Google Analytics Meta Pixel
Tuesday, March 10, 2026
news update
AAJ-KALEditorial

पृथ्वी की ओर लौटती दुनिया… कोरोना संक्रमण के बुरे दौर में सब कुछ बुरा नहीं है, दुनिया भर से अच्छी ख़बरें भी आ रही हैं…

विनोद वर्मा.

दुनिया को कोरोना ने भयभीत कर रखा है. हर व्यक्ति आशंका से कांप रहा है कि पता नहीं कल क्या होगा. कारोबार ठप्प है. उद्योगों में ताले लटक रहे हैं. कल तक हम ‘लॉक-डाउन’ से शायद परिचित न रहे हों. लेकिन अब बच्चे तक जानते हैं कि ये क्या है.

लेकिन बुरे के दौर में सब कुछ बुरा नहीं है. दुनिया भर से अच्छी ख़बरें भी आ रही हैं. कोरोना की मार से कराह रहे इटली, स्पेन, अमरीका से और दिल्ली, बंगलौर, मुंबई, रांची और रायपुर से भी.

ये अच्छी ख़बरें हैं प्रदूषण के कम होने की. आसमान के फिर से नीला दिखाई देने की. रात में चंद्रमा के साथ तारे देख पाने की. नदियों से साफ़ होने की. और जंगली पशुओं के शहरों तक पहुंच जाने की.

विभिन्न समाचार पत्रों व वेबसाइट पर प्रकाशित ख़बरों न्यूज़ एजेंसी की ख़बरों और सोशल मीडिया पर आई ख़बरों में जो कुछ पढ़ने को मिला उसकी एक झलक देखिए:

– गंगा साफ़ हो गई है. कानपुर में भी और वाराणसी में भी

– दिल्ली में हवा साफ़ हो गई है. प्रदूषण का स्तर 71 प्रतिशत तक कम हो गया है

– यमुना के पानी में आमतौर पर दिखने वाला झाग कम हो गया है

– नोएडा सेक्टर-18 में नील गाय दिखी

– सिक्किम की राजधानी गंगटोक में हिमालयन भालू शहर तक आ गया

– देहरादून तक हाथी आ पहुंचे

– केरल के कोझिकोड में आबादी वाले इलाक़े तक दुर्लभ मालाबार बिलाव-कस्तूरी पहुंचा

– ओडिशा के समुद्र तट पर पहली बार लाखों कछुए दिन में प्रजनन करते देखे गए

– गौर (भारतीय बायसन) कर्नाटक में दिन में सड़कों पर देखा गया

– मुंबई की सड़कों पर मोर दिखा

– बिहार में बख़्तियारपुर में नील गाय का झुंड खेतों के बीच से गुज़रता दिखा

– पटना में एयरपोर्ट बेस के पास तेंदुआ दिखा

– गाज़ियाबाद पिलखुआ में अस्पताल में बारहसिंगा दिखा

लगभग यही स्थिति विदेशों में भी दिखाई दे रही है:

– ब्रिटेन के उत्तरी वेल्स में शहरी इलाक़ों में पहाड़ी बकरियां दिखीं

– रॉमफ़र्ड, इंग्लैंड में हिरण शहरी बस्तियों में दिखे

– वेनिस, इटली की प्रसिद्ध नहरों में समुद्री पक्षी तैरते दिख रहे हैं, पानी भी साफ़ हो गया है

– सैंटियागो, चिली में शहर में प्यूमा (पहाड़ी बिलाव) दिखा

– पेरिस, फ़्रांस में सेन नदी से निकलकर बत्तखों का झुंड सड़कों पर घूमता दिखा

– लंदन के मिडिलसेक्स इलाक़े में शहरी बस्ती के बीच लोमड़ी घूमती हुई दिखी

– त्रिंकोमाली, श्रीलंका में बाज़ार में बारहसिंगा दिखाई पड़ा

– नारा, जापान में व्यस्त रहने वाली सड़क पर हिरण दिखाई पड़ा

– वैंकुअर, कनाडा में समुद्री तट पर ऑरका व्हेल दिखाई देने लगी

– कैगलियारी, इटली में डॉल्फ़िन दिखने लगीं

हालांकि करुणा और पीड़ा के समय में प्रकृति और पर्यावरण की बात करना थोड़ा अटपटा सा लगता है. लेकिन जो हो रहा है वह यही है.

कुछ बरस पहले एक कार्यक्रम में कवि, समीक्षक और संस्कृतिकर्मी अशोक वाजपेयी ने बहुत पीड़ा के साथ कहा था कि पिछले कुछ दशकों में हम पृथ्वी को लगातार दुनिया की ओर ले गए हैं. यह बात कम लोगों को समझ में आई थी. वो इसलिए कि हमने दुनिया को पृथ्वी का पर्यायवाची मान लिया है. एक कवि ने इसे अलग तरह से देखा. वास्तव में पृथ्वी और दुनिया को इसी नज़रिए से देखा जाना चाहिए.

इस बात से कौन इनकार कर सकता है कि हमने अपनी अपनी सुविधा के लिए पृथ्वी के विनाश में कोई कसर नहीं छोड़ी है. हमने उसके साथ दुराचार किया है. हमने अपनी नदियों का सत्यानाश कर लिया. खनिज उत्खनन के नाम पर जंगल और पहाड़ ख़त्म कर दिए. हरे भरे पहाड़ों को नंगा कर दिया. जो जंगल हमारे पास बचे हैं उनका स्तर (क्वालिटी) भी ख़राब हो गया है. शहरों में इतना प्रदूषण है कि लोग तरह तरह की बीमारियों का शिकार हो रहे हैं.

जो लोग अधेड़ हो चुके हैं वो समझ सकते हैं कि अपने पशु पक्षियों के साथ हमने क्या किया है. बाघ, शेर, तेंदुआ, हाथी, व्हेल, शार्क को छोड़ दीजिए अब तो शहरों में गौरैया और कौव्वे तक नहीं दिखते.

करोना संकट की वजह से लोग घरों से नहीं निकल पा रहे हैं. या उन्हें नहीं निकलने दिया जा रहा है. वाहन नहीं चल रहे हैं. प्रदूषण फैलाने वाले उद्योग न धुंआ उगल रहे हैं और न प्रदूषित पानी नदियों में बहा रहे हैं तो अंतर दिखने लगा है.

जीव जंतुओं को एकाएक लगने लगा है मानों यह पृथ्वी उनकी भी है. वरना तो मनुष्यों ने पृथ्वी और प्रकृति पर इतना एकाधिकार कर लिया है कि शेष जीव जंतु हाशिए पर भी नहीं जी पा रहे हैं. हमारे देखते ही देखते कितने पशु और कितने पक्षी विलुप्त होने के कगार पर पहुंच गए. जंगल के स्वच्छंद जीवों को हमने चिड़ियाघरों तक सीमित कर दिया.

कोरोना महामारी का समय जीव जंतुओं को नए समय की तरह लग रहा है. और ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ जीव जंतुओं को ही ऐसा लग रहा है. मनुष्यों को भी लग रहा है. वे भी सांस लेते हुए समझ रहे हैं. वे भी आसमान की ओर देखते हुए महसूस कर रहे हैं.

यह दुनिया के पृथ्वी की ओर लौटने का समय है.

– अल्पकाल के लिए ही सही. वरिष्ठ पत्रकार विनोद वर्मा की फेसबुक वाल से साभार…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *