Saturday, January 24, 2026
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‘दंगो’ से ज्यादा ‘दलों’ के एजेंडा से असुरक्षित है देश…

  • नज़रिया / सुरेश महापात्र

हिंदुस्तान में इस दौर में बड़ी बहस है कि सिटिजन अबडमैंट एक्ट CAA संसद ने पास कर दिया है और अब भाजपा का शीर्ष नेतृत्व पूरे देश में एनआरसी लागू करने की दिशा में बढ़ने की घोषणा कर चुका है।

ऐसे समय में यह विषय और भी ज्यादा गंभीर प्रतीत हो रहा है जबकि सीएए जैसा कानून पारित होने के बाद उत्तर पूर्व के सभी छह राज्य पूरी तरह से सुलगे हुए हैं। असम से लेकर पश्चिम बंगाल तक और अब दिल्ली से लेकर विभिन्न राज्यों में सिटिजन अबैडमैंट एक्ट को लेकर जबरदस्त विरोध प्रदर्शन चल रहा है।

वस्तुत: यह इस कानून को लेकर देश के अलग—अलग हिस्सों में अलग—अलग कारणों से विरोध की आवाजें उठ रही हैं। उत्तर पूर्व के राज्यों में जो विशेषकर बांग्लादेश, म्यामांर से सटे हैं वहां प्रवासी गैर नागरिकता प्राप्त शरणार्थियों को नागरिकता देने का मसला है।

वहां इनकी नागरिकता वैध होने से संबंधित क्षेत्र की सांस्कृतिक और भाषाई विरासत में प्रभाव पड़ने को लेकर आशंका बलवती हुई है। पहले से बेरोजगारी और विभिन्न समस्याओं से जुझते ऐसे इलाकों में मसला धार्मिक आधार पर नागरिकता देने से ज्यादा केवल नागरिकता दे दिए जाने को लेकर विरोध का है।

वहीं देश के विभिन्न हिस्सों में यह विरोध नागरिता देने के इस कानून में धार्मिक आधार पर भेदभाव को लेकर है। कानून के मुताबिक जिन छह धर्म के अनुयायियों का उल्लेख है उनके लिए दिसंबर 2014 से पहले यहां शरण लेने वाले नागरिकों को वैधता प्रदान करने का है। जिसमें केवल मुस्लिम धर्म के लोगों को कानून संरंक्षण प्रदान नहीं करता है।

सीएए कानून के मुताबिक भारत सरकार ने बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान में बहुसंख्यक मुस्लिम और अल्प संख्यक अन्य धर्म के विरुद्ध एक पैमाना स्थापित किया है। जिसके आधार पर यह स्पष्ट तौर पर माना है कि मुस्लिम प्रधान देशों में बहुसंख्यक मुस्लिम पीड़ित नहीं हो सकते।

विरोध इस बात का है कि भारत का संविधान इसकी अनुमति नहीं देता है कि किसी कानून को धर्म के आधार पर स्थापित किया जाए। यह विपक्ष का आरोप है। पर बात यहीं आकर खत्म नहीं होती है। हमें इसके लिए थोड़ पीछे जाकर देखना होगा जहां से इस कानून की बुनियाद रखने की नौबत आई।

2002 में गुजरात के गोधरा में हिंदु—मुस्लिम दंगे हुए। इसमें हजारों जानें गईं। वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी उस दौरान गुजरात में मुख्यमंत्री और गृहमंत्री की भूमिका में थे। इसके बाद गुजरात दंगों को लेकर पूरे देश में जमकर राजनीति हुई।

इसका नतीजा यह रहा कि 2004 में केंद्र की एनडीए की सरकार जिसके मुखिया अटल बिहारी बाजपेई थे वे सत्ता से बाहर हो गए। यूपीए की सरकार बनीं जिसमें दो पद स्थापित किए गए पहला यूपीए चेयर पर्सन जिसका दायित्व स्वयं कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी संभाल रहीं थीं और प्रधानमंत्री के पद पर उनके विश्वस्त डा. मनमोहन सिंह काबिज हुए।

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मुद्दे को लेकर भाजपा बेहद तल्ख थी। कांग्रेस के भीतर तो पहले ही विभक्ति आ गई थी। महाराष्ट्र के कद्दावर कांग्रेस नेता शरद पवार असम के दिग्गज कांग्रेस नेता पीए संगमा के साथ अलग होकर राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी की आधारशिला रखी थी। वहीं भाजपा की महिला नेताओं में सुषमा स्वराज और उमा भारती ने ऐलान किया था कि अगर सोनिया प्रधानमंत्री बनती हैं तो वे अपना सिर मुंडवा लेंगीं।

2002 के दंगों के साए में हुए लोक सभा चुनाव में अपने बेहतर कार्यकाल के बावजूद जनादेश अटल सरकार के खिलाफ गया। वे 13 दलों के सर्वमान्य नेता रहे। नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट के मुखिया भी वही थे। 2004 के लोक सभा चुनाव में किसी एक दल को बहुमत नहीं मिलने की स्थिति में यूनाईटेड प्रोग्रेसिव फ्रंट का गठन चुनाव परिणाम के बाद किया गया। जिसे यूपीए कहा गया।

इसके बाद यूपीए सरकार के मुखिया के तौर पर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का नेतृत्व ही हर मसले का समाधान रहा। सोनिया गांधी ने एनएसी (नेशनल एडवायजरी कमेटी) यानि राष्ट्रीय सलाहकार परिषद् का गठन किया। जिसमें अबुसलेह शरफ, असगर अली, इंजिनियर गगन सेठी, एचएस फुल्का, जॉन दयाल, न्यायमूर्ति होस्बेत सुरेश, कमाल फारुकी, मंज़ूर आलम, मौलाना निअज़ फारुकी, राम पुनियानी, रूपरेखा वर्मा, सौम्य उमा, शबनम हाश्मी, मारी स्कारिया, सुखदो थोरात, सैयद शहाबुद्दीन, उमा चक्रवर्ती, उपेन्द्र बक्सी को शामिल किया गया था।

2002 के दंगों साए में बनी नई केंद्रीय सरकार द्वारा पेश ‘सांप्रदायिक और लक्ष्यित हिंसा निवारण विधेयक’ को सर्वप्रथम मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार ने 2005 में लागू करने का प्रयास किया था। परन्तु भारी विरोध को देखते हुए सरकार ने इसे वापस ले लिया।

राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) ने 14 जुलाई 2010 को सांप्रदायिकता विरोधी बिल का खाका तैयार करने के लिए एक प्रारूप समिति का गठन किया था। जिसमें गोपाल सुब्रमनियम, मजा दारूवाला, नजमी वजीरी, पीआई जोसे, प्रसाद सिरिवेल्ला, तीस्ता सीताल्वाडा, उषा रामनाथन, वृंदा ग्रोवर, फराह नकवी और पूर्व आईएएस अधिकारी हर्ष मंदर शामिल थे। 28 अप्रैल 2011 की एनएसी बैठक के बाद नौ अध्यायों और 138 धाराओं में तैयार हिंदी में अनूदित किया और अभी तक की संभावित योजनाओ के अनुसार सरकार इसे 2011 में पुनः सरकार इस विधेयक को कुछ संशोधनों के साथ लायी।

राजनैतिक दल जनता पार्टी के अध्यक्ष डा. सुब्रमनियम स्वामी ने दिल्ली पुलिस में 24 अक्टूबर 2011 को एक प्रथिमिकी दर्ज करवाई जिसमे सोनिया गाँधी एवं राष्ट्रीय सलाहकार परिषद् के विरुद्ध जिसमें आरोप लगाया कि ‘सांप्रदायिक और लक्ष्यित हिंसा निवारण विधेयक बनाकर भारत के धर्मनिरपेक्ष ढांचे को क्षति पहुचाने का प्रयास किया गया है तथा हिन्दुओं और मुस्लिमों में मध्य सांप्रदायिक सौहार्द को समाप्त करने का प्रयास किया गया है।’

इस विधेयक को लेकर प्रमुख राजनैतिक दल भारतीय जनता पार्टी, शिवसेना आल इण्डिया आन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम (AIADMK) तथा तृणमूल कांग्रेस सहित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिन्दू परिषद् जैसे कई सामाजिक संगठन इस विधेयक का इस आधार पर विरोध कर रहे थे कि यह अधिनियम केवल अल्पसंख्यकों को सुरक्षा प्रदान करता है। परन्तु अल्पसंख्यकों के आक्रमण से पीड़ित बहुसंख्यकों को यह अधिनियम कोई सुरक्षा प्रदान नहीं करता है। इस प्रकार यह अधिनियम ‘मुस्लिमों के हाथों में हिन्दुओं के विरुद्ध एक शस्त्र के भांति कार्य करेगा तथा यह भारत के संघीय ढांचे के लिए हानिकारक सिद्ध होगा।’

गृह मंत्रालय अधिकारियों का कहना था कि ‘विधेयक खासतौर पर मुस्लिमों की मांग से जुड़ा है। सांप्रदायिक हिंसा (निरोधक, नियंत्रण व पीड़ितों का पुनर्वास) विधेयक, केंद्र व राज्य सरकारों और उनके अधिकारियों को सांप्रदायिक हिंसा को निष्पक्षता के साथ रोकने के लिए जिम्मेदार बनाने का दावा करता है।’

भाजपा प्रस्तावित कानून पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कह चुकी थी कि ‘यह खतरनाक और बहुसंख्यक समुदाय के खिलाफ है। यही नहीं विधेयक संविधान के संघीय ढांचे को भी क्षति पहुंचाने वाला है।’ भाजपा ने सवाल उठाया था ‘विधेयक में यह पहले ही कैसे माना जा सकता है कि हर दंगे के लिए बहुसंख्यक ही जिम्मेदार हैं।’

बिल का मकसद बताया गया कि यह – केंद्र व राज्य सरकारों और उनके अधिकारियों को सांप्रदायिक हिंसा को निष्पक्षता के साथ रोकने के लिए जिम्मेदार बनाना। बिल में केंद्र द्वारा राष्ट्रीय सांप्रदायिक सौहार्द, न्याय और क्षतिपूर्ति प्राधिकरण का गठन भी प्रस्तावित करना। इसमें हिंसा वाले राज्य के मुकदमे दूसरे राज्य में ट्रांसफर करने और गवाहों की सुरक्षा के लिए कदम उठाने का भी प्रस्ताव है।

गृह मंत्रालय और कानून मंत्रालय के अधिकारियों ने विधेयक के मसौदे में कुछ क्लॉज पर आपत्ति दर्ज कराते कहा था कि ‘इनमें सांप्रदायिक हिंसा फैलने पर नौकरशाहों की जिम्मेदारी शामिल है।’ अधिकारियों का कहना था कि ‘सामान्य ड्यूटी निभाने में ये बाधा पैदा करेगा।’

इस विधेयक के प्रस्ताव के मुताबिक ‘धार्मिक या भाषाई अल्पसंख्यक, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों को निशाना बनाकर की गई हिंसा को रोकने और कंट्रोल करने के लिए निष्पक्ष और भेदभावरहित ढंग से अधिकारों का इस्तेमाल करना केंद्र, राज्य सरकारों और उनके अधिकारियों की ड्यूटी का अनिवार्य हिस्सा होगा।’

प्रस्तावित विधेयक के विरोध में कहा गया कि ‘इसके तहत हिंदू और मुस्लिम दंगापीड़ितों के लिए अलग-अलग अदालतें बनाने की बात कही गई है ताकि हिंदू और मुस्लिम आरोपियों पर अलग- अलग मुकदमा चलाया जा सके।’ विधेयक के विरोधियों का कहना था ‘यह साम्प्रदायिक दुर्भावना और ध्रुवीकरण को वैधता प्रदान करता है।’

दंगों की जांच करने वाले न्यायिक आयोग भी मानते हैं कि अगर सरकार और पुलिस बलों में इच्छा शक्ति हो तो किसी भी दंगे को 24 घंटों के अंदर रोका जा सकता है या फिर इस पर काबू पाया जा सकता है। दंगों को होने दिया जाता है क्योंकि कभी-कभी राजनीतिज्ञ और पुलिसकर्मी भी दंगों को भड़काते हैं। इतना ही नहीं, वे दंगों में भी शामिल होते हैं, लेकिन इन्हें कोई दंड नहीं दिया जाता है।’

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में 12 दिसंबर 2013 को हुई कैबिनेट कमिटी की मीटिंग में सांप्रदायिक हिंसा रोकने के विधेयक को पुन: मंजूरी दी गई। तत्कालीन गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के जोरदार विरोध के बाद सरकार ने बिल के कुछ प्रावधानों में बदलावों को स्वीकार कर लिया। अब इसे कम्युनिटी न्यूट्रल यानी समुदायों के प्रति तटस्थ बनाया गया।

पहले प्रस्ताव था कि प्रभावित इलाके में बहुसंख्यक समुदाय को ही हिंसा का जिम्मेदार माना जाएगा। हिंसा से निपटने में विधायिका की भूमिका को भी कम कर दिया गया है। हिंसा की स्थिति में केंद्र के सीधे दखल के प्रस्ताव को नरम बना दिया गया है। अब राज्य चाहे तो हालात से निपटने के लिए सेना आदि की मांग केंद्र से कर सकेगा। इसके बावजूद यह कानून नहीं बन सका।

इसकी सबसे बड़ी वजह भारत का ‘संविधान’ है जो इसे ‘धर्मनिरपेक्ष’ स्थापित करता है। इसके अनुसार किसी तरह से धर्म के आधार पर नरम या कठोर कानून नहीं बनाया जा सकता। यह बताने का कारण यह है कि 2002 के दंगों के बाद जब—जब देश के किसी हिस्से में दंगा की खबरें सुर्खियां बनीं तो सरकार ने विधेयक लाकर देश को राजनीतिक लाभ के लिए धर्म के आधार पर बांटने का काम तो करती ही रहीं।

बस राजनीतिक दलों ने अपने एजेंडा के अनुसार बिल के प्रावधान बनाए। भारतीय जनता पार्टी की पूर्ण बहुमत सरकार है उसने अपने घोषणा पत्र में जिन तथ्यों का उल्लेख किया है वे घोषणाओं को पूरा करने की दिशा में बढ़ने का काम कर रहे हैं। पर इस तथ्य का नज़र अंदाज नहीं किया जा सकता कि हिंदुस्तान की इस सरजमीं पर किसी राजनैतिक दल के एजेंडा नहीं चल सकता। भले ही बहुमत मिल जाए पर उसे इस बात का अधिकार तो नहीं होना चाहिए कि वह संविधान की मूल भावना की अनदेखी करे।

2004 से 2014 तक दस साल यूपीए की सरकार थी। उसने कानून के तौर पर जिन प्रावधानों को लागू करने का विरोध सांप्रदाय विशेष की आड़ में किया गया। अब कमोबेश उसी तर्ज पर सीएए जैसा कानून पास हो चुका है। यदि यूपीए गलत थी तो एनडीए के प्रावधान भी संविधान सम्मत होने पर ही स्वीकार किया जाना चाहिए।

हमारे और आपके मानने से कोई कानून सही या गलत नहीं हो सकता। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट है। सरकार वहीं अपना पक्ष रखेगी और सुप्रीम कोर्ट इसे अगर संविधान सम्मत मानती है तो फिर कोई बात नहीं। रही बात उत्तर पूर्व की आशंकाओं की तो उसके लिए सरकार को उनके प्रति अपना नज़रिया स्पष्ट करना होगा उन्हें विश्वास दिलाना होगा कि कानून किसी भी तरह से उनकी आशंकाओं को पूरा नहीं होने देगा।

