‘पप्पू’ की छवि से बाहर निकलते ‘राहुल गांधी’ का नया रंग और विपक्ष की आक्रामकता
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सुरेश महापात्र।
भारतीय राजनीति के बदलते परिदृश्य में 2025 का मानसून सत्र एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में सामने आया है। कांग्रेस, जो पिछले एक दशक से अपनी खोई हुई जमीन को पुनः प्राप्त करने के लिए संघर्षरत रही है, अब एक नए जोश और रणनीति के साथ उभरती दिख रही है। इस बदलाव के केंद्र में हैं लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी, जिन्होंने अपनी पुरानी ‘पप्पू’ वाली छवि को पीछे छोड़ते हुए एक आक्रामक और तथ्यपरक नेतृत्व का परिचय दिया है। बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और ‘वोट चोरी’ के मुद्दे पर इंडिया गठबंधन की एकजुटता और संसद में ‘वोट चोर, गद्दी छोड़’ जैसे नारों ने न केवल राजनीतिक माहौल को गरमाया, बल्कि यह भी दिखाया कि विपक्ष अब पहले से कहीं अधिक मुखर और संगठित हो रहा है।
2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में करारी हार के बाद कांग्रेस और राहुल गांधी की छवि को लेकर सवाल उठते रहे हैं। सोशल मीडिया पर उनकी ‘पप्पू’ वाली छवि और बीजेपी के तंज ने उन्हें लंबे समय तक कमजोर नेतृत्व के रूप में पेश किया। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव और अब 2025 के मानसून सत्र ने राहुल गांधी के नेतृत्व में एक नया रंग दिखाया है।
बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर राहुल गांधी ने जिस तरह से चुनाव आयोग पर ‘वोट चोरी’ का आरोप लगाया, वह न केवल साहसिक था, बल्कि तथ्यों और आंकड़ों पर आधारित भी था। उनकी प्रेस कॉन्फ्रेंस में कर्नाटक की महादेवपुरा विधानसभा सीट के उदाहरण, जैसे एक ही पते पर सैकड़ों वोटरों की मौजूदगी और डुप्लिकेट वोटरों के नाम, ने इस मुद्दे को गंभीरता प्रदान की।
राहुल गांधी ने न केवल आरोप लगाए, बल्कि जनता के बीच इसे लेकर एक आंदोलन भी खड़ा किया। बिहार में उनकी ‘वोटर अधिकार यात्रा’ और ‘वोट चोर, गद्दी छोड़’ जैसे नारों ने जनता का ध्यान खींचा है। मुंगेर में भारी बारिश के बीच उनकी रैली और ‘हमें रोजगार चाहिए’ जैसे नारों ने यह दिखाया कि वे अब जनता के मुद्दों को सीधे तौर पर उठाने में सक्षम हैं। यह एक ऐसी छवि है जो न केवल उनके समर्थकों को उत्साहित कर रही है, बल्कि विपक्षी गठबंधन को भी एकजुट करने में कामयाब रही है।
राहुल गांधी के आरोपों ने चुनाव आयोग को भी बैकफुट पर ला दिया। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर राहुल गांधी से उनके आरोपों के समर्थन में हलफनामा देने या देश से माफी मांगने की मांग की। आयोग ने दावा किया कि उनके द्वारा पेश किए गए आंकड़े गलत हैं और ‘वोट चोरी’ जैसे शब्द लोकतंत्र की गरिमा को ठेस पहुंचाते हैं। हालांकि, आयोग का यह रुख विपक्ष को और आक्रामक करने का कारण बना। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने इसे न केवल चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल उठाने का मौका माना, बल्कि मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव की चर्चा तक शुरू कर दी।
