बड़ा सवाल : भ्रष्टाचार के मामले में डीईओ को कौन बचा रहा?
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शिक्षा विभाग में अधिकारियों का काम शैक्षणिक गुणवत्ता सुधार करने का होता है। ताकि शैक्षणिक सत्र में विद्यार्थियों के पठन पाठन को लेकर इस तरह से तैयारी की जाए कि शिक्षक और पाठशाला के बीच बेहतर समन्वय तैयार हो और परिणाम अच्छा आए।
शिक्षा विभाग में जिला स्तर पर निर्माण के लिए को तकनीकी विशेषज्ञ भी नहीं होता है जिससे वह निर्माण एजेंसी के तौर पर काम कर सकें। पर बस्तर तो बस्तर है। यहां हर हाल में वही काम होता है जो काम कहीं भी संभव नहीं होता है। इस समय शिक्षा विभाग में सप्लाई, ठेकेदारी को लेकर खासा विवाद है। बस्तर संभाग में तो परिस्थितियां और भी विवादित हैं।
पड़ताल में कुछ ऐसे तथ्य भी सामने आए हैं जिससे यह स्पष्ट हो रहा है कि शिक्षा विभाग ने खुद को निर्माण एजेंसी के तौर पर अधिकृत कर निर्माण कार्यों को करवा लिया। इसके बाद इसके भुगतान की प्रक्रिया भी खुद ही चलाई और खुद ही राशि निकालकर एक जेब से दूसरी जेब में ट्रांसफर कर दिया।
सबसे अजीब बात तो यह है कि सरकार के द्वारा भंडार क्रय नियम 2002 का भी पालन नहीं किया गया। यदि बात निर्माण की है तो इसके लिए विधिवत टेंडर की प्रक्रिया को पूरा करना था इस प्रक्रिया को भी पूरा नहीं किया गया।
ऐसे कुछ कार्यों की सूची के अनुसार डीईओ ने खुद फाइल चलाई और कलेक्टर से शिक्षा विभाग को एजेंसी बनाने के लिए अनुमोदन ले लिया और इसके बाद बिना टेंडर की प्रक्रिया का पालन किए निर्माण करवा लिया। संभव है इसके लिए गोपनीय टेंडर के माध्यम से प्रक्रिया को पूरा करने का दिखावा किया गया हो। जैसा कि दंतेवाड़ा जिले में दो अफसरों के विरूद्ध जांच में यह पाया गया। जिसकी एफआईआर भी दर्ज करवाई गई और दोनों अफसर इस समय जमानत पर बाहर हैं।
दरअसल यह मामला समग्र शिक्षा के द्वारा जारी की गई राशि के निर्माण से संबंधित है। वहीं यदि मामला बीजापुर जिले में डीएमएफ की राशि से निर्माण और सप्लाई की जांच करवाई जाए तो और भी खुलासे संभव है। उल्लेखनीय है कि बीजापुर जिले के तत्कालीन एक डीईओ को सूखा अनाज मामले में निलंबित किया गया था। इस मामले की जांच के आदेश भी दिए गए थे।
यह मामला कोविड काल में बिना टेंडर घोटाले से जुड़ा था। इस मामले को जब सत्ता पक्ष के वरिष्ठ विधायक अजय चंद्राकर ने विधानसभा में पूरजोर तरीके से उठाया तो तत्कालीन शिक्षा मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने विधानसभा के भीतर चार डीईओ को निलंबित करने और जांच की घोषणा की थी। इसके बाद जब विधायक अजय चंद्राकर ने निलंबित किए जाने वाले डीईओ के नाम को लेकर जानकारी मांगी तो तत्कालीन शिक्षा मंत्री श्री अग्रवाल ने चारों डीईओ के नाम की घोषणा की थी। इस निलंबित डीईओ की सूची में बीजापुर के तत्कालीन डीईओ का नाम भी शामिल था।
सूखा राशन घोटाले का यह मामला कांग्रेस कार्यकाल का था तो यह साफ था कि कांग्रेस के कार्यकाल में शिक्षा विभाग के जिला प्रमुख द्वारा किए गए घोटाले के विरुद्ध वर्तमान भाजपा सरकार ने कार्रवाई की थी। मजेदार बात तो यह है कि मंत्री की घोषणा के बाद जैसे—तैसे निलंबन का आदेश पहुंचा और तीन माह पूरा होने तक किसी भी डीईओ को आरोपपत्र तक जारी नहीं किया गया।
इससे दो बातें साफ हो गईं कि संबंधित अधिकारियों ने जानबूझकर निलंबन की अवधि में आरोप पत्र जारी किया ही नहींं ताकि निलंबित अधिकारी स्वत: बहाल हो जाएं। इससे एक बात और स्पष्ट हुई कि कांग्रेस के कार्यकाल में जिस मामले को लेकर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए गए वे भ्रामक सिद्ध हुए। जरा सोचिए कि आखिर ऐसे संवेदनशील मामले में आरोपपत्र जारी नहीं किए जाने के पीछे किस तरह का प्रयास और प्रयोग था जिससे वर्तमान सरकार की छवि पर ही बुरा प्रभाव पड़ जाए।
छोड़िए इस बात को अब यह नई जानकारी भी कांग्रेस के दौर में शिक्षा विभाग के भीतर निर्माण कार्य को लेकर भ्रष्टाचार से जुड़ा है। दरअसल जिस दौर में इस तरह की गंभीर व आपराधिक वित्तीय अनियमितता बरती गई वह दौर भी कांग्रेस का ही था। तब बीजापुर विधायक विक्रम मंडावी संसदीय सचिव थे। सो यह स्पष्ट ही है कि इस अनियमितता में उनकी अनभिज्ञता मायने नहीं रखती है।
ऐसे निर्माण कार्यों की लंबी फेहरिस्त है जिसमें भंडार क्रय नियमों की अनदेखी की गई है और शिक्षा विभाग ने बतौर निर्माण एजेंसी ना केवल निर्माण कार्यों को पूरा करवाया बल्कि इसका भुगतान भी जारी कर दिया गया। यानी एजेंसी ने अपने एक खाते से राशि निकाली और दूसरे खाते में उसे वापस ले लिया।
डीईओ के तौर पर दो बार बीजापुर जिले में पदस्थ रहे। इस कार्यकाल में शिक्षा विभाग के अधीन जितने भी निर्माण कार्य हुए हैं उसकी जांच करवानी चाहिए। ताकि यह स्पष्ट हो सके कि इन निर्माण कार्यों के संपादन के लिए शासन की नियमावली का पालन किया गया है या नहीं।
