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Monday, March 9, 2026
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Health

आयुर्वेद में अमृत है नीम

नीम के वृक्ष का हमारे जीवन में बहुत महत्व है। प्रकृति की इस महत्वपूर्ण देन नीम के वृक्ष की पत्तियां छाल, कोंपलें प्राकृतिक चिकित्सा में काम आती हैं। प्राकृतिक रूप से मनुष्य की चिकित्सा करने के लिये नीम को आयुर्वेद में सर्वगुण संपन्न वृक्ष माना गया है। नीम में शीतल कृमिनाशक, सूजन नाशक आदि गुण पाए जाते हैं। नीम की भूमिका विभिन्न रोगों में उपयोगी है। यह कुष्ठरोग, वातरोग, विषदोष, खांसी ज्वर, रूधिर दोष, टीबी, खुजली, खून साफ करना आदि दूर करने में सहायक है। प्राकृतिक चिकित्सा में इसका उपयोग प्रमेह, मधुमेह, नेत्ररोग में भी किया जाता है। नीम में साधारण रूप से कीटाणुनाशक शक्ति है। नयी कापलों का नित्य प्रति सेवन करने से शरीर स्वस्थ व प्रसन्न रहता है। नीम के तेल में मार्गसिन नामक नामक उड़नसील तत्व पाया जाता है। इस तेल की मालिश करने से गठिया व लकवा रोग में लाभ होता है। इसके बीच में 39 प्रतिशत तक एक तेल रहता है जो गहरे पीले रंग का कड़ुवा, तीखा व दुर्गंधयुक्त होता है। इस तेल में फोलिक एसिड रहता है।

नीम का उपयोग विषम ज्वर में भी किया जाता है। इसके पानी का उपयोग एनिमा व स्पंज बाथ में किया जाता है। बुखार में एक काढ़ा तैयार किया जा सकता है। ज्वर उतारने के लिये नीम के इस काढ़े को आयुर्वेदाचार्यों ने अमृत कहा है। काढ़ा तैयार करने के लिये 240 ग्राम पानी, तुलसी के दस पत्ते, काली मिर्च के दस पत्ते, नींबू एक-एक टुकड़ा, अदरक, नीम की पांच पत्तियां प्रयोग में लाई जाती हैं। सबसे पहले काली मिर्च व अदरक की पीसकर 240 ग्राम पानी में डालकर नींबू का रस व नीम की पत्तियां डालकर अच्छी तरह उबाला जाता है। पानी आधा रहने पर उसको छानकार उस काढ़े को पीकर सो जाते हैं जिससे शरीर में पसीना निकलता है। इससे बुखार, खांसी व सिरदर्द में लाभ होता है। शरीर के घाव चोट आदि ठीक हो जाते हैं।

नीम के मरहम में नीम का रस व घी समान मात्रा में मिलाकर नीम का रस छानकर केवल घी बचा रहता है और मरहम तैयार हो जाता है। महिलाओं के श्वेत प्रदर रोग में भी नीम लाभकारी है। इस रोग में नीम व बबूल की छाल का काढ़ा तैयार करके श्वेत प्रदर में उपयोग करने से अच्छा लाभ मिलता है। खुजली में नीम की गिरी नित्य खाते रहने से (धीरे-धीरे उसकी मात्रा बढ़ाते रहें) तथा नीम की कोमल पत्तियां खाने से अच्छा आराम मिलता है। नीम की सूखी पत्तियां, कपड़ों व अनाज में रखने से वे खराब नहीं होते। नीम का वृक्ष आक्सीजन भी अधिक बनाता है अतः इससे पर्यावरण शुध्द होता है। प्राकृतिक चिकित्सा व आयुर्वेद में नीम को सबसे ज्यादा महत्व दिया गया है।