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दिव्यांग बच्चों की शिक्षा पर संकट: 15-20 वर्षों से सेवा दे रहे विशेष शिक्षकों का भविष्य अधर में, सुप्रीम कोर्ट ने राज्य को सही जानकारी देने का सख्त निर्देश दिया

इम्पेक्ट न्यूज। रायपुर।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1992 से ही दिव्यांग बच्चों की शिक्षा को विशेष प्राथमिकता दी गई थी, जिसमें इन बच्चों को समान अधिकार, संरक्षण और शिक्षा में पूर्ण भागीदारी सुनिश्चित करने का प्रावधान था। नीति में दिव्यांग बच्चों की शिक्षा के लिए विशेष शिक्षकों की नियुक्ति का स्पष्ट उल्लेख था। बाद में 2020 में नई शिक्षा नीति (एनईपी) लागू हुई, लेकिन विशेष शिक्षकों की भर्ती को लेकर आज तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।

वर्तमान में छत्तीसगढ़ में समग्र शिक्षा अभियान के तहत विकासखंड स्तर पर मात्र सीमित संख्या में विशेष शिक्षक कार्यरत हैं, जबकि दिव्यांगता की श्रेणियां बढ़कर 21 हो चुकी हैं। इनमें दृष्टिबाधिता, श्रवणबाधिता, बौद्धिक अक्षमता, सेरेब्रल पाल्सी, बधिर-अंधता और ऑटिज्म जैसी जटिल स्थितियां शामिल हैं।

इन सभी के लिए प्रशिक्षित विशेष शिक्षकों की अनिवार्यता है, लेकिन राज्य में इसकी भारी कमी है।यह स्थिति न केवल दिव्यांग बच्चों की शिक्षा को प्रभावित कर रही है, बल्कि 15-20 वर्षों से न्यूनतम मानदेय (मात्र 5,000 रुपये मासिक) पर सेवा दे रहे विशेष शिक्षकों के भविष्य पर भी गहरा संकट मंडरा रहा है। इनमें से कई शिक्षकों की आयु सीमा पूरी हो चुकी है, और वे संविलियन (नियमितीकरण) की मांग कर रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में राज्य सरकार को गलत जानकारी देने पर कड़ी चेतावनी जारी की है, जो इस मुद्दे की गंभीरता को उजागर करती है।सुप्रीम कोर्ट में राज्य की गलत जानकारी का खुलासाछत्तीसगढ़ में वर्ष 2006 से श्रवणबाधित, दृष्टिबाधित और मानसिक दिव्यांग बच्चों के लिए विशेष शिक्षकों की नियुक्ति का प्रावधान था, लेकिन बाद में इसे घटाकर प्रति विकासखंड मात्र दो पद कर दिया गया।

सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत शपथ पत्र में राज्य ने पहले 23,849 और फिर 848 विशेष शिक्षकों की नियुक्ति का दावा किया। जबकि वित्त विभाग ने केवल 100 पदों की स्वीकृति दी है, और कैबिनेट में मेरिट आधार पर शीघ्र भर्ती की प्रक्रिया को मंजूरी दी गई है। हाल ही में भर्ती के लिए गठित समिति में भी सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस की अनदेखी की गई है, जिसमें तकनीकी खामियां हैं।

राज्य ने कोर्ट को यह भी बताया कि कोई विशेष शिक्षक संविदा या मानदेय पर कार्यरत नहीं है, जबकि वास्तविकता उलट है। वर्तमान में 155 बीआरपी (समावेशी शिक्षा) और 85 विशेष शिक्षक विकासखंड स्तर पर सेवा दे रहे हैं। इस गलत जानकारी पर सुप्रीम कोर्ट ने राज्य को सख्त चेतावनी देते हुए पुनः सही शपथ पत्र प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है।

कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि यदि दोबारा गलत जानकारी दी गई, तो निर्णय कोर्ट मित्र (एमिकस क्यूरी) की रिपोर्ट के आधार पर लिया जाएगा।इस बीच, 28 अक्टूबर को आरसीई प्रशिक्षित शिक्षक संघ ने लोक शिक्षण संचालनालय को एक ज्ञापन सौंपा, जिसमें 26 अक्टूबर को जारी अंतरिम पात्रता सूची की त्रुटियों का उल्लेख करते हुए सुधार कर नई सूची जारी करने की मांग की गई। ज्ञापन में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशित तकनीकी बिंदुओं का पालन कर विशेष शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया पूर्ण करने की अपील की गई है।

बच्चों की संख्या और शिक्षकों की भयावह कमीछत्तीसगढ़ के शासकीय और अनुदान प्राप्त विद्यालयों में वर्तमान में 76,926 दिव्यांग बच्चे अध्ययनरत हैं। भारत सरकार के राजपत्र के अनुसार, प्राथमिक स्तर पर 10:1 और माध्यमिक स्तर पर 15:1 का शिक्षक-बच्चा अनुपात अनिवार्य है, लेकिन राज्य में यह मानक कहीं लागू नहीं है। लर्निंग डिसेबिलिटी वाले बच्चे लगभग हर विद्यालय में मौजूद हैं, जिनके लिए विशेष शिक्षकों की तत्काल आवश्यकता है।

लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि अधिकांश विशेष शिक्षक पिछले 15-20 वर्षों से न्यूनतम मानदेय पर कार्यरत हैं, और उनके सेवा सुरक्षा व भविष्य पर अनिश्चितता का साया है।

विशेषज्ञों के सुझाव

विशेषज्ञों का मानना है कि राज्य सरकार को अब तत्काल ठोस निर्णय लेना होगा। इम्पेक्ट न्यूज के माध्यम से छत्तीसगढ़ के शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव जी को निम्नलिखित सुझाव दिए जाते हैं, ताकि विशेष शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया को पारदर्शी और त्वरित बनाया जा सके:पुराने शिक्षकों का नियमितीकरण: 15-20 वर्षों से कार्यरत विशेष शिक्षकों का स्क्रीनिंग कमेटी द्वारा योग्यता सत्यापन कर तुरंत नियमितीकरण किया जाए। इससे उनके भविष्य को सुरक्षा मिलेगी और अनुभव का लाभ बच्चों को होगा।

दिव्यांग बच्चों की शिक्षा और पुनर्वास का भार मुख्य रूप से इन समर्पित विशेष शिक्षकों की मेहनत पर टिका है। यदि इन्हें अनदेखा किया गया, तो एनईपी 2020 का समावेशी शिक्षा का आदर्श मात्र कागजों तक सीमित रह जाएगा। राज्य सरकार को चाहिए कि वह तत्काल कार्रवाई कर विशेष शिक्षकों को सम्मान, स्थायित्व और सुरक्षा प्रदान करे। यही इन मासूम बच्चों के उज्जवल भविष्य की सबसे मजबूत गारंटी होगी।

विद्यालय स्तर पर अनिवार्य नियुक्ति: प्रत्येक विद्यालय में कम से कम एक विशेष शिक्षक की नियुक्ति अनिवार्य की जाए, ताकि समावेशी शिक्षा का लक्ष्य साकार हो।

सर्वेक्षण आधारित भर्ती: दिव्यांग बच्चों की वास्तविक संख्या का व्यापक सर्वेक्षण करवाकर उसके अनुरूप शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया शुरू की जाए। सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस का कड़ाई से पालन सुनिश्चित हो।

सेवा सुरक्षा की गारंटी: वर्षों से सेवा दे रहे शिक्षकों को पेंशन, प्रमोशन और अन्य लाभ प्रदान कर उनके भविष्य की चिंता दूर की जाए। साथ ही, भर्ती समिति में तकनीकी विशेषज्ञों को शामिल कर पारदर्शिता लाई जाए।

शिक्षामंत्री से अपील की गई है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का शत-प्रतिशत पालन करते हुए विशेष शिक्षकों की भर्ती को प्राथमिकता दें। यह न केवल हजारों दिव्यांग बच्चों की शिक्षा और पुनर्वास को मजबूत करेगा, बल्कि समावेशी शिक्षा के संवैधानिक सपने को भी साकार करेगा।

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