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होली: भद्रा और ग्रहण का साया, 2 मार्च की रात केवल 72 मिनट का है शुभ मुहूर्त, देखें होलिका दहन की सही पूजा विधि

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  • होलिका दहन के लिए कुल 1 घंटा 12 मिनट का है मुहूर्त
  • सोमवार की रात 12:50 बजे से 2:02 बजे तक का है शुभ मुहूर्त
  • तीन मार्च को होगा चंद्र ग्रहण, सात घंटे पहले लग जायेंगे सूतक

धर्म समाज डेस्क।

इस साल होलिका दहन की तिथि को लेकर लोगों में पहले से ही असमंजस बना हुआ था। कहीं दो मार्च तो कहीं तीन मार्च को दहन की चर्चा हो रही थी। ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि तीन मार्च को साल का पहला चंद्र ग्रहण लगने जा रहा है। ज्योतिषचार्य पंडित नवनीत शर्मा के अनुसार यह इस वर्ष होलिका दहन दो मार्च सोमवार की रात को किया जाएगा। हालांकि, इस बार भद्रा का साया भी रहेगा, जिस वजह से सही मुहूर्त का विशेष ध्यान रखना जरूरी होगा।

पूर्णिमा तिथि और भद्रा का संयोग
पंचांग के अनुसार, फाल्गुन पूर्णिमा तिथि की शुरुआत दो मार्च को शाम 5:18 बजे से हो रही है। इसी समय भद्रा का वास भी शुरू हो जाएगा, जो पूरी रात और अगली सुबह 3 मार्च को 4:56 बजे तक प्रभावी रहेगा। जिला ब्राह्मण महासभा के अध्यक्ष पंडित संजय शर्मा ने बताया कि भद्रा काल में कोई भी शुभ या मांगलिक कार्य करना वर्जित माना गया है।

खासतौर पर होलिका दहन जैसे पर्व पर भद्रा का ध्यान रखना बेहद जरूरी होता है। शास्त्रों में भद्रा को अशुभ योग माना गया है। मान्यता है कि भद्रा में किए गए शुभ कार्यों का फल विपरीत हो सकता है। इसी वजह से होलिका दहन हमेशा भद्रा समाप्त होने के बाद या भद्रा पुच्छ काल में ही करना चाहिए।

होलिका दहन का शुभ मुहूर्त
ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, इस वर्ष होलिका दहन का सबसे उपयुक्त और शास्त्रसम्मत समय सोमवार की रात 12:50 बजे से 2:02 बजे के बीच रहेगा। इस दौरान भद्रा का पुच्छ काल माना जा रहा है, जो होलिका दहन के लिए अनुकूल माना जाता है। यह मुहूर्त कुल 1 घंटा 12 मिनट का है।

धार्मिक मान्यता के अनुसार, इसी समय में होलिका दहन करने से नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है और घर-परिवार में सुख-शांति बनी रहती है। हिन्दू धर्म में होली के दिन पूजा-पाठ करना भी बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन राधा-कृष्ण, भगवान शिव और माता लक्ष्मी की विधि विधान से पूजा करना शुभ माना जाता है। इस दिन आप पूजा में गुलाल, रंग, फूल और मिठाइयां अर्पित कर सकते हैं।

भद्रा में होलिका दहन होता है वर्जित
पुराणों के अनुसार, भद्रा सूर्य देव की पुत्री और शनिदेव की बहन मानी जाती हैं। जब भद्रा पृथ्वी लोक में होती हैं, तो उस समय शुभ कार्य करने से बचने की परंपरा है। मान्यता है कि भद्रा काल में किए गए मांगलिक कार्यों से विघ्न और अशुभ परिणाम मिल सकते हैं। इसी कारण से विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन जैसे शुभ कार्यों के साथ-साथ होलिका दहन भी भद्रा में नहीं किया जाता। इस वर्ष चूंकि भद्रा पूरी रात रहेगी, इसलिए केवल भद्रा पुच्छ काल में ही होलिका दहन करना शास्त्रसम्मत माना गया है।

चार मार्च को खेली जाएगी रंगों वाली होली
पंचांग के अनुसार 3 मार्च को शाम 5 बजकर 8 मिनट तक पूर्णिमा तिथि रहेगी, लेकिन इस बार इसी समय चंद्र ग्रहण का साया भी बना हुआ है। चंद्र ग्रहण दोपहर में 3 बजकर 20 मिनट से शुरू हो जाएगा। साथ ही यह भारत में भी नजर आएगा। जिसके चलते सूतक काल भी मान्य होगा। वहीं, रंग खेलने वाली होली यानी धुलेंडी चैत्र महीने की कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि को मनाई जाती है। ऐसे में इस साल रंगोत्सव 4 मार्च को मनाया जाएगा।

होली का महत्व
धार्मिक परंपराओं के अनुसार, कई जगह पूर्णिमा की रात होलिका दहन के अगले दिन होली खेली जाती है। लेकिन इस वर्ष पूर्णिमा तिथि 3 मार्च को चंद्र ग्रहण है जिस वजह से 4 मार्च, बुधवार को ही देशभर में रंगों की होली खेली जाएगी।

होलिका दहन की पूजा विधि
होलिका दहन से पहले घर के बड़े-बुजुर्गों के साथ विधि-विधान से पूजा करना शुभ माना जाता है।
होलिका के चारों ओर परिक्रमा करें।
कच्चा सूत, गेहूं की बालियां, नारियल और जल अर्पित करें।
ॐ होलिकायै नमः मंत्र का जाप करें।
बुरी शक्तियों के नाश और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करें।
होलिका दहन पर क्या करें?
सही मुहूर्त में ही होलिका दहन करें।
अग्नि को प्रणाम करके घर-परिवार की मंगल कामना करें।
होलिका की राख को अगले दिन तिलक के रूप में लगाना शुभ माना जाता है।

होलिका दहन पर क्या न करें?
भद्रा काल में होलिका दहन न करें।
आग के पास बच्चों को अकेला न छोड़ें।
किसी भी तरह की अशांति या झगड़े से बचें।