Friday, January 23, 2026
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District bilaspurHigh Court

CG : सेठ ने सिविल से सुप्रीम कोर्ट तक लड़ी लंबी लड़ाई… 51 साल बाद हाई कोर्ट से मिला न्याय…

इंपैक्ट डेस्क.

बिलासपुर. आजादी के पहले 1941 में यूएसए द्वारा छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में खरीदी गई एक जमीन के कब्जा मामले में सन 1971 से चल रहे केस में अंततः 51 साल बाद अंतिम फ़ैसला आ ही गया. हाई कोर्ट जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास के सिंगल बेंच ने बिलासपुर एडीजे कोर्ट द्वारा सुनाए गए 1972 के फैसले को पलट दिया है. साथ ही कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है की भारत के बाहर निष्पादित मुख्तियार नामा के संबंध में अवधारणा की जा सकती है कि यदि मुख्तियार का निष्पादन धारा 14 नोटरी अधिनियम 1952, धारा 57 एवम 85 भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 व धारा 33 पंजीकरण अधिनियम अनुप्रमाणित हो जब तक पुख्ता सबूतों से खंडित न किया गया हो. इसके साथ ही हाइ कोर्ट ने कब्जा धारी को आदेशित किया है की वह खरीददार को कब्जा वापस दें.

बता दें कि आजादी से पहले सन 1943 में यूसीएमएस USA (यूनाइटेड क्रिश्चियन मिशनरी सोसाइटी) ने कुछ प्रापर्टी बिलासपुर में खरीदी थी. उसके बाद यूसीएमएस 1962 में USA वापस चली गई. जाने से पहले उसने एक लोकल बॉडी इंडियन चर्च काउंसिल ऑफ डिसाइपल्स ऑफ क्राइस्ट को एक लाइसेंस के तौर पर उपयोग करने की अनुमती दी. उसके बाद यूसीएमएम ने लगभग 40 हजार स्क्वायर फीट की प्रापर्टी को 17 सितबंर 1971 में USA से नोटराइज्ड पावर ऑफ अटॉर्नी इंडियन एम्बेसी से भेजा गया, जिसमें एक मुख्तियार के माध्यम से उस समय के बिलासपुर के नगर सेठ बनवारी लाल अग्रवाल को बेच दिया.

सिविल कोर्ट में याचिका
आईसीसीडीसी द्वारा कब्जा न दिए जाने के कारण 1972 में नगर सेठ द्वारा कब्जा पाने सिविल सूट बिलासपुर एडीजे कोर्ट में फाइल किया गया. सिविल सूट 1977 में यूसीएमएस USA को मुख्तियार के माध्यम से और मुख्तियार को संपत्ति बेंचने का अधिकार न मानते हुए एडीजे ने खारिज कर दिया. उसके बाद सेठ ने 1977 में एमपी हाइ कोर्ट में अपील की. अपील 25 सितंबर 1980 में सेठ हार गए. फिर सेठ 1980 में सुप्रीम कोर्ट गए और 27 मार्च 1991 को सुप्रीम कोर्ट ने प्रकरण को रिमांड (प्रतिप्रेसित) करते हुए दोबारा बिलासपुर एडीजे के पास भेज दिया. साथ ही सुप्रीम कोर्ट द्वारा एडीजे को निर्देशित किया गया कि अतिरिक्त साक्ष्य लेते हुए और विदेशी दस्तावेजों में मुख्तियारनामा को साक्ष्य में शामिल कर भारतीय साक्ष्य अधिनियम के प्रावधानों के तहत प्रकरण का निराकरण करें.

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