Friday, January 23, 2026
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बस्तर में टाटा संयंत्र का अधूरा सपना: डा. रमन को भले ही इसका मलाल हो पर क्या थीं वजहें?

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सुरेश महापात्र।

वर्तमान में विधानसभा अध्यक्ष डा. रमन सिंह ने मंगलवार को स्वदेशी मेला में शामिल होने के बाद जगदलपुर में स्थानीय लोगों से मुलाकात की और पत्रकारों से चर्चा की। इस दौरान उन्होंने इस बात का जिक्र किया कि लोहण्डीगुड़ा में टाटा संयंत्र नहीं लगा पाने की टीस है।

बस्तर, छत्तीसगढ़ का वो इलाका, जो हरे-भरे जंगलों और खनिजों से भरा है, हमेशा से खास रहा है। यहाँ की आदिवासी संस्कृति और प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ नक्सलवाद की चुनौती भी है।

इस समय बस्तर में माओवादियों के खिलाफ अंतिम लड़ाई की घोषणा पर क्रियान्वयन हो रहा है। आत्मसमर्पण करो या मुठभेड़ में मारे जाओ के नारे के साथ फोर्स का आपरेशन, बस्तर के माओवाद प्रभावित इलाको में चल रहा है। बस्तर में माओवादियों की सशस्त्र हिंसा के खिलाफ अं​31 मार्च 2026 इसकी अंतिम तारिख भी तय कर दी गई है।

2005 में जब टाटा स्टील ने लोहंडीगुड़ा में स्टील प्लांट लगाने का समझौता किया, तो लगा कि बस्तर की तकदीर बदल जाएगी। प्लांट से नौकरियाँ, सड़कें, स्कूल, अस्पताल—सब कुछ आने की उम्मीद थी। लेकिन 13 साल बाद ये सपना टूट गया। 2018 में अधिग्रहित जमीन किसानों को वापस कर दी गई।

एक पत्रकार के तौर पर, जो 30 साल से बस्तर की मिट्टी और नक्सलवाद की सच्चाई को देख रहा है, मैं इस विफलता को कुछ इस तरह समझता हूँ। आज से बीस साल पहले 2005 में रमन सिंह की सरकार ने टाटा के साथ 19,500 करोड़ का समझौता किया। बस्तर में लौह अयस्क की खदानें थीं, जो स्टील प्लांट के लिए मुफीद थीं।

2006 में लोहंडीगुड़ा के 10 गाँवों से करीब 1,764 हेक्टेयर जमीन लेने की प्रक्रिया शुरू हुई। कलेक्टर गणेश शंकर मिश्रा के समय गाँवों में सभाएँ हुईं, मुआवजा बाँटा गया, लेकिन बात बनी नहीं।

उस समय नीलकंठ टेकाम जगदलपुर में एसडीएम हुआ करते थे। एक प्रकार से इस महती अभियान में उनकी बराबर की भागीदारी थी। आज बीस बरस बाद वे केशकाल विधानसभा क्षेत्र से भाजपा के विधायक ​चुने जा चुके हैं। संभवत: उन्हें भी इस बात की टीस होगी कि उनके दौर में भूमि अधिग्रहण की जटिल प्रक्रिया को पूरा करने के बावजूद टाटा का संयंत्र स्थापित नहीं हो सका।

कई किसानों ने कहा कि मुआवजा तो मिला, लेकिन स्कूल, अस्पताल, नौकरी जैसे वादे अधूरे रहे। कुछ ने जमीन देने से मना कर दिया। ये प्रक्रिया लंबी खिंचती रही, क्योंकि बस्तर का ज्यादातर इलाका जंगल है, और पेसा कानून के तहत गाँव वालों की सहमति जरूरी थी। जल्दबाजी में लिए फैसलों ने लोगों का गुस्सा बढ़ाया।

नक्सलवाद ने इस प्रोजेक्ट को और मुश्किल बना दिया। बस्तर में नक्सली 1980 के दशक से सक्रिय हैं। वो उद्योगों को ‘कॉर्पोरेट लूट’ बताकर आदिवासियों को भड़काते हैं। टाटा के प्रोजेक्ट को भी उन्होंने ऐसा ही रंग दिया।

उसी दौर 2005 में सलवा जुड़ुम शुरू हुआ—आदिवासियों का एक आंदोलन, जो नक्सलियों के खिलाफ था। टाटा समर्थकों की हत्या भी माओवादियों ने की। इसमें से एक युवा विमल सलाम जो लोहण्डीगुड़ा जनपद उपाध्यक्ष थे और महेंद्र कर्मा के करीबी भी थे। उसरीबेड़ा में इनके घर पर माओवादियों ने हमला कर उनकी हत्या कर दी।

