कर्नाटक, ​तमिलनाड से बेहतर पर्यटन विकल्प छत्तीसगढ़ के पास…

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एक्सपोजर विजिट : छत्तीसगढ़ देश का इकलौता राज्य जहां पत्रकारों के एक्सपोजर विजिट के लिए बजट में प्रावधान

सुरेश महापात्र।

छत्तीसगढ़ सरकार ने एक बार फिर से पत्रकारों के लिए एक्सपोजर विजिट का प्रावधान बजट में किया था। इस बार एक टीम में मुझे भी शामिल होने का अवसर मिला। इस टीम के लिए कर्नाटक और तमिलनाड में एक्सपोजर टूर की व्यवस्था की गई थी। पर मीडिया टीम की डिमांड पर बैंगलुरू के टूर के समय में ही आंध्रप्रदेश के तिरूमाला दर्शन की व्यवस्था भी करवा दी गई।

इस दल में कुल 19 लोग शामिल थे। जिसमें छत्तीसगढ़ के बस्तर, दंतेवाड़ा, जांजगीर, राजनांदगांव, कवर्धा, दुर्ग और रायपुर के मीडियाक​र्मी और छत्तीसगढ़ जनसंपर्क विभाग के पांच अधिकारी भी शामिल थे। संयुक्त संचालक बालमुकुंद तंबोली के नेतृत्व में इस टीम ने भ्रमण किया।

एक सप्ताह के एक्सपोजर विजिट में सभी साथियों के साथ समय किस तरह बीता, ये पता ही नहीं चला….हम सभी ने बहुत एंजॉय किया हम सभी साथियों ने…आप सभी से बहुत कुछ सीखने को मिला…

प्राकृतिक स्थल ऊटी, धार्मिक महत्व के स्थल तिरुपति बालाजी, ऐतिहासिक महत्व के स्थल मैसूर, बेंगलुरु को समाहित करता हुआ यह तीन राज्यों कर्नाटक, तमिलनाडु और आंध्रप्रदेश का टूर पत्रकार साथियों के साथ अविस्मरणीय रहेगा।

पहले दिन हम रायपुर से बैंगलुरू होते हुए सीधे कोयंबटूर पहुंचे। वहां रात्रि विश्राम के बाद हमारी यात्रा प्रारंभ हुई।

तमिलनाड के कोयंबटूर शहर से लगभग 30 किलोमीटर दूर वेलियंगिरी पहाड़ियों की शांत तलहटी में बसा हुआ ईशा योग केंद्र आज भारत के सबसे खास आध्यात्मिक एवं पर्यटन स्थलों में से एक बन चुका है। इस केंद्र का सबसे बड़ा आकर्षण है — आदियोगी की विशालकाय प्रतिमा, जिसे देखने के लिए देश-विदेश से लाखों पर्यटक हर साल आते हैं। दुनिया की सबसे बड़ी बस्ट मूर्ति 112 फीट ऊँची और लगभग 500 टन वजनी आदियोगी की यह स्टील से बनी प्रतिमा गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज दुनिया की सबसे बड़ी बस्ट मूर्ति है।

इसकी ऊँचाई 112 फीट इसलिए रखी गई क्योंकि योग परंपरा में मानव को अपनी परम प्रकृति तक पहुँचने के 112 मार्ग बताए गए हैं।मूर्ति का चेहरा शांत, ध्यानमग्न और अत्यंत प्रभावशाली है। माथे पर त्रिशूलाकार चिह्न, चंद्रमा, बालों में गंगा और कानों में कुंडल — सभी पारंपरिक प्रतीकों के साथ यह मूर्ति दूर से ही मन को मोह लेती है।

प्रकृति और शांति का अनुपम संगमईशा केंद्र की खासियत सिर्फ मूर्ति तक सीमित नहीं है। चारों ओर हरी-भरी पहाड़ियाँ, शांत वातावरण और ठंडी हवा पर्यटक को तुरंत शहर की भागदौड़ से दूर एक अलग दुनिया में ले जाती है। यहाँ का माहौल इतना शांतिपूर्ण है कि कई लोग कहते हैं — “यहाँ आने के बाद मन अपने आप शांत हो जाता है।”

