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आपदा को अवसर में बदलकर पांच करोड़ की गड़बड़ी ! कोविड काल में की खरीदी, कबाड़ हो गये करोड़ों के चिकित्सकीय उपकरण…

डीएमएफ के दुरूपयोग का एक और मामला, कोविड 19 के नाम पर की मनमानी खरीदारी

कोटेशन से खरीदी कर फूंक डाले डीएमएफ के पांच करोड़

अभिषेक भदौरिया.दंतेवाड़ा।

आपदा को अवसर में बदलने का सबसे अच्छा तरीका दंतेवाड़ा स्वास्थ्य विभाग ने ढूंढ निकाला था। वर्ष 2021-22 में आपदा यानी कोविड 19 को अवसर में बदल करोड़ों की खरीदी कर डाली। कोविड को ध्यान में रखते ये खरीदी की जानी थी लेकिन प्रशासन ने यहां सिविल सर्जन को एजेंसी बनाकर पांच करोड़ से ज्यादा राशि के उपकरण खरीदे, जिनमें ज्यादतार उपकरण कोविड 19 से संबंधित ही नहीं है। ऐसे में इस खरीदी के पीछे मंशा स्पष्ट है। इधर इन सामानों की पेकिंग अब तक नहीं खुल सकी है और ये कबाड़ हो गये हैं। इनमें से अधिकांश सामान उपयोगहीन हो चुके हैं।

 गौरतलब है कि कोविड 19 के दूसरे लहर को देखते शासन द्वारा स्वास्थ्य विभाग को खरीदी में कुछ छूट दी गयी थी। ये छूट केवल दवाओं के क्रय करने के लिये थी, लेकिन यहां आपदा को अवसर में बदलते प्रशासन ने अस्पताल के बेड, बेबी वार्मर, व्हील चेयर, स्ट्रेचर, गद्दे, कुर्सियां समेत अन्य सामग्रियां खरीदी, इन सामग्रियों को क्रय करने शासन ने कोई छूट नहीं दी थी, बावजूद इसके जिला प्रशासन ने ये खरीदी की। बताया जाता है कि इस खरीदी प्रक्रिया में भी जमकर गड़बड़ियां की गयी हैं। चहेते फर्म से खरीदारी करने न केवल नियमों को दरकिनार किया गया बल्कि एजेंसी का चयन भी गलत किया गया। तीन साल बाद भी ये सामग्री कार्टून में पैक रखी इससे स्पष्ट होता है कि कोविड से इन उपकरणों का कोई लेना देना नही था। 

सीएमएचओ नहीं सिविल सर्जन एजेंसी
खरीदी में गड़बड़ी का पहला संकेत एजेंसी चयन में मिलता है। जिले के अलग अलग जगहों पर अस्थायी कोविड सेंटर के लिये किये जा रहे खरीदी में सिविल सर्जन सह अस्पताल अधीक्षक को एजेंसी बनाया गया। जबकि सिविल सर्जन के अधीन एकमात्र जिला अस्पताल ही होता। नियमतः इस खरीदी के लिये सीएमएचओ यानी मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी को एजेंसी बनाया जाना था। खरीदी के दौरान डाॅ संजय बघेल सिविल सर्जन का पद संभाल रहे थे। सवाल ये है कि कोविड के दौरान ऐसी कौन सी आपात स्थिति निर्मित हुई कि सीएस को एजेंसी बनाकर उपकरण क्रय किये गये। इस खरीदी के लिये तात्कालीन कलेक्टर दीपक सोनी ने प्रशासकीय स्वीकृति दी थी। और इस खरीदी में करोड़ों की बंदरबांट को अंजाम दिया गया।

अस्पताल का सेटअप खरीदा डाला
डीएमएफ के पांच करोड़ रूपये से जिला प्रशासन ने अस्पताल का सेटअप ही खरीद डाला। जबकि इस राशि जीवन रक्षक दवाईयों के साथ ही अन्य अतिआवश्यक दवाईयां व सामग्री खरीदनी थी। लेकिन जीवन रक्षक दवाओं में प्रशासन ने गद्दे और कुर्सियों को भी शामिल कर लिया गया। इस अनाप शनाप खरीदी के पीछे प्रशासन की मंशा क्या थी, सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है।

कोटेशन में की खरीदी
डीएमएफ के पांच करोड़ रूपये फूंकने की इतनी जल्दबाजी थी कि इस खरीदी के लिये खरीदी प्रक्रिया का भी पालन नहीं किया गया। नियमतः 20 लाख रूपये से ज्यादा की खरीदी के लिये दो बहुप्रसारित राष्ट्रीय स्तर के समाचार पत्रों में इसका विज्ञापन प्रकाशित कराना होता है लेकिन यहां कोटेशन से ही पांच करोड़ रूपये के उपकरण प्रशासन ने खरीद डाले और एक बड़ी गड़बड़ी को अंजाम दिया।

तीन संस्थाओं पर फूंके पांच करोड़
डीएमएफ के पांच करोड़ रूपये फूंकने के लिये तीन संस्थाओं का चयन किया गया। जिनमें कटेकल्याण ब्लाक के बेंगलूर पोटाकेबिन, गीदम ब्लाक के चेरपाल आश्रम, प्रीमेट्रिक कन्या छात्रावास कुआकोंडा शामिल है। कुआकोंडा और बेंगलूर के नाम पर 2 करोड़, 37 लाख, 80 हजार और चेरपाल के लिये 2 करोड़ 54 लाख रूपये खर्च किया गया। इन उपकरणों के खरीदी की आवश्यक्ता नहीं थी ये इससे सिद्ध होता है कि क्रय सामग्री आज भी आश्रमों में कबाड़ की तरह पड़ी हुई है।

अन्य जिलों में भी जांच की आवश्कता
इधर बताया जाता है कि दंतेवाड़ा के अलावा डीएमएफ वाले अन्य जिलों में इस तरह की गड़बड़ियां की गयी है। सुकमा और बीजापुर में भी करोड़ों के उपकरण क्रय किये गये। इन सामग्रियों का क्या हुआ, इस बारे में जानकारी नहीं है। दंतेवाड़ा के अलावा अन्य दो जिलो में भी जांच की आवश्यकता है।

डिटेल देखकर ही कुछ बता पाऊंगा – बसाक
इस संबंध में सीएमएचओ डाॅ डाॅ बसाक ने इस खरीदी से संबंधित फाईलें खंगालनी शुरू कर दी है। उन्होने यह भी बताया कि किस संस्था में कौन कौन से सामान रखे हुए है, इसकी सूची भी तैयार की जा रही है। आवश्यकतानुसार निकटतम केंद्रों में ये उपकरण भेजे जा सकते हैं।