नक्सल संगठन के शीर्ष विचारक मल्लोजुल्ला वेणुगोपाल उर्फ भूपति ने गढ़चिरौली पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया है. भूपति अपने साथ 60 नक्सलियों और 50 हथियारों सहित सामने आया…
आदित्य राय। न्यूज 18 के लिए। साभार।
छत्तीसगढ़ और उससे सटे हुए महाराष्ट्र के गढ़चिरौली को 31 मार्च 2026 तक नक्सलमुक्त करने का दम भरनेवाली टीम अमित शाह के लिए सबसे ज्यादा सुकून वाला दिन हैं. नक्सलियों का मुख्य प्रवक्ता अपने लिटरेचर, अपनी प्रेस रिलीज से देश दुनिया में नक्सलियों के प्रति सहानभूति जुटाता था; अभय उर्फ सोनू उर्फ भूपति उर्फ मल्लोजुल्ला वेणुगोपाल ने गढ़चिरौली पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया. अभय, नक्सल संगठन की लड़ाई को ऐसे तर्क-वितर्क देकर जनता के सामने प्रस्तुत करता कि हजारों किमी दूर बैठे नौजवान के मन में नक्सल संगठन के लिए एक सहानभूति जागती थी. उसे लगता कि नक्सली ही आदिवासियों के न्याय के लिए क्रांति की असली लड़ाई लड़ रहे हैं.
डेढ़ करोड़ का ईनामी भूपति अपने साथ अपनी टीम के 60 खूंखार नक्सलियों को भी लेकर आया है. जिन्होंने 50 हथियार भी पुलिस के सामने सरेंडर किए है. इसमें मल्लोजुला वेणुगोपाल और उसके गार्ड्स की ऑटोमैटिक एके 47 रायफलों के साथ 10 ऑटोमैटिक वेपंस भी है. ये पुलिस इतिहास में अबतक का सबसे बड़ा आत्मसमर्पण होगा जिसमें एक पोलित ब्यूरो अपने साथ इतनी बड़ी संख्या में नक्सली और हथियारों के साथ सरेंडर कर रहा है.
वेणुगोपाल के सरेंडर से नक्सल संगठन कैसे टूटा
वेणुगोपाल नक्सलियों का थिंक टैंक याने सबसे बड़े विचारकों में से एक है. संगठन में वह 1970 के दशक में आया उसने अपने जीवन के 50 वर्ष नक्सलियों की रणनीति बनाई. नक्सलियों द्वारा अपना प्रोपोगेंडा फैलाने आदिवासियों के नामपर साधना नाम का उपन्यास लिखा गया था. उसने रागों और बॉर्डर नाम के उपन्यास आदिवासियों की संस्कृति और जीवन पर लिखे. ये इस तरह लिखे गए थे कि इनमें सिर्फ नक्सलियों को आदिवासियों का हितैषी समझाया गया था. इन उपन्यासों के माध्यम से उसने शहरी क्षेत्रों और विश्वविद्यालयों के छात्रों में नक्सलियों के लिए सहानभूति खड़ी की. ये साहित्य बैन था लेकिन शहरी नक्सली इसे इन वर्गों तक पहुंचाते थे.
अभी भी कुछ बड़े नक्सली नेता सक्रिय
वेणुगोपाल में सैन्य और संगठन साधने के लिए पर्याप्त बुद्धि थी. उसके आत्मसमर्पण के बाद नक्सलियों के जंगल में मौजूद थिंक टैंक पोलित ब्यूरो में सिर्फ महासचिव देवजी, पोलित ब्यूरो मिशर बेसरा और नक्सलियों के पूर्व महासचिव और पोलित ब्यूरो गणपति बचे हैं. नक्सलियों के 9 पोलित ब्यूरो को पिछले डेढ़ वर्ष में सुरक्षाबल के जवानों ने मार गिराया है. जिनमें उनके महासचिव बसवराजु, पोलित ब्यूरो चलपती, मॉडेम बालकृष्ण, कोसा, रामचंद्र रेड्डी जैसे बड़े और एक-डेढ़ करोड़ से ज्यादा के इनामी नक्सलियों का समावेश है.
वेणुगोपाल नक्सलियों के सेंट्रल रीजनल ब्यूरो का सचिव भी था. यह रीजनल ब्यूरो छत्तीसगढ़ की सभी सीमाओं से लगे प्रदेशों और अबूझमाड़ को जोड़कर बनता है. ये नक्सलियों का अबतक का सबसे कोर जोन था कहते है अगर माओवादियों ने आत्मसमर्पण नहीं किया तो अबूझमाड़ में ही सुरक्षाबल के जवानों और नक्सलियों के बीच आखरी लड़ाई होंगी सोनू और उसकी टीम के आत्मसमर्पण से ये रीजनल ब्यूरो पूरी तरह कमजोर हुआ है और यहां बचे हुए नक्सलियों को पस्त करने में सुरक्षाबल के जवानों को बेहद आसानी होगी.
करीब 70 से 72 वर्षीय वेणुगोपाल उर्फ भूपति तेलंगाना के पेदापल्ली जिले का रहनेवाला है. नक्सल संगठन में अलग अलग नामों से जाने जानेवाले भूपति का असली नाम है मल्लोजुल्ला वेणुगोपाल. पिता का नाम वेंकटैया और दादा का नाम मल्लोजुल्ला. दादा का ये नाम इसलिए पड़ा क्योंकि दादा ने स्वतंत्रता संग्राम का युद्ध लड़ा था. दादा और पिता स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे. परिवार ब्राह्मण था लेकिन दादा ने उस वक्त के हैदराबाद प्रांत में बुनकरों की लड़ाई लड़ी थी. इसके चलते बुनकरों ने उनका नाम मल्लोजुल्ला याने कि बुनकरों के लिए लड़ने वाला, युद्ध करने वाला रख दिया. तेलुगु में मल्ल का अर्थ होता है युद्ध जुल्ला का अर्थ होता है बुनकर. वेणुगोपाल के दादा को बुनकर समुदाय ने यह मल्लोजुल्ला यह नाम दिया था. उनका वास्तविक नाम कुछ और था लेकिन यही उनके पूरे कुनबे की पहचान बन गया. वेणुगोपाल के पिता वेंकटेय्या पेशे से शिक्षक थे. वह परिवार जिसने आजादी की लड़ाई में योगदान दिया. उसके 2 बेटे भारत में लगी इमरजेंसी के दौरान नक्सली बन गए.