आदियोगी ईशा योग केंद्र सिर्फ एक मूर्ति या धार्मिक स्थल नहीं है। यह एक ऐसी जगह है जहाँ प्रकृति, योग, शांति और आधुनिक कला का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।  चाहे आप योग में रुचि रखते हों, फोटोग्राफी करना पसंद हो, प्रकृति के करीब समय बिताना चाहते हों या बस एक शानदार अनुभव लेना चाहते हों — यहाँ आकर आप निराश नहीं होंगे।  इसे  “अनुभव करने लायक” कहा जा सकता है।यदि आप दक्षिण भारत की यात्रा पर हैं, तो कोयंबटूर में आदियोगी को अवश्य शामिल करें — यह अनुभव लंबे समय तक याद रहेगा।

हमारी यात्रा आदियोगी ईशा फाउंडेशन से होकर ऊटी (उधगमंडलम) पहुंची। इस इलाके को ‘नीलगिरी की रानी’ के नाम से भी जाना जाता है, यह तमिलनाडु का एक प्रसिद्ध हिल स्टेशन है। यह नीलगिरी पहाड़ियों में 2,240 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है और अपनी प्राकृतिक सुंदरता, चाय के बागानों, ठंडे मौसम और ब्रिटिश काल की विरासत के लिए मशहूर है। हिलटॉप एरिया में सैर करना पर्यटकों के लिए एक रोमांचक अनुभव होता है, जहाँ हरी-भरी घाटियाँ, झीलें और पहाड़ी दृश्य मन मोह लेते हैं।

ऊटी के हिलटॉप एरिया में सैर करना मतलब है पहाड़ियों की ऊँचाई से नीचे फैली घाटियों, चाय के बागानों और जंगलों का मनोरम दृश्य देखना। यहाँ की सड़कें घुमावदार हैं, और हर मोड़ पर एक नया नजारा मिलता है। नीलगिरी का सबसे ऊँचा शिखर (2,637 मीटर)। यहाँ से ऊटी शहर, कोयंबटूर के मैदान और दूर-दूर तक फैली पहाड़ियाँ दिखाई देती हैं। टेलीस्कोप हाउस से 360 डिग्री व्यू मिलता है।

पाइन के ऊँचे पेड़ों से घिरा क्षेत्र, जहाँ बॉलीवुड फिल्मों की शूटिंग होती है। हिलटॉप से दृश्य देखते हुए घुड़सवारी या ट्रेकिंग किया जा सकता है। हिलटॉप सैर के लिए टॉय ट्रेन (नीलगिरी माउंटेन रेलवे) का सफर लें, जो यूनेस्को हेरिटेज है। अफसोस यही रहा कि हमारी इस यात्रा में इसे शामिल नहीं किया जा सका। यह ऊटी से मेट्टुपालयम तक जाती है और रास्ते में हिलटॉप व्यूज प्रदान करती है।

हम टी फैक्ट्री देखने पहुंचे ऊटी नीलगिरी चाय के लिए विश्व प्रसिद्ध है। यहाँ की टी फैक्टरियाँ पर्यटकों को चाय की पत्तियों से तैयार चाय तक की पूरी प्रक्रिया दिखाती हैं – पत्तियाँ तोड़ना, सुखाना, कटिंग, फर्मेंटेशन और पैकिंग के पूरे प्रोसेस को हमने देखा और यह महसूस किया कि आप अपने उत्पाद की ब्रांडिंग कैसे कर सकते हैं। हजारों की तादात में पर्यटक वहां पहुंच रहे हैं और वे इस फैक्ट्री से यहां का उत्पाद परचेस भी कर रहे हैं। यह अपने उत्पाद की मार्केटिंग का बेहतर तरीका लगा।

