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Tuesday, March 10, 2026
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बेटी मर चुकी, फिर भी हाथ छोड़ने को तैयार नहीं पिता, रुला रही तुर्की में भूकंप की यह तस्वीर…

इम्पैक्ट डेस्क.

तुर्की (तुर्किये) में आए 7.8 तीव्रता के विनाशकारी भूकंप और उसके बाद महसूस किए गए झटकों ने कई हजार जिंदगियां निगल लीं। बड़ी-बड़ी इमारतें ताश के पत्तों की तरह भरभरा कर ढह गईं। हजारों लोग बेघर हो गए। इन इमारतों में अभी भी बड़ी संख्या में लोगों के दबे होने की आशंका है। लोग अपनों को जिंदा देखने की उम्मीद में ढहे हुए घरों के पास बैठे हैं। तुर्की में भूकंप की कई दर्दनाक कहानियां सामने आई हैं। ऐसी ही कहानी 15 साल की बच्ची इरमाक और उसके बेबस पिता मेसूत हंसर की है।

कंक्रीट से दबा था बेटी का शरीर 

एक पिता अपनी 15 साल की बेटी का हाथ पकड़े हुए बैठा है। बेटी का शरीर इमारत के कंक्रीट से दबा है। जो दिखाई दे रहा है वह एक मात्र उसका हाथ। इरमाक के पिता मेसूत हंसर कड़ाके की ठंड में टूटी ईंटों के ढेर पर अकेले बैठे हैं। जहां वह बैठे हैं वह कभी उनका घर हुआ करता था। दुनिया से बेखबर और दु: ख से अभिभूत मेसूत हंसर की तस्वीर दर्द की बेइंतहा दास्तां को बयां कर रही है। उनकी बेटी इरमाक की मौत हो गई थी। लेकिन उन्होंने उसका हाथ छोड़ने से मना कर दिया। 

पिता ने नहीं छोड़ा बेटी का हाथ

एक रात पहले जो बच्ची घर के मुलायम बिस्तर पर सो रही थी वह अगली सुबह भी उसी बिस्तर पर थी लेकिन उठ न सकी। इरमाक के ऊपर भारी-भरकम छत का बड़ा हिस्सा गिरा हुआ था। इरमाक की सांसें दुनिया छोड़कर जा चुकी हैं मगर उसका एक हाथ अब भी छोड़ा नहीं गया। एक फोटोग्राफर ने मेसूत की कहानी को शेयर किया है। वे कहते हैं कि आंखों और चेहरे पर बिना किसी भाव के तुर्की के कहरामनमारस शहर में मेसूत कुछ बोल नहीं पा रहे थे। 

“मेरी बच्ची की तस्वीरें लो” 

कोई बचाव दल वहां नहीं था। जिंदा बचे लोग अपने प्रियजनों को खोजने के लिए मलबा हटा रहे थे। लेकिन अंकारा से घटना स्थल पर पहुंचे एएफपी के अनुभवी फोटोग्राफर एडेम अल्तान की नजरें शांत, चुपचाप रो रहे पिता पर से नहीं हट सकीं। उन्होंने अपने कैमरे को 60 मीटर (200 फीट) दूर से मेसूत हंसर की तस्वीर क्लिक की। यह एक नाजुक क्षण था। लेकिन अल्तान को दूर भगाने के बजाय पिता ने उसे अपने पास बुला लिया। हंसर ने धीमी, कांपती आवाज में पुकारते हुए कहा, “मेरी बच्ची की तस्वीरें लो।” 

पिता चाहते थे कि दुनिया उनके और उनके देश के दुखों को देखे। और ऐसा ही हुआ। एएफपी की तस्वीर फाइनेंशियल टाइम्स और वॉल स्ट्रीट जर्नल सहित दुनिया भर के प्रमुख अखबारों के पहले पन्नों पर छपी। अल्तान बताते हैं, “जब मैंने तस्वीरें लीं, तो मैं बहुत दुखी था। मैं अपने आप से दोहराता रहा, ‘कितना गहरा दर्द है यह’। मैं खुद को रोने से नहीं रोक सका। मैं अवाक था।” अल्तान ने हंसर से उसका नाम और फिर उनकी बेटी का नाम पूछा। अल्तान कहते हैं, “वह मुश्किल से बोल पा रहे थे, इसलिए मैं उनसे बहुत अधिक बात नहीं कर सका।” 

अल्तान ने बहुत ज्यादा सवाल नहीं पूछे। 40 वर्षों से फोटोग्राफी कर रहे अल्तान जानते थे कि तस्वीर तुर्की के दर्द को सही से बयां कर रही है। बाद में इस तस्वीर के वैश्विक प्रभाव ने उन्हें चौंका दिया। इसे सैकड़ों हजारों बार ऑनलाइन शेयर किया गया है। अल्तान को दुनिया भर के लोगों से समर्थन की पेशकश करने के लिए हजारों संदेश मिले हैं। मलबे में दबे लोगों की तलाश अभी भी जारी है लेकिन उनके जिंदा होने की तस्वीर समय के साथ अब धुंधली पड़ती जा रही है।