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नक्सल प्रभावित इलाके में भ्रष्टाचार की इंतिहा… लग रहा है वन विभाग कैंपा के पैसों को निगल गया…

सुरेश महापात्र।

जरा सोचिए जिन इलाकों में पग—पग में चलने का खतरा आज भी बना हुआ है जब पूरी फोर्स पूरी ताकत के साथ माओवादियों के गढ़ में घुसकर वार कर रही है। तो आज से दो—तीन साल पहले उन इलाकों का क्या हाल रहा होगा? यह सहज समझा जा सकता है। 

इम्पेक्ट की पड़ताल में कुछ ऐसी जानकारी हासिल हुई है कि भ्रष्टाचार की इबारत को समझने में और मौका मुआयना करने में भी हालत खराब हो गई। हमने फिलहाल हांडी का एक दाना भर दबाया है। आगे यदि ईमानदार सरकार जांच करवाती है तो जंगल के भीतर फर्जी बिलों से निगले गए पैसों को सरकार हलक से निकाल सकती है।

छत्तीसगढ़ में कैंपा के मद में प्रतिवर्ष बहुत बड़ी राशि आती है। इसका काम बिगड़े वनों का सुधार करना और वनभूमि में रहने वालों को सुविधाएं मुहैया करवाना भी है। छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के अतिनक्सल प्रभावित धर्मापेंटा गांव में जब वन विभाग के एक काम की पड़ताल की गई तो पैरों तले जमीन ही खिसक गई। दरअसल सुकमा जिले में वन विभाग ने कैंपा मद से 2021—22 में स्वीकृत राशि के आधार पर 22 काम का ब्यौरा दर्ज करवाया है।

जिन इलाकों में काम बताया गया है उनमें जामजोड़ी नाला, रोकेल नाला, आमाजोड़ी नाला, जोगेरास एडजापाल नाला, भोपावाड़ा नाला, गुडुम नाला भाग 01 एवं दो, बुरकापाल नाला, भेजी नाला, मेटागुड़ा नाला, रेड़लापल्ली नाला, सोमलगुड़ा नाला, धर्मापेंटा नाला भाग 01, 02, 03 एवं चार, दुब्बाटोटा नाला भाग 01 एवं भाग दो, गुरगुंडा नाला, नेलवाड़ा नाला, उसमानी नाला, मुरतोंडा नाला शामिल है। जिसकी कुल लागत करीब साढ़े 12 करोड़ रुपए है।

इन सबमें बंड निर्माण, गेबिओन स्ट्रक्चर, लूज बोल्डर चेक डेम, मिनि परकुलेशन टेंक, पोंड, कंटोर टेंच, वाटर अबजोर्विंंग टैंक आदि काम के तहत पैसों की बुकिंग रेंज अफसरों के माध्यम से की गई है। ये रेंज अफसर किनके कहने पर किस तरह से काम किए बगैर पूरी राशि हजम कर पाए उसकी जानकारी तो वे ही बता सकते हैं।

जमीनी सच्चाई जो हमने पता की तो यह स्पष्ट हुआ कि जिन इलाकों में कोई भी अपना कदम रखने से डरता है उन इलाकों में ही वन विभाग ने काम के नाम पर भारी पैमाने पर भर्राशाही की है। बस्तर संभाग वन विभाग के लिए सोना उगलने वाली मशीन की तरह काम करता रहा है। माओवादियों के प्रभाव क्षेत्र में काम दर्ज करवाए जाते रहे हैं और इसके एवज में भारी पैमाने पर सरकारी खजाने का बंदरबांट होता रहा है। इसका साक्षात प्रमाण सुकमा वनमंडल के अंर्तगत कैम्पा के तहत किए गए कामों की रिपोर्ट में ही दर्ज है। इन कार्यों की गुणवत्ता और मौका मुआयना कर राशि की वसूली का काम भी अब सरकार को करना चाहिए।

इन सभी दर्ज कामों में से एक धर्मापेंटा में काम की तस्वीर मात्र हम आपके सामने रख रहे हैं। सबसे पहले तो यह जान लें कि धर्मापेंटा कहां है। सुकमा जिला मुख्यालय से करीब 125 किलोमीटर की दूरी पर अतिसंवेदनशील माओवादियों के कोर क्षेत्र में यह गांव पड़ता है।

यहां तक पहुंचने के लिए सबसे पहले सुकमा से दोरनापाल होकर पोलमपल्ली की राह पकड़नी होती है। यहां से शुरू हो जाता है वह इलाका जहां माओवादियों का कोर क्षेत्र है। इस इलाके में यदि काम के नाम पर पैसे की खेती वन विभाग ने की है तो निश्चित तौर पर इसका संबंध माओवादियों के साथ भी होगा। क्योंकि इन इलाकों में बना लेव्ही माओवादी संगठन शायद ही किसी भी विभाग को काम करने की मंजूरी देता हो?