दोड्डाबेट्टा के पास स्थित, यह फैक्ट्री टी और चॉकलेट दोनों का उत्पादन करती है। टी म्यूजियम में पुरानी मशीनें और चाय की इतिहास प्रदर्शनी है। मीठे स्वाद की दुनियाऊटी की घरेलू चॉकलेट फैक्टरियाँ पर्यटकों को काकाओ बीन्स से चॉकलेट बनाने की प्रक्रिया दिखाती हैं। यहाँ की चॉकलेट ऑर्गेनिक और फ्लेवर्ड होती हैं।

बॉटनिकल गार्डन 55 एकड़ में फैला है। यह गार्डन ऊटी का सबसे बड़ा आकर्षण है। 1848 में स्थापित, इसमें 20,000 से ज्यादा पौधों की प्रजातियाँ हैं। खासियतें:विविधता: रंग-बिरंगे फूल (रोज, लिली, ऑर्किड), दुर्लभ पौधे, फर्न हाउस (हजारों फर्न प्रजातियाँ), जापानी गार्डन, ग्लास हाउस (एक्जॉटिक फ्लावर्स)। इस गार्डन में लैंडस्केप शानदार है। सीढ़ीदार टेरेस, छोटे तालाब, वॉकपाथ आदि भी देखने के लायक है।

हमारा अगला पड़ाव मैसूर था। यहां हमने वृंदावन गार्डन का भ्रमण किया वैसे मैसूर इतिहास, वैभव और प्रकृति का अनुपम संगम है।

मैसूर (मैसूरु) कर्नाटक का वह शहर है, जिसे देखकर लोग बार-बार लौटना चाहते हैं। यहाँ की सांस्कृतिक धरोहर, राजसी महल, संगीतमय फव्वारे और रंग-बिरंगे बागीचे हर पर्यटक के दिल को छू लेते हैं। मैसूर की दो सबसे प्रतिष्ठित और सबसे अधिक देखी जाने वाली जगहें हैं – मैसूर पैलेस और वृंदावन गार्डन। ये दोनों स्थल एक-दूसरे के पूरक हैं।

शाम ढलते हम सभी वृंदावन गार्डन पहुंचे। यहां म्यूजिकल फाउंटेन का समय हो ही रहा था। राष्ट्रगान के साथ म्यूजिकल फव्वारा प्रारंभ हुआ। अलौकिक दृश्य था। यहां संगीत, फव्वारे और प्रकृति का जादू देखने को मिला। मैसूर से लगभग 19–20 किलोमीटर दूर कृष्णराज सागर जिसे केआरएस बाँध भी कहा जाता है इसके पास ही वृंदावन गार्डन  स्थित है। भारत के सबसे प्रसिद्ध टेरेस गार्डनों में से एक है। इसका निर्माण 1932 में सर एम. विश्वेश्वरैया के निर्देशन में हुआ था।

इसके दूसरे दिन हमने मैसूर पैलेस का भ्रमण किया यह राजसी वैभव और इतिहास की गाथा कहता है। दक्षिण भारत का सबसे भव्य महल मैसूर पैलेस, जिसे अंबा विलास पैलेस के नाम से भी जाना जाता है, मैसूर शहर के ठीक केंद्र में स्थित है। यह वाडियार राजवंश का मुख्य निवास-स्थान रहा है और आज भी भारत के सबसे शानदार और लोकप्रिय महलों में शुमार है।

इस महल में दर्ज इतिहास के अनुसार 1897 में पुराने लकड़ी के महल में भीषण आग लगने के बाद, 1897 से 1912 के बीच इस नए महल का निर्माण हुआ। इसका डिजाइन प्रसिद्ध ब्रिटिश आर्किटेक्ट हेनरी इर्विन ने तैयार किया था। वास्तुकला में इंडो-इस्लामिक, हिंदू, राजपूत और गोथिक शैली का सुंदर मेल देखने को मिलता है।मुख्य आकर्षणसुनहरे गुंबद, मेहराबदार प्रवेश द्वार और हाथी द्वार, दरबार हॉल, विशाल हॉल जिसमें सोने-चाँदी से जड़े स्तंभ और झूमर हैं।