बिहार में एसआईआर के तहत 65 लाख मतदाताओं के नाम हटाए जाने के मुद्दे ने इस विवाद को और हवा दी। विपक्ष का दावा है कि यह प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है और इसका मकसद दलित, पिछड़े, और अल्पसंख्यक वोटरों को मताधिकार से वंचित करना है। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मामले में हस्तक्षेप करते हुए आयोग से हटाए गए मतदाताओं की सूची और कारणों को सार्वजनिक करने का निर्देश दिया है। यह घटनाक्रम दर्शाता है कि विपक्ष अब न केवल संसद के भीतर, बल्कि सड़कों और अदालतों में भी अपनी बात को मजबूती से रख रहा है।
2024 के लोकसभा चुनाव में इंडिया गठबंधन ने बीजेपी को पूर्ण बहुमत से रोककर एक मजबूत संदेश दिया था। अब 2025 के मानसून सत्र में यह एकजुटता और साफ दिखाई दी, जब राहुल गांधी की अगुवाई में 25 विपक्षी दलों के 300 से अधिक सांसदों ने संसद से चुनाव आयोग के दफ्तर तक मार्च निकाला। अखिलेश यादव, ममता बनर्जी, शरद पवार जैसे नेताओं का समर्थन इस बात का प्रमाण है कि विपक्ष अब पहले से कहीं अधिक संगठित और आक्रामक है।
संसद के अंतिम दिन ‘वोट चोर, गद्दी छोड़’ के नारों ने बीजेपी को असहज कर दिया। यह पहली बार था जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सदन में प्रवेश पर ‘मोदी-मोदी’ के नारे नहीं गूंजे। यह दर्शाता है कि विपक्ष अब न केवल रक्षात्मक रुख अपनाने के बजाय, बल्कि आक्रामक तरीके से सत्तारूढ़ दल को चुनौती दे रहा है। बीजेपी की ओर से अनुराग ठाकुर ने राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं पर फर्जी वोटरों के जरिए जीतने का पलटवार किया, लेकिन यह जवाब विपक्ष के आंदोलन को कमजोर करने में असफल रहा।
विपक्ष की इस आक्रामकता को बीजेपी और उनके समर्थक अलोकतांत्रिक करार दे रहे हैं। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने राहुल गांधी को ‘लोकतंत्र के लिए खतरा’ तक कह दिया। लेकिन यह भी सच है कि विपक्ष का यह रुख लोकतंत्र के एक महत्वपूर्ण पहलू—संवैधानिक संस्थाओं की जवाबदेही—को रेखांकित करता है। राहुल गांधी ने बार-बार यह दोहराया कि ‘वोट चोरी’ न केवल लोकतंत्र, बल्कि संविधान पर भी हमला है।
मोदी 3.0 के दौर में विपक्ष की यह नई आक्रामकता भारतीय राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत का संकेत दे रही है। राहुल गांधी का ‘डरो मत’ का नारा अब केवल एक नारा नहीं, बल्कि एक रणनीति बन चुका है, जो विपक्ष को एकजुट करने और जनता के बीच अपनी बात पहुंचाने में कामयाब हो रहा है। कांग्रेस और इंडिया गठबंधन का ‘वोट चोर, गद्दी छोड़’ अभियान और हस्ताक्षर अभियान जैसे कदम इस बात का संकेत हैं कि विपक्ष अब केवल संसद तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि जनता के बीच जाकर इस मुद्दे को और बड़ा करेगा।
राहुल गांधी और विपक्ष की यह नई रणनीति भारतीय लोकतंत्र में एक स्वस्थ बहस को जन्म दे रही है। हालांकि, ‘वोट चोरी’ जैसे गंभीर आरोपों को साबित करने के लिए ठोस सबूतों की जरूरत है, और यह जिम्मेदारी विपक्ष पर है। दूसरी ओर, चुनाव आयोग को भी अपनी पारदर्शिता और निष्पक्षता को साबित करने के लिए और ठोस कदम उठाने होंगे। यह टकराव न केवल राजनीतिक, बल्कि लोकतंत्र की विश्वसनीयता से जुड़ा हुआ है। आने वाले दिन इस बात का फैसला करेंगे कि क्या यह आक्रामकता विपक्ष को 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव और भविष्य में मजबूत करेगी, या यह केवल एक अस्थायी उफान साबित होगा। लेकिन एक बात स्पष्ट है—राहुल गांधी और विपक्ष अब ‘डरने’ के बजाय ‘लड़ने’ के मूड में हैं, और यह भारतीय राजनीति के लिए एक नया और रोचक दौर है।