एनआरसी यानी राष्ट्रीय नागरिकता पंजीकरण का मसला हिंदुस्तान से अवैध शरणार्थियों को निकालने के लिए ही है तो असम में जिस तरह की खामियां उजागर हुई हैं उसके संबंध में पहले सरकार गंभीरता से अध्ययन व व्यवस्था करे। उसके बाद अगर उसे लगता है कि इसकी जरूरत है तो करना चाहिए। इसकी आड़ में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का खेल ही सबसे बड़ी समस्या है। इससे बचने के उपाय सरकार की जिम्मेदारी है।

हिंदुस्तान की आजादी के बाद सबसे बड़ी समस्या उसकी राजनीति ही दिखाई देती है। गैर कांग्रेसी पूर्ण बहुमत की सरकार काबिज होने के बाद देश के भीतर राजनैतिक दलों के ध्रुवीकरण का खेल तेज हो गया है। जिसके जद में सभी लोग हैं। देश हम सबका है। इसे किसी बहुमत और अल्पमत की सरकार संविधान के दायरे से बाहर नहीं ले जा सकती है। इसका विश्वास सभी नागरिकों को होना ही चाहिए।

राजनीतिक दल चाहे कितनी भी कोशिश कर लें दल के एजेंडा के कारण मन का विभेद देश की एकता और अखंडता को प्रभावित करेगा। पाकिस्तान हमारा दुश्मन राष्ट्र है। उसने जब अवसर मिला तब नुकसान पहुंचाने की कोशिश की है। इसी भावना ने उसे गर्त में ढकेल दिया है। हमे पाकिस्तान नहीं बनना है… हम दुनिया के सामने सबसे बड़े लोकतंत्र हैं जो संविधान के मूल्यों के आधार पर ही सम्मान हासिल करता रहा है।

इतिहास को पढ़ने और समझने की जगह बिगाड़ने का खेल भी बंद होना चाहिए। यह सभी का देश है जिसके उत्थान और पतन के लिए सभी समवेत जिम्मेदार हैं। किसी राजनीतिक दल के दंगा के एजेंडा से ना तो देश बिखर सकता है और ना ही खत्म हो सकता है।

यही वजह है हिंदुस्तान में आज़ादी के बाद ‘दंगों’ से ज्यादा राजनीतिक ‘दलों’ के एजेंडा से असुरक्षित लगता है। क्योंकि जिस वक्त जिसकी बहुमत रही उसने अपने नज़रिए से देश का राजनीतिक एजेंडा तय करने की कोशिश की। उसने अपने हिसाब से इतिहास पढ़ाने की कोशिश की। इसी का विरोध अब सतह पर आ गया है।

देश की शिक्षा और इतिहास पर राजनीतिक सत्ता का नियंत्रण भी खतरनाक है। ऐसे में यह तय करना कठिन हो जाएगा कि आज़ादी से पहले संघर्ष के मतभेद भी राजनीतिक एजेंडा के शिकार थे। पर यह मानना कठिन है कि जब देश आज़ाद ही नहीं हुआ था तो ऐसे में किस आधार पर कोई व्यक्ति अपने और अपने परिवार के लिए एजेंडा तय करता?

इतिहास के पन्ने में शामिल सभी क्रांतिकारियों का सम्मान होना चाहिए। किसने माफी मांगी और किसने झूठ बोला, किसने सत्ता के लिए फरेब किया और किसने किसे धोखा दिया… ये राजनीतिक दलों के एजेंडा हैं जिसमें गुमराह होने की दरकार नहीं है। हमें यह पता होना चाहिए कि ‘सत्ता की राजनीति के हमाम में सभी नंगे हैं…’ कोई दूध का धुला ना तो चुनाव जीत सकता है और ना ही सत्ता के शिखर तक पहुंच सकता है।

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