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तो क्या सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद बस्तर में धर्मांतरण के बाद मृत्यु पश्चात अंतिम संस्कार का मसला शांत हो जाएगा? सवाल तो बहुत हैं पर…

सुरेश महापात्र।

बस्तर में 20 दिन से मॉर्चुरी में रखे पादरी के शव को गांव से 20 किलोमीटर दूर ईसाई कब्रिस्तान में दफनाना होगा। यह फैसला सुप्रीम कोर्ट ने 2 जजों की अलग-अलग राय के बाद सुनाया है। दरअसल, मृतक पादरी के बेटे उन्हें गांव में ही दफनाना चाहते थे लेकिन गांव में इसे लेकर विवाद की स्थिति बन गई। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद क्या बस्तर समेत उन क्षेत्रों में जहां धर्मांतरण को लेकर विवाद समाप्त हो जाएगा? यह बड़ा सवाल है!

बस्तर में लगातार शव दफनाने को लेकर बवाल की स्थिति बन रही है। पूर्व कांग्रेस सरकार के दौरान नारायणपुर इलाके में हुई घटना शायद ही कोई भूला हो। तब भाजपा के जिला अध्यक्ष के साथ दर्जनभर नेताओं पर एसपी पर हमले का मामला दर्ज किया गया था।

बस्तर जिला के तोकापाल, बास्तानार, जगदलपुर, बस्तर, दरभा विकास खंडों में यह मामला लगातार सामने आ रहा है। बीते 30 दिसंबर को जगदलपुर जिले में भी ईसाई समुदाय की महिला की मौत के बाद शव दफनाने को लेकर विवाद हुआ था। बस्तर में लगातार शव दफनाने को लेकर बवाल की स्थिति बन रही है। 30 दिसंबर को जगदलपुर जिले में भी ईसाई समुदाय की महिला की मौत के बाद शव दफनाने को लेकर विवाद हुआ था।

हालिया घटना दरभा ब्लॉक के छिंदावाड़ा के पादरी सुभाष बघेल की मौत के बाद पहले हाईकोर्ट फिर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। दरअसल बीते 7 जनवरी को सुभाष बघेल की मौत हुई थी। इसके बाद से उनकी लाश जगदलपुर मेडिकल कॉलेज के मॉर्च्युरी में रखी है। उनके बेटे रमेश बघेल ने गांव में या निजी जमीन शव दफनाने के लिए हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई थी।

रमेश बघेल ने अपने पिता के अंतिम संस्कार के लिए अफसरों से सुरक्षा और मदद मांगी थी। मदद नहीं मिलने पर वे छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट पहुंचे। हाईकोर्ट ने इस पर राज्य सरकार से जवाब तलब किया। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने कहा- गांव में ईसाइयों के लिए अलग कब्रिस्तान नहीं है। अगर अंतिम संस्कार गांव से 20-25 किलोमीटर की दूरी पर किया जाए तो आपत्ति नहीं होगी।

इसके अलावा नजदीकी गांव करकापाल में ईसाइयों का अलग कब्रिस्तान है। वहां भी पादरी का शव दफनाया जा सकता है। इस पर हाईकोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया था।

इसके बाद शव दफनाने के को लेकर मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में चल रही थी। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के दो जजों के राय ही अलग-अलग आई। जस्टिस नागरत्ना का कहना है कि, शव को निजी जमीन में दफनाना चाहिए। जबकि जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा ने कहा कि, 20-25 किमी दूर ईसाई समुदाय का अलग से कब्रिस्तान है। वहां शव दफन किया जाए।

इस अंतिम आदेश में कोर्ट ने कहा कि,

अलग-अलग राय के बाद भी हालांकि दोनों जजों ने तीन जजों की बेंच के गठन के लिए मामले को नहीं भेजा। संवेदनशील मामले को देखते हुए अंतिम फैसला अनुच्छेद 142 के तहत शक्तियों का प्रयोग करते हुए जारी किया गया। अपीलकर्ता के पिता का शव पिछले तीन सप्ताह से शवगृह में रखा हुआ है ऐसे में हम तीसरे न्यायधीश की पीठ को नहीं भेजना चाहते हैं। मृतक के परिवार के लिए 20 किलोमीटर दूर स्थित कब्रिस्तान में स्थान तय किया जाए। साथ ही शव को शवगृह से ले जाने और दफनाने के लिए सभी परिवहन की व्यवस्था की जाए।

