बस्तर में नक्सलवाद का सबसे बड़ा चेहरा हिड़मा मारा गया… शाबासी उन सभी को… श्रद्धांजलि उन जवानों को जिन्होंने अपना सर्वस्व न्यौच्छावर कर दिया
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शाबासी उन जवानों के हिस्से जो बीते कई दशकों से बस्तर को आतंक मुक्त बनाने की प्रक्रिया का हिस्सा रहे। श्रद्धांजलि उन जवानों को जिन्होंने अपना सर्वस्व न्यौच्छावर कर दिया। शाबासी उस सरकार को जिन्होंने मजबूत इच्छाशक्ति का प्रदर्शन किया। शाबासी उन सभी पत्रकारों को जिन्होंने अपनी जान पर खेलकर बस्तर की हिंसक तस्वीरों को हर तरह से उकेरा… कभी शब्दों से, कभी चित्र से, कभी विडियो से और अपनी जुबान से जिसमें सच बोलने के लिए सबसे ज्यादा ताकत लगती है।
फिर यकायक बस्तर से सटे तेलंगाना और आंध्र के टीवी चैनलों में प्रमुखता के साथ खबर चलने लगी। पर किसी भी समाचार में आधिकारिक पुष्टि नहीं थी। पर अक्सर यह देखा है कि माओवादियों के मामले में आंध्र और तेलंगाना के पत्रकार सूत्रों के हवाले से भी गलत समाचार नहीं चलाते हैं। यह एक बड़े विश्वास की वजह थी।
धीरे—धीरे खबर बड़ी होती चली गई। बीजापुर के पत्रकारों का दल निकल गया। अक्सर किसी भी बड़ी खबर के बाद बीजापुर और दंतेवाड़ा के कई पत्रकार अपनी मोटर साइकिल से घटना स्थल के लिए निकल पड़ते हैं। यह आदत में शुमार है।
खैर जिसने बस्तर की खौफनाक हालातों को करीब से देखा है उसे यह पता ही होगा कि माओवादियों के चलते बस्तर को कितना नुकसान पहुंचा है। खासकर जिंदगियों को खोने का…।
अभी सोमवार की ही बात है नया रायपुर में कुछ अधिकारियों से चर्चा हो रही थी। उनके सवाल थे कि क्या लग रहा है बस्तर मार्च तक सामान्य हो जाएगा? मैंने पूरे विश्वास के साथ कहा ‘इसमें संशय की गुंजाइश मुझे दिखाई नहीं दे रही है!’ दरअसल अब बस्तर में जनता माओवादियों से पूरी तरह विमुख हो चुकी है।
सच्चाई यही है कि पहले भी जनता ताकत के पक्ष में खड़ी थी अब भी ताकत के साथ ही खड़ी है। पहले बस्तर के घने जंगलों में माओवादियों के इलाकों में जब भी सर्चिंग आपरेशन चलता था तो जंगल के आदिवासी ही पिसा करते थे। सशस्त्र बल पहुंचते तो आदिवासियों से ही पूछताछ करते और प्रताड़ित करते। इसके बाद माओवादियों का दल लौटता और उनके संघम सदस्य चुगली करते कि फलां—फलां ने सूचना दी है। इसके बाद लगती थी जन अदालत निर्मम जन अदालत जिसमें गांव वालों के सामने कथित आरोपी के परिवार के सामने ही नृशंसता की हद पार होती थी।
उत्तर बस्तर से माओवादियों के हथियार सौंपने की प्रक्रिया शुरू हुई उसके बाद नारायणपुर इलाके में एक बड़ा पुनर्वास अभियान चला। करीब 300 माओवादियों ने इन दो जगहों पर ही हथियार सौंप दिए। इसके बाद नया संघर्ष शुरू हुआ समर्पित और मुख्य धारा के खूंखार माओवादियों के बीच मतभेद को लेकर।
सबसे बड़ी बात तो यह है कि माओवादियों के खिलाफ सबसे बड़े सफलता के इस दौर तक पहुंचने में बहुत सारे लोगों का योगदान है। बहुत धीमी शुरूआत रही। ना जानें कितनी मौतों के बाद आज बस्तर से नक्सलवाद के सफाए का स्पष्ट संकेत देखने को मिला है।
