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छत्तीसगढ़ में भाजपा की सेकेंड लाइन पॉलिटिक्स और डा. रमन सिंह का भविष्य

सुरेश महापात्र।

छत्तीसगढ़ में हाल ही में हुए मंत्रिमंडल विस्तार ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की राजनीतिक रणनीति को एक बार फिर स्पष्ट कर दिया है। यह विस्तार न केवल क्षेत्रीय और जातिगत संतुलन को मजबूत करने की कवायद है, बल्कि यह भी संदेश देता है कि पार्टी अब अपनी दूसरी पंक्ति के नेतृत्व को आगे बढ़ाने पर केंद्रित है।

इस प्रक्रिया में नए चेहरों को मौका दिया गया है, लेकिन पुराने दिग्गजों को मंत्रिमंडल में शामिल न किए जाने से कई सवाल उठ रहे हैं। खास तौर पर, अब तीन बार के मुख्यमंत्री और वर्तमान विधानसभा अध्यक्ष डा. रमन सिंह के भविष्य को लेकर अटकलों का बाजार गर्म है।

डा. रमन सिंह, जो छत्तीसगढ़ में भाजपा के सबसे सीनियर और प्रभावशाली चेहरों में से एक हैं, ने अपने लंबे राजनीतिक करियर में न केवल राज्य में पार्टी को मजबूत किया, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी पहचान बनाई। उनके नेतृत्व में भाजपा ने 2003 से 2018 तक लगातार 15 साल तक छत्तीसगढ़ में शासन किया।

विधानसभा अध्यक्ष के रूप में उनकी भूमिका को देखकर लगता है कि वह एक बुजुर्ग की तरह पार्टी और विधानसभा को संभाल रहे हैं। लेकिन मंत्रिमंडल विस्तार से ठीक पहले उनकी दिल्ली यात्रा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा से मुलाकात ने उनके भविष्य को लेकर कई कयासों को जन्म दिया है।

क्या यह मुलाकात केवल नए विधानसभा भवन के उद्घाटन के लिए निमंत्रण तक सीमित थी, या इसमें उनके भविष्य की राह पर कोई गंभीर चर्चा हुई? उनकी बॉडी लैंग्वेज और तस्वीरों से जो संकेत मिल रहे हैं, वे इस ओर इशारा करते हैं कि शायद उन्हें उनकी अगली भूमिका के बारे में संकेत दे दिए गए हैं।

एक संभावना यह जताई जा रही है कि 2028 के विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा नेतृत्व डा. रमन सिंह को किसी राज्य का राज्यपाल नियुक्त कर उनके सक्रिय राजनीतिक करियर को सम्मानजनक विराम दे सकता है।

यह भाजपा की उस रणनीति का हिस्सा हो सकता है, जिसमें वरिष्ठ नेताओं को सम्मान के साथ नई जिम्मेदारियां सौंपी जाती हैं, ताकि नई पीढ़ी को नेतृत्व का मौका मिले। हालांकि, यह कदम छत्तीसगढ़ में भाजपा के लिए जोखिम भरा भी हो सकता है, क्योंकि डा. रमन सिंह की स्वीकार्यता और अनुभव अभी भी पार्टी के लिए महत्वपूर्ण हैं।

इसके साथ ही, यदि डा. रमन सिंह को भविष्य में विधानसभा अध्यक्ष की भूमिका से हटाया जाता है, तो सवाल यह उठता है कि उनकी जगह कौन ले सकता है? छत्तीसगढ़ में भाजपा के पास कई वरिष्ठ नेता हैं, जैसे बृजमोहन अग्रवाल, अमर अग्रवाल, या अजय चंद्राकर, लेकिन हाल के मंत्रिमंडल विस्तार में इनमें से कुछ को शामिल न किए जाने से यह स्पष्ट है कि पार्टी क्षेत्रीय संतुलन और नए चेहरों को प्राथमिकता दे रही है।

ऐसे में विधानसभा अध्यक्ष के लिए एक ऐसे नेता की तलाश होगी, जो न केवल अनुभवी हो, बल्कि सभी वर्गों और क्षेत्रों में स्वीकार्य हो। संभवतः सरगुजा या बिलासपुर जैसे क्षेत्रों से किसी वरिष्ठ नेता को यह जिम्मेदारी दी जा सकती है, ताकि क्षेत्रीय असंतुलन की आलोचना को कम किया जाए।

भाजपा की सेकेंड लाइन पॉलिटिक्स की नीति निश्चित रूप से भविष्य के लिए मजबूत नेतृत्व तैयार करने की दिशा में एक कदम है, लेकिन पुराने दिग्गजों की अनदेखी से पार्टी के भीतर असंतोष की आशंका को भी नकारा नहीं जा सकता। खासकर बस्तर जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को मंत्रिमंडल में कम प्रतिनिधित्व मिलने की आलोचना पहले से ही हो रही है। डा. रमन सिंह जैसे नेताओं का अनुभव और प्रभाव इस तरह के असंतुलन को संभालने में महत्वपूर्ण हो सकता है।

अंत में, यह कहना उचित होगा कि छत्तीसगढ़ में भाजपा की रणनीति न केवल 2028 के विधानसभा चुनाव, बल्कि उसके बाद की राजनीति को भी आकार देगी। डा. रमन सिंह का भविष्य चाहे जो हो, उनकी विरासत और योगदान छत्तीसगढ़ की राजनीति में लंबे समय तक याद किए जाएंगे।

पार्टी को अब यह सुनिश्चित करना होगा कि नई पीढ़ी के नेतृत्व को बढ़ावा देने के साथ-साथ अनुभवी नेताओं का सम्मान और उपयोग भी उचित रूप से हो, ताकि छत्तीसगढ़ में भाजपा की स्थिति और मजबूत हो सके।

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