वेणुगोपाल और भाई किशनजी की पत्नी ने वेणुगोपाल के कहने पर साथ में किया सरेंडर
वेणुगोपाल के बड़े भाई किशनजी उर्फ रामजी उर्फ मल्लोजुल्ला कोटेश्वर का एनकाउंटर 2011 में पश्चिम बंगाल पुलिस ने किया था वो माओवादियों के पश्चिम बंगाल के सबसे बड़े नेता थे. 5 महीने पहले वेणुगोपाल के कहने पर किशनजी की पत्नी और वेणुगोपाल की पत्नी तारक्का ने गढ़चिरौली पुलिस के सामने आत्मसमर्पण किया था.
वेणुगोपाल आत्मसमर्पण के पक्ष में था इसलिए…
मई 2025 में नक्सलियों के सेंट्रल कमेटी मेंबर नम्बाला केशव उर्फ बसवराजु के एनकाउंटर में मारे जाने के बाद वेणुगोपाल को योग्यता के आधार पर नक्सलियों का महासचिव बनाया जाना था. लेकिन वेणुगोपाल अमित शाह के नक्सलमुक्त छत्तीसगढ़ अभियान के तहत सुरक्षाबल के लगातार नक्सलियों पर बढ़ते दबाव और एनकाउंटर में लगातार मारे जा रहे नक्सलियों के चलते आत्मसमर्पण के पक्ष में थे. बसवराजू के जिंदा रहते हुए उन्होंने बसवराजु से भी आत्मसमर्पण को लेकर बात की थी.
छत्तीसगढ़ को 2026 तक नक्सलमुक्त करने केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने विशेष टीम बनाई है. इसी टीम के एक विश्वसनीय सूत्र के अनुसार वेणुगोपाल ने दिल्ली के एक बड़े अधिकारी को पत्र भेजकर समर्पण की बात कही थी. पत्र में वेणुगोपाल ने यह भी लिखा था कि वे पूरे संगठन के समर्पण के पक्ष में है लेकिन संगठन के कुछ पोलित ब्यूरो इसके पक्ष में नहीं है. वे आदिवासियों को लड़ाई में झोंकना चाहते है. जब अंत में कोई रास्ता नहीं होगा तब वे खुद समर्पण कर देंगे लेकिन तब तक कई आदिवासियों की जान जा चुकी होगी.
क्या था वेणुगोपाल का आत्मसमर्पण को लेकर पत्र जिसका महासचिव ने किया था विरोध
15 सितंबर को वेणुगोपाल ने नक्सलियों के मुख्य प्रवक्ता अभय के नाम से एक पत्र जारी किया था. जिसमें उसने यह बताया था कि अब देश की परिस्थिति बदल चुकी है. नक्सल आंदोलन जिन परिस्थितियों में शुरू हुआ था अब उसकी जरूरत नहीं है और माओवादी अब सक्रिय राजनीति में आकर देश की सरकार के कंधे से कंधा मिलाकर लड़ना चाहते है. वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के कहने पर सरकार के समक्ष हथियार डालकर आत्मसमर्पण करने तैयार है. इस पत्र को 15 अगस्त को ही जारी किया जाना था लेकिन कुछ माओवादी इसका विरोध कर रहे थे. जिसके चलते पत्र 1 माह बाद वेणुगोपाल ने जारी किया लेकिन पत्र में तारीख वही रह गई. इस पत्र के आने के कुछ ही दिनों बाद माओवादियों के महासचिव देवजी ने एक पत्र जारी किया जिसमें उसने वेणुगोपाल के आत्मसमर्पण के पत्र को माओवादी विचारधारा के खिलाफ बताया इसे वेणुगोपाल के निजी विचार बताया.
क्या वेणुगोपाल की हत्या करने वाले थे माओवादी
पांच महीने पहले वेणुगोपाल की पत्नी के सरेंडर के बाद से माओवादियों की सेंट्रल कमेटी में यह चर्चा शुरू हो गई थी कि वेणुगोपाल खुद भी आत्मसमर्पण कर सकते है. इसके चलते वेणुगोपाल उर्फ सोनू की जान को उन्हीं के साथियों से जान का खतरा हो गया था. बसवराजु के मरने के बाद गणपति का स्वास्थ्य कारणों से महासचिव नहीं बनना तय था. इसके बाद संगठन में सबसे सीनियर नेता वेणुगोपाल ही थे लेकिन पार्टी ने उनसे जूनियर देवजी को महासचिव बनाया. बताया जाता है कि शहरी क्षेत्रों में मौजूद नक्सलियों के पोलित ब्यूरो और जंगल में मौजूद पोलित ब्यूरो ने आत्मसमर्पण के तरफ झुकने की वजह से वेणुगोपाल को महासचिव नहीं बनाया. वहींं, उनकी हत्या भी की जा सकती थी लेकिन वेणुगोपाल पिछले कुछ महीनों से अपनी टीम के साथ नक्सलियों के अन्य दस्ते से अलग-थलग रह रहे थे.