स्वर्ण सिंहासन 250 किलोग्राम सोने से बना, दशहरा के समय विशेष प्रदर्शन में रखा जाता है। कल्याण मंडप, नृत्य हॉल, हथियार संग्रह, चित्रकला गैलरी और राजसी फर्नीचर महल के सामने का विशाल प्रांगण और चारों ओर की नक्काशीदार दीवारें देखने के लायक हैं।

तिरुमाला का श्री वेंकटेश्वर स्वामी मंदिर (बालाजी मंदिर) भारत के सबसे महत्वपूर्ण और सबसे अधिक दर्शन प्राप्त करने वाले मंदिरों में से एक है। इसे कलियुग का वैकुंठ कहा जाता है। प्रतिदिन औसतन 50,000 से 1 लाख से अधिक भक्त यहाँ दर्शन के लिए आते हैं। तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम द्वारा संचालित यह मंदिर व्यवस्था, दर्शन प्रक्रिया और भक्तों की सुविधा के मामले में दुनिया के सबसे संगठित धार्मिक केंद्रों में गिना जाता है।

यह स्थान हमारे पूर्व निर्धारित टूर में शामिल नहीं था। कोयंबटूर से निकलते हुए बैंगलोर के करीब तिरूमाला मंदिर में दर्शन के लिए चर्चा शुरू हुई। हमारी सबसे बड़ी दुविधा यह रही कि यह एक अन्य राज्य आंध्रप्रदेश में शामिल है। ऐसे में बिना प​रमिशन यह संभव ही नहीं था। जनसंपर्क के अतिरिक्त संचालक संजीव तिवारी ने पहले ही स्पष्ट कर दिया कि यह कर पाना संभव नहीं है। टूर आपरेटर सद्गुरू ट्रेव्हल्स जो इस ट्रिप का आर्गनाइजर रहा उसने यह स्पष्ट कर दिया कि बिना वैध परमिट के बस वहां जा नहीं सकती।

यानि इस राह में पहली दिक्कत तो कार्यक्रम को बढ़ाने की ही रही। पर सभी मीडियाकर्मियों की मांग पर इसकी व्यवस्था पर चर्चा का दौर प्रारंभ हुआ। इस टूर के प्रयास में सूरज बुद्धदेव और मलय बनर्जी की भूमिका महत्वपूर्ण रही। इससे बड़ा सवाल तो यह भी था कि समय सीमा के भीतर बैंगलुरू वापस लौटना था ताकि रायपुर वापसी के लिए की गई व्यवस्था में किसी तरह की दिक्कत ना हो।

वीआईपी दर्शन के लिए पत्रकारों ने अपने पहचान का उपयोग करना शुरू किया। आपको यह जानकार आश्चर्य होगा कि तिरूमाला में दर्शन के लिए केंद्रीय मंत्री तोखन साहू के कार्यालय, छत्तीसगढ़ मुख्यमंत्री कार्यालय और विधानसभा अध्यक्ष कार्यालय से देवस्थानम को पत्र भी ईमेल कर दिया गया ताकि समय सीमा के भीतर दर्शन पूर्ण हो सके। इसी बीच हमारे प्रयासों को देखते हुए अंतत: ट्रेवल एजेंसी ने सहमति दे दी और संजीव तिवारी ने हमें शर्तों के साथ पहुंचाने और वापसी के लिए सूचना दे दी।मजेदार बात तो यह है कि जब ईश्वर का बुलावा हो तो किसी पत्र से ज्यादा बुलावा प्रभावशाली होता है। हम प्रयास करते रहे पर सारे प्रयासों से हासिल बस इतना हुआ कि वीआईपी दर्शन से समय बचने की उम्मीद में हम देवस्थानम के लिए निकल पड़े। मैसूर से रात करीब साढ़े 9 बजे होटल में चेक इन किया और भोजन के तत्काल बाद रात साढ़े 11 बजे तिरूपति के लिए बस से निकल पड़े।

इसके बाद जो कुछ हुआ बस यही समझा जाए कि भगवान बालाजी का बुलावा था सो किसी तरह की परेशानी नहीं हुई। बिना किसी ​वीआईपी पास के हम सभी ने आम श्रद्धालुओं की तरह ईश्वर का दर्शन किया और भक्ति भाव से अभिभूत रहे।

हमें यही समझ आया कि तिरुमाला की यात्रा केवल दर्शन नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक अनुभव है। सही योजना, थोड़ी धैर्य और श्रद्धा के साथ आपका दर्शन सुगम और सुखद होगा। जय श्री वेंकटेश्वर! गोविंदा गोविंदा!

