया की ताजा दम खबर रखने वाले जागरुक पत्रकार है।सुधीर से अब लगातार संवाद बना हुआ है। एक माध्यम ‘दुनिया इन दिनों में’ भी है। मुलाकातें भी हो रही हैं। आत्मीयता जो मौजूदगी के बावजूद अदृश्य सी थी, अब पुन: जीवंत है। सुनता-पढ़ता हूं, सुधीर का हिन्दी कविता में बड़ा सम्मान हैं, साहित्यिक गोष्ठियों में उन्हें सुनने का आग्रह रहता है।

एक बड़े कवि के रुप में वे स्थापित हो गए है और उनकी मूल पहचान पत्रकार की नहीं, कवि की बन गई है। हालांकि उनकी कविताएं दौड़ रही हैं व पत्रकारिता भी। किन्तु कविताएं बहुत आगे निकल गई हैं। यह संयोग ही है कि उनके अनेक कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं पर पत्रकारिता पर उनकी कोई किताब देखने में नहीं आई है। पता नही ऐसा विचार उनके मन में क्यों नहीं आया वरना आम तौर पर पत्रकारों की किताबें यानी अखबारों में उनके पूर्व प्रकाशित लेखों का संग्रह, जो समय के दस्तावेज होते हैं। चूंकि साहित्यिक पत्रकारिता में सुधीर जरूरी हस्ताक्षर है इसलिए संभव है निकट भविष्य में इस विधा में भी कोई संकलन सामने आए। पत्रकार सुधीर की पत्रकारिता को जानने- समझने व वस्तुपरक मूल्यांकन के लिए यह जरुरी होगा।

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