मध्यप्रदेश अन्तर्राष्ट्रीय सूरजकुंड शिल्प मेले में बना थीम स्टेट
भोपाल
मध्यप्रदेश, हरियाणा के पर्यटन विभाग द्वारा 7 फरवरी से 23 फरवरी, 2025 तक आयोजित किए जा रहे अंतर्राष्ट्रीय सूरजकुंड शिल्प मेला में थीम राज्य है। इस अवसर पर मध्यप्रदेश शासन, संस्कृति एवं पर्यटन विभाग के संयोजन से मेले में आने वाले देश-विदेश के सैलानियों को मध्यप्रदेश की संस्कृति, पर्यटन, कला, शिल्प देखने और पारंपरिक व्यंजनों का आनंद लेने का अवसर मिलेगा।
अन्तर्राष्ट्रीय सूरजकुंड शिल्प मेले में मध्यप्रदेश की ओर से सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के अंतर्गत लोक नृत्य-संगीत का प्रदर्शन होगा। इसमें भगोरिया, गणगौर, मटकी, गुदुमबाजा, काठी, करमा, भड़म, बरेदी, बधाई-नौरता, अहिराई इत्यादि लोक नृत्यों की प्रस्तुति होगी। मध्यप्रदेश की समृद्ध लोक संस्कृति को मेले के सैलानी देख सकेंगे। मेले में 17 फरवरी को नाटक बैजू बावरा और नृत्य नाटिका वीरांगना रानी दुर्गावती की विशेष प्रस्तुतियां भी होंगी।
सूरजकुंड शिल्प मेला में मध्यप्रदेश के 40 शिल्पकारों के पारंपरिक शिल्प प्रदर्शन सह विक्रय के लिए उपलब्ध होंगे। इन शिल्पों में चंदेरी, महेश्वरी साड़ी एवं बाग प्रिंट, दरी-चादर, अजरक प्रिंट, घास की पत्ती से बने शिल्प, गोंड पेंटिंग, ढोकरा शिल्प, जूट, मिट्टी शिल्प, कढ़ाई एवं छपाई, भीली गुड़िया, छापा कला, नाँदना प्रिंट, लौह शिल्प, गोबर शिल्प, कशीदाकारी, खरद शिल्प, खादी और कॉटन, ब्लॉक प्रिंट इत्यादि शामिल हैं।
मध्यप्रदेश पर्यटन विभाग द्वारा मेला परिसर में विशेष मंडप भी बनाया गया है, जहां प्रदेश के पर्यटन के बारे में विस्तृत जानकारी पर्यटकों को दी जा सकेगी। पर्यटक जान सकेंगे कि वे कैसे मध्यप्रदेश के पर्यटन स्थलों का भ्रमण कर सकते हैं। साथ ही मध्यप्रदेश पर्यटन विभाग द्वारा क्या-क्या सुविधाएं पर्यटकों को दी जाती हैं। इस मंडप में पर्यटकों को मध्यप्रदेश में पर्यटन के क्षेत्र में हो रहे नवाचारों की जानकारी दी जायेगी। साथ ही बताया जायेगा कि वह किस तरह वे अपना टूर प्लान कर सकते हैं।
सूरजकुंड शिल्प मेला के बारे में
सूरजकुंड शिल्प मेला, भारत की एवं शिल्पियों की हस्तकला का 15 दिन चलने वाला मेला लोगों को ग्रामीण और लोक संस्कृति का परिचय देता है। यह मेला हरियाणा राज्य के फरीदाबाद शहर के दिल्ली के निकटवर्ती सीमा से लगे सूरजकुंड क्षेत्र में प्रतिवर्ष लगता है। यह मेला लगभग तीन दशक से आयोजित होता आ रहा है। इस मेले में हस्तशिल्पी और हथकरघा कारीगरों के अलावा विविध अंचलों की वस्त्र परंपरा, लोक कला, लोक व्यंजनों के अतिरिक्त लोक संगीत और लोक नृत्यों का भी संगम होता है।