हमारे टीम के पथप्रदर्शक बालमुकुंद तंबोली ने अपनी पोस्ट में बताया है ‘एक्सपोजर ट्रिप में साथ रहने और समय बिताने से जो आपसी समझ, सौहार्द्र और मैत्री का वातावरण बनता है, वह अतुलनीय है। हमेशा के लिए यादगार घटनाएं होती हैं जो स्मृति पटल पर मधुर स्मृतियों के रूप में अंकित हो जाती हैं और सहज ही सहेज ली जाती हैं।’

वे कहते हैं ‘सबसे अधिक तृप्ति का क्षण हम सभी सहयात्री साथियों को तब हुआ, जब तिरुपति बालाजी के दर्शन हुए, वह भी अत्यंत सहजता से, मात्र 3 घंटों में बिना किसी दिक्कत के, बिना अधिक समय तक लाइन लगाए, ऐसा सामान्य दर्शन जो वीवीआईपी दर्शन जैसा लगा, मानो भगवान कह रहे हों कि यदि मैने सोच लिया है कि तुमको अपने पास दर्शन के लिए बुलाना है, तो चिन्ता मत करो, मेरे अप्रोच से बड़ा कोई अप्रोच नहीं है, सारे कार्य सहजता से होते चले जायेंगे और दर्शन लाभ अत्यन्त सरलता से हो जाएगा।’

संभवत: हम सभी भी इस यात्रा के सहभागी होकर यही सोच रहे हैं।

अब छत्तीसगढ़ पहुंचकर ऐसा लगता है, जो छत्तीसगढ़ में है, वह कहीं नहीं है। छत्तीसगढ़िया सबसे बढ़िया…क्योंकि यहां बस्तर और सरगुजा सहित मैदानी क्षेत्रों में ऐसे ऐसे प्राकृतिक धरोहर हैं, जो अतुलनीय है। Incredible Chhatisgarh है। बस आधारभूत सुविधा पर्यटन स्थलों में थोड़ी और बेहतर और व्यवस्थित हो जाए और थोड़ी बेहतर मार्केटिंग भी, फिर ऐसा प्रतीत होता है कि पर्यटन का छत्तीसगढ़ में जो स्कोप दिखता है, वो कहीं नहीं है।

हमने देखा कि पर्यटन की छोटी से छोटी संभावनाओं पर किस तरह से काम किया जा सकता है। किस तरह से इंफ्रास्ट्रक्चर डवलब कर रोजगार और आ​र्थिक समृद्धि का द्वार खोला जा सकता है। पैकरा के जिस वॉटरफाल में हमने भ्रमण किया उससे 100 गुना ज्यादा बड़े और शानदार प्राकृतिक जलप्रपात बस्तर और सरगुजा के साथ ही पूरे छत्तीसगढ़ में विस्तारित हैं।

पाइन जंगल के भ्रमण के लिए भी टिकट ​देकर हम अंदर पहुंच सके। इससे यह समझ आया कि हमें अपने प्राकृतिक संसाधनों का किस तरह से बेहतर आर्थिक इस्तेमाल पर्यटन के लिए किया जा सकता है। एक मि​ट्टी के टीले में हम टिकट देकर उपर पहुंचे वहां देखने को भले ही गोबर था पर इस इलाके के मानचित्र में इस शूटिंग प्वाइंट के तौर पर वहां की सरकार पर्यटन के नजरिए से व्यापार करने में कामयाब रही। वहां के टैक्सी ड्राइवर से लेकर तमाम लोग इस प्वाइंट को दिखाने ले जाते हैं। हमें यह लगा कि हम इससे बेहतर कर सकते हैं।

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