यह आशंका बलवती थी कि यदि आदिवासी मुख्यमंत्री के रहते बस्तर के घने जंगलों में, पहाड़ों में फोर्स वही पुराना खेल खेलेगी और सफलता का बखान करेगी तो एक आदिवासी होने के नाते मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते। यह आशंका निर्मूल साबित हुई। फोर्स ने काफी मेहनत किया। डीआरजी के जवानों ने अब तक अदम्य साहस का परिचय दिया है। वे बस्तर के पहाड़, जंगल और नदी के आदी हैं। उन्हें बस्तर के चप्पे—चप्पे की जानकारी है। ऐसे में डीआरजी यानी डिस्ट्रिक्ट रिजर्व ग्रुप के जवानों ने आक्रामक तरीके से पूरा जंगल छानना शुरू कर दिया।
एक बात तो माननी ही होगी कि केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने जब नक्सलमुक्त बस्तर के लिए 31 मार्च 2026 की डेडलाइन घोषित की तो यह विश्वास के लायक कहीं से दिखाई नहीं दे रहा था। इस घोषणा के बाद सैकड़ों मुठभेड़ों की सूचनाएं आईं। पर इक्का—दुक्का को छोड़ कहीं भी फर्जी मुठभेड़ की कहानी बाहर देखने को नहीं मिली। माओवादियों के बड़े लीडर एक के बाद एक न्यूट्रिलाइज होते चले गए। एक के बाद एक कैंप खोलकर नियद नेल्ला नार जैसी योजना के साथ लोगों के विश्वास को जीतने का क्रम भी साथ—साथ चलता रहा।
अच्छे से याद है जब पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के दौरान सिलगेर में सीआरपीएफ के कैंप को खोलने के दौरान विरोध का दौर शुरू हुआ। विरोध प्रदर्शन के दौरान चार की मौतों की सूचना भी बाहर आई। विवाद होने लगा। पर जमीन पर सच्चाई बिल्कुल इसके विपरित थी। विरोध में आदिवासियों को खड़ा करने के पीछे माओवादियों की रणनीति थी।
घटना के संबंध में जब जमीन पर रिपोर्ट पता करने लगाई तो पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने साफ कहा कि हम माओवादियों के इलाके में घुस रहे हैं और उनके इलाके में लगातार घुसेंगे तो यह विरोध और भी बढ़ेगा पर फोर्स घुसेगी लगातार कैंप खोलना तय है। विरोध प्रदर्शन को लेकर बीजापुर के स्थानीय पत्रकारों से जब चर्चा हुई तो उन्होंने माना कि ग्रामीणों के वेश में सिलगेर के प्रदर्शन में माओवादी भी शामिल थे वे ग्रामीण वेशभूषा में थे।
इस समय कैंप के साथ एक योजना को जोड़कर नई रणनीति बनाई गई। जिसमें कैंप के इलाके की परिधि में पांच किलोमीटर के दायरे में विकास और तमाम सरकारी सुविधाओं को जुटाने के साथ लोगों को मुख्यधारा से जोड़ने की प्रक्रिया। यह तेजी से चलां लोगों का या कहें आदिवासियों में विश्वास की बहाली हुई। पहले माओवादियों के ताकत के साथ डरकर खड़ी होने वाली भीड़ सशस्त्र बलों की ताकत के साथ सरकार के पक्ष में खड़ी होने लगी।
यही वैचारिक परिवर्तन का दौर था जिससे माओवादियों को पनाह देने वाले लगातार कम होते चले गए। माओवादियों के लिए उनके आने—जाने में खुफिया सूचनाओं के संदेश फोर्स तक सीधे पहुंचने लगे और जमीन पर पूरी तरह से आक्रामण की रणनीति के साथ जवान आर—पार की लड़ाई में उतरने लगे।
हिड़मा के अंत के साथ बस्तर में माओवादियों के अंत का करीब—करीब ऐलान हो चुका है। आंध्र प्रदेश में मुठभेड़ में हिड़मा के साथ छह माओवादी मारे गए हैं। इसमें उसकी पत्नी राजे भी मारी जा चुकी है। इंसान के तौर पर किसी की मौत पर खुशी मनाना अपराध है पर हिड़मा की मौत से बस्तर का खूनी संघर्ष खत्म होगा इसकी खुशी तो मनाई ही जानी चाहिए।