इस गांव में दर्ज की गई तस्वीर को गौर से देखने से साफ पता चलता है कि जिसे तालाब का नाम देकर सरकारी पैसा निगला गया है उसे मेढ़ भी कहने में दिक्कत है। इस तरह के ना जानें कितने तालाब और कितने नालों में स्ट्रक्चर के नाम पर पैसा की खेती वन विभाग ने की है। इसका हिसाब कोई लेने—देने वाला भी नहीं है।

दरअसल जिस समय की यह तस्वीर है उस समय सुकमा वन मंडल में डीएफओ कौन थे? यह जांच का विषय होना चाहिए। यदि डीएफओ पर वित्तीय अनियमितता का मामला नहीं बनता है तो ऐसे में कैम्पा जैसी योजनाओं को लेकर यह समझ लेना चाहिए कि यह राशि केवल और केवल केंद्र सरकार वन विभाग के जमीनी अमले के लिए मुफ्तखोरी का मामला मात्र है।

इस मामले को लेकर तत्कालीन डीएफओ डा. सागर जाधव से उनका पक्ष लिया गया तो उन्होंने कहा कि उन्हें कुछ याद नहीं है। ” ये तो बहुत पुरानी बात है मैं तो फिलहाल दंतेवाड़ा में हूं। ” उल्लेखनीय है कि सुकमा वन मंडल में गोदाम से तेंदूपत्ता गायब होने के मामले में भी डा. जाधव ने कुछ इसी प्रकार का जवाब दिया था।

खैर यह मामला इससे भी ज्यादा गंभीर इसलिए है कि वनों के संरक्षण और विकास के लिए कैंपा बड़ी मात्रा में राशि व्यय करता है। इसके माध्यम से वनों के संरक्षण, विकास और वनभूमि के रहवासियों को सुविधाएं पहुंचाना होता है। कैम्पा के तहत सुकमा वन मंडल के साथ—साथ और भी वन मंडलों में किए गए कामों की पड़ताल फिलहाल जारी है। तह से सतह तक की पूरी सच्चाई इम्पेक्ट के माध्यम से पहुंचाई जाएगी।

एक बात और यह भी है कि माओवाद प्रभावित इलाका होने के कारण अतिसंवेदनशील इस क्षेत्र में जमीन स्तर पर विभागीय जांच की प्रक्रिया भी पूरी नहीं हो पाई। इससे पहले बस्तर जिले में इस दौरान कैम्पा मद में गड़बड़ी के मामले पर बड़ी कार्रवाई की गई थी। उस समय मामला यह था कि बस्तर वनमंडल में कैम्पा मद में एक बड़े घोटाले का पर्दाफाश हुआ। यहां एक करोड़ तीस लाख रुपये के फर्जी बिलों का समायोजन कर गबन कर लिया गया था। जांच रिपोर्ट आने के बाद डीएफओ के वित्तीय अधिकार छीन लिए गए थे।

जांच के दौरान डीएफओ से संदेहास्पद खर्च के दौरान मासिक लेखा मंगवाये गये। मासिक लेखा के फार्म 7 एवं फार्म 14 में की गई कई प्रविष्टियां आपस मे मेल नहीं खा रहीं थी, जिसकी वजह से शक और गहरा गया। प्रारंभिक जांच में पाया गया कि बिना किसी सक्षम स्वीकृति के इतनी बड़ी राशि का खर्च किया जाना सीधे-सीधे एक बड़े घोटाले की तरफ इशारा कर रहा है। मामले की जांच में यह उजागर हुआ कि सामग्री खरीदी में भंडार क्रय नियम का पालन नही किया गया है। एक ही तिथि के अनेकों बिलों को एकजाई करते हुए 3.00 लाख से 10.00 लाख रुपये तथा उससे भी अधिक राशि के वाउचर बनाये गए हैं। पूरी राशि का 98 प्रतिशत हिस्सा एक ही फर्म को उन सामग्रियों की खरीदी के बदले भुगतान किया गया जिन सामग्रियों की वर्तमान में आवश्यकता ही नहीं थी।

जिस तरह से गंगालूर सड़क के मामले में पत्रकार मुकेश चंद्राकर की मौत के बाद सच्चाई जमीन से बाहर आई है उससे बड़ी सच्चाई वन विभाग की जांच से बाहर निकल सकती है। तेंदूपत्ता, वनोपज संग्रहण और कैम्पा के तहत किए जा रहे बहुत सारे कामों की जमीनी स्तर पर पड़ताल जरूरी है। मौजूदा दौर में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव सरकार की सुशासन वाली छवि तभी साफ हो सकेगी जब आदिवासी और मओवाद प्रभावित इलाके में वन विभाग के भ्रष्टाचार के खिलाफ कठोर कार्रवाई होगी। इसी से सरकार का रवैया स्पष्ट हो सकेगा।

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