जस्टिस बी वी नागरत्ना ने कहा-

ग्राम पंचायत की तरफ से ईसाई समुदाय के लिए कोई स्थान चिन्हित नहीं किया गया है। इसलिए अपीलकर्ता के पास अंतिम विकल्प अपनी निजी भूमि है। हाईकोर्ट को ग्राम पंचायत को निर्देश देकर अपीलकर्ता की तकलीफ को समझना था। ताकि, उसकी निजी भूमि में शव दफनाने की अनुमति मिले।

जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा ने कहा-

CG पंचायत नियमों के अनुसार केवल चिन्हित स्थानों पर शव दफनाने की अनुमति दी जा सकती है। इसलिए कोई भी व्यक्ति शव दफनाने को लेकर अपनी पसंद का स्थान नहीं मांग सकता।

जानिए क्या है पूरा मामला

बस्तर जिले के दरभा ब्लॉक के छिंदावाड़ा गांव के रहने वाले पादरी सुभाष बघेल (65 साल) की 7 जनवरी 2025 को किसी बीमारी की वजह से मौत हो गई थी। इसके बाद गांव में उनके शव दफनाने को लेकर बवाल हो गया था। वहीं उनके बेटे रमेश बघेल ने शव को जगदलपुर के मेडिकल कॉलेज में मॉर्च्युरी में रखवा दिया था।

विवाद बढ़ता देख उस समय मौके पर पुलिस फोर्स समेत प्रशासन के अधिकारी भी पहुंच गए थे। इसके बाद बेटे ने अपने पिता के शव को गांव में ही दफनाने के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। लेकिन हाईकोर्ट ने उनकी याचिका को खारिज कर दिया था। जिसके बाद बेटे ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की।

हाईकोर्ट के वकील रोहित शर्मा ने बताया कि, सुप्रीम कोर्ट ने मृतक के परिजन को करकापाल के कब्रिस्तान में अंतिम संस्कार करने का निर्देश दिया है। वहीं राज्य को भी निर्देश दिया है कि, दोनों गांव में शांति बनाने के लिए उचित व्यवस्था करें।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इस फैसले के बाद बस्तर संभाग में आदिवासी और ईसाई समुदाय के बीच चल रहा विवाद शांत हो जाएगा? दरअसल यदि आप जमीन पर जाएं तो यह मामला ज्यादा गंभीर दिखाई देता है। हाल ही में कुछ गांवों से यह खबर आई कि ग्राम पंचायत के अंदर धर्मांतरित लोगों से आर्थिक संबंध तोड़ दिए जाएं! इसके लिए बकायदा गांव के गुड़ी में बैठक में फैसला लिया गया।

आदिवासी इलाकों में विशेषकर उन लोगों के बीच धर्मांतरण की प्रक्रिया तेज है जो वर्ग छुआछूत का शिकार है। कई आदिवासी समुदाय के लोगों में अनुसूचित जाति के बीच छुआछूत को लेकर बड़ा फासला है। ऐसे में अनुसूचित जाति के कई वर्ग स्वयं को छुआछूत के दंश से बाहर करने के लिए ईसाई बनकर सम्मान हासिल करना भी चाहते हैं। पर ग्रामीण इलाकों में ऐसे परिवार पहले से ही चिन्हित हैं जिनके साथ छुआछूत का व्यवहार आम है।

इसके अलावा ईसाई पादरियों के प्रभाव में आकर आदिवासी समाज के कई परिवारों में टूट हो रही है। परिवार के सदस्य तीन हिस्सों में बंट रहे हैं एक वे जो स्वयं को केवल आदिवासी ही मानते हैं, दूसरे वे जो स्वयं को हिंदू समाज के साथ जुड़कर उनकी रीति—नीति और विधि के साथ चलते रहे हैं तीसरे वे जो धर्मांतरित होकर अपनी नई पहचान की चाहत रखते हैं।