इससे दहशत बढ़ना स्वाभाविक था। दरअसल टाटा के पक्ष में महेंद्र कर्मा भी थे। वे बस्तर में औद्योगिक विकास के प्रारंभ से ही पक्षधर रहे। सलवा जुड़ूम में महेंद्र कर्मा ने आगे बढ़कर नेतृत्व भी किया।

रमन सिंह ने इसे समर्थन दिया और हजारों आदिवासी युवाओं को स्पेशल पुलिस ऑफिसर (एसपीओ) बनाया। लेकिन ये कदम उल्टा पड़ गया। 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने इसे गैरकानूनी ठहराया।

सलवा जुड़ुम से गाँव बँट गए, लोग एक-दूसरे के खिलाफ हो गए। नक्सलियों ने जवाबी हमले किए। इसके बाद बस्तर में माओवादियों के ताब​ड़तोड़ हमलों और हत्याओं से सरकार के भीतर बेचैनी बढ़ गई थी। 2005 से 2011 तक सैकड़ों लोग मारे गए—422 नक्सली, 1,019 ग्रामीण और 726 सुरक्षाकर्मी। 2013 का झीरम घाटी हमला, जिसमें 30 लोग मारे गए, इसका सबसे खौफनाक उदाहरण है।

यह भी बड़ा सवाल था कि इस माहौल में टाटा का प्रोजेक्ट कैसे चलता? नक्सलियों ने मजदूरों को धमकाया, निर्माण स्थलों पर हमले किए। जमीन का मसला भी अटक गया—2,500 हेक्टेयर खनन पट्टे को पर्यावरण मंजूरी नहीं मिली।

2016 में टाटा ने हार मान ली। रमन सिंह ने 2018 के चुनाव से पहले प्रोजेक्ट शुरू करने का जोखिम नहीं लिया। लेकिन उनकी सावधानी भी काम न आई—भाजपा बस्तर में हार गई। फिर कांग्रेस की सरकार ने वादे के मुताबिक जमीन किसानों को लौटा दी।

ये फैसला अपने आप में बड़ा था, क्योंकि सिंगुर या भट्टा-पर्सौल जैसे मामलों में ऐसा कम ही हुआ। लेकिन इस विफलता को सिर्फ नक्सलवाद या राजनीति की नाकामी कहना गलत होगा। असल में, विकास का जो तरीका अपनाया गया, वो बस्तर की हकीकत से दूर था।

यहाँ के आदिवासी—गोंड, मुरिया, हल्बा—जंगल पर निर्भर हैं। महुआ, तेंदू पत्ता, कोदो-कुटकी उनकी जिंदगी का आधार हैं। स्टील प्लांट से नौकरियाँ तो मिलतीं, लेकिन ज्यादातर मजदूरी। जंगल कटते, पानी गंदा होता। आदिवासियों की सहमति लिए बिना, उनके हक (फॉरेस्ट राइट्स एक्ट) की अनदेखी करके प्रोजेक्ट चलाना मुश्किल था।

नक्सलियों ने इस गुस्से को हवा दी। सलवा जुड़ुम जैसे कदमों ने हिंसा को और बढ़ाया। 30 साल के अनुभव से मैं कह सकता हूँ कि बस्तर में बंदूक से नहीं, बातचीत से रास्ता निकलेगा।

नक्सली भी आदिवासियों का शोषण करते हैं, लेकिन सरकार की लापरवाही ने उन्हें ताकत दी।

आज, 2025 में, बस्तर में कुछ बदलाव दिख रहा है। विष्णु देव साय की सरकार नई औद्योगिक नीति लाई है। बस्तर को खास तरजीह दी गई है—88% ब्लॉक को ज्यादा सब्सिडी, पर्यटन को बढ़ावा, नक्सलियों के सरेंडर पर वेतन सब्सिडी।

अमित शाह कहते हैं कि नक्सलवाद ही बस्तर की तरक्की में रुकावट है। लेकिन टाटा की विफलता का सबक यही है कि उद्योग लगाने से पहले आदिवासियों की सहमति, बेहतर पुनर्वास और बुनियादी जरूरतें—स्कूल, अस्पताल, नौकरी—पहले पूरी करनी होंगी।

रमन सिंह को आज भी टाटा प्रोजेक्ट की नाकामी का मलाल है। लