सरकार की योजनाओं का नतीजा अब समर्पण करने सामने आ रहे नक्सली लीडर…
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बस्तर में चल रही है छत्तीसगढ़ में माओवाद के खिलाफ निर्णायक लड़ाई…
नियद नेल्लानार: विकास का नया मॉडल
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में शुरू की गई नियद नेल्लानार योजना ने बस्तर के सुदूर और नक्सल प्रभावित गांवों में विकास की नई किरण जलाई है। इस योजना के तहत सुरक्षा कैंपों के पांच किलोमीटर के दायरे में आने वाले गांवों में शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, पानी, सड़क और अन्य बुनियादी सुविधाएं पहुंचाई जा रही हैं।
बीजापुर, सुकमा, नारायणपुर, दंतेवाड़ा और कांकेर जैसे जिलों में जहां कभी माओवादी हिंसा के कारण शासकीय योजनाएं पहुंचना मुश्किल था, वहां अब स्कूल, अस्पताल, आंगनबाड़ी केंद्र और संचार सुविधाएं स्थापित हो रही हैं। यह योजना न केवल बुनियादी ढांचे का निर्माण कर रही है, बल्कि आदिवासियों को यह भरोसा भी दिला रही है कि सरकार उनके कल्याण के लिए प्रतिबद्ध है।
सुरक्षाबलों की रणनीति: दबाव और सफलता
नियद नेल्लानार योजना के साथ-साथ सुरक्षाबलों की आक्रामक और रणनीतिक कार्रवाइयों ने माओवादियों के आधार क्षेत्रों में जबरदस्त दबाव बनाया है। दक्षिण बस्तर के सुकमा-कोंटा से लेकर उत्तर-पश्चिम बस्तर के बीजापुर और कांकेर तक, माओवादियों का प्रभाव क्षेत्र लगातार सिमट रहा है। हाल के वर्षों में डीआरजी (जिला रिजर्व गार्ड), सीआरपीएफ और कोबरा कमांडो की संयुक्त कार्रवाइयों में करीब 500 माओवादी मारे जा चुके हैं। बीजापुर के पामेड जंगल में 48 घंटे के ऑपरेशन में कमांडर सुक्का जैसे बड़े माओवादी नेताओं का खात्मा और कांकेर में 29 माओवादियों को मार गिराने जैसे अभियान इस बात का प्रमाण हैं कि सुरक्षाबल माओवादियों के खिलाफ निर्णायक लड़ाई लड़ रहे हैं।
केंद्र और राज्य सरकार की “जीरो टॉलरेंस” नीति और माओवादियों को मुख्यधारा में लौटने का अवसर देने की दोहरी रणनीति ने नक्सलियों को बैकफुट पर ला दिया है।
आदिवासियों का विश्वास और शांति की ओर कदम
माओवादी हिंसा ने बस्तर के आदिवासियों को लंबे समय तक विकास से वंचित रखा। स्कूल बंद रहे, सड़कें नहीं बनीं, और स्वास्थ्य सुविधाएं एक सपना थीं। लेकिन नियद नेल्लानार योजना ने इन क्षेत्रों में नई उम्मीद जगाई है।
पूवर्ती जैसे गांव, जो कभी माओवादी कमांडर हिडमा का गढ़ माने जाते थे, अब सौर ऊर्जा, सड़कों और स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ रहे हैं। यह बदलाव न केवल भौतिक है, बल्कि सामाजिक और मनोवैज्ञानिक भी है। आदिवासी अब सरकार को अपने साथ देख रहे हैं, जिसके परिणामस्वरूप माओवादी विचारधारा से उनका मोहभंग हो रहा है।
चुनौतियां और भविष्य की राह
हालांकि यह सफलता ऐतिहासिक है, लेकिन माओवाद को पूरी तरह समाप्त करने की राह अभी बाकी है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने मार्च 2026 तक छत्तीसगढ़ को नक्सल मुक्त करने का लक्ष्य रखा है, और इस दिशा में तेजी से प्रगति हो रही है। फिर भी, माओवादियों द्वारा ग्रामीणों पर हमले और हत्याएं, जैसे कि हाल ही में बीजापुर में भदरू सोढ़ी की हत्या, इस बात की याद दिलाती हैं कि चुनौतियां अभी खत्म नहीं हुई हैं। इसके अलावा, कुछ मुठभेड़ों को लेकर आदिवासियों के बीच उठने वाले सवालों को भी संवेदनशीलता के साथ संबोधित करने की आवश्यकता है।
नियद नेल्लानार जैसे विकास कार्यक्रमों और सुरक्षाबलों की रणनीति को और मजबूत करते हुए सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि आदिवासियों का विश्वास बना रहे। शिक्षा, रोजगार और स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार के साथ-साथ माओवादियों को मुख्यधारा में लाने के लिए पुनर्वास नीतियों को और प्रभावी करना होगा।
छत्तीसगढ़ में माओवाद के खिलाफ चल रही इस जंग में नियद नेल्लानार योजना और सुरक्षाबलों की संयुक्त रणनीति गेम-चेंजर साबित हो रही है। एक ही दिन में अलग-अलग जिलों में 61 माओवादियों का आत्मसमर्पण और अब तक इस साल 500 से अधिक नक्सलियों का मारा जाना इस बात का सबूत है कि हिंसा का रास्ता अब अपने अंतिम दौर में है।
विकास और सुरक्षा के इस मॉडल को यदि इसी तरह आगे बढ़ाया गया, तो वह दिन दूर नहीं जब छत्तीसगढ़ पूरी तरह से शांति और समृद्धि का प्रतीक बन जाएगा।