इसमें से हिंदू धर्म के साथ जुड़कर रहने वाले आदिवासी समुदाय पर स्वयं को आदिवासी के तौर पर देखने वाला वर्ग दबाव भी बनाता रहता है कि आदिवासी समाज की एकता के लिए किसी धर्म विशेष से जुड़ाव की बजाय केवल आदिवासी के तौर पर अपनी विशिष्ट पहचान बनाई जाए।  जिन आदिवासी परिवारों में हिंदूधर्म के प्रति आस्था है उनके साथ बड़ा विवाद नहीं है। क्योंकि ऐसे परिवार किसी धार्मिक परिवर्तन मार्ग से हुए बगैर हिंदूधर्म के साथ सदियों से चले आ रहे हैं।

वहीं ईसाई धर्म में शामिल होने वाले आदिवासियों में यकायक कई तरह का परिवर्तन जमीन पर बाहर से दिखाई दे रहा है। मसलन वे ग्राम गुड़ी तक में अपनी आस्था नहीं रख रहे। बल्कि वे अपने साथियों को धर्मांरित होकर ईसाई बनने के लिए प्रेरित भी कर रहे हैं, इसके बाद रविवार को चर्च जाने का परिचलन प्रारंभ हो रहा है। कई परिवारों के धर्मांतरित होने के बाद उनके करीब ही बकायदा चर्च की स्थापना भी की जा रही है। ऐसे में विवाद ज्यादा गहरा रहा है। 

चर्च की स्थापना के बाद ग्राम गुड़ी बनाम चर्च की लड़ाई जमीन पर दिखाई दे रही है। जो परिवार आदिवासी से ईसाई धर्म को स्वीकार कर रहे हैं वे ग्राम गुड़ी के प्रसाद को भी स्वीकार नहीं करते। आदिवासी समाज का आरोप है कि ‘चर्च इसके लिए अपनी सहमति प्रदान नहीं करता है।’

एक और बात बस्तर दशहरा का पर्व जिसमें बस्तर की अराध्य देवी माता दंतेश्वरी और बस्तर राजपरिवार की प्रमुख भूमिका है। बस्तर दशहरा पर्व को बस्तर में सामाजिक समरसता का सबसे बड़ा पर्व माना जाता है। इस पर्व के आयोजन में बस्तर के हर समाज की भूमिका सदियों से रही है। इसमें अनुसूचित जनजति और अनुसूचित जाति के साथ सभी वर्गों के लिए हर तरह की जिम्मेदारी तय है पर इसमें मुस्लिम—ईसाई समुदाय के लिए कोई भूमिका कभी भी नहीं रही।

ऐसे में बस्तर के आदिवासी बहुल गांवों में आदिवासी बनाम ईसाई धर्मांतरित आदिवासी सीधे टकरा रहे हैं। आदिवासी समाज का स्पष्ट कहना है कि यदि कोई परिवार ईसाई धर्म को स्वीकार करता है तो उसके लिए सामाजिक समरसता के दरवाजे बंद हैं। ना तो उनके साथ रोटी—बेटी का संबंध रखा जाएगा और ना ही उस परिवार के साथ सुख—दुख का संबंध रखा जाएगा।

ऐसे में सबसे बड़ी समस्या उन परिवारों को हो रही है जो आदिवासी समाज की मूल सामाजिक व्यवस्था से पृथक होकर ईसाई धर्म को स्वीकार कर रहे हैं, चर्च के साथ अपना संबंध स्थापित कर रहे हैं। आदिवासी समाज में कई ऐसे वर्ग हैं। जिनमें मृत्यु के बाद जलाने और दफनाने की अपनी व्यवस्था है। जिन आदिवासी समाज में मृत्यु के बाद दफनाने की व्यवस्था है विशेषकर वहीं विवाद की ​स्थिति निर्मित हो रही है।

सुप्रीम कोर्ट की व्यवस्था के बाद यह साफ हो गया है कि संवेदनशील मामले को देखते हुए अंतिम फैसला अनुच्छेद 142 के तहत शक्तियों का प्रयोग करते हुए जारी किया गया। ‘CG पंचायत नियमों के अनुसार केवल चिन्हित स्थानों पर शव दफनाने की अनुमति दी जा सकती है। इसलिए कोई भी व्यक्ति शव दफनाने को लेकर अपनी पसंद का स्थान नहीं मांग सकता।’ यह व्यवस्था लागू होने पर उन गांवों में ईसाई धर्मांतरित आदिवासियों के लिए निश्चित तौर पर समस्या आएगी जहां ग्राम पंचायतों ने ईसाई क​ब्रिस्तान की व्यवस्था नहीं दी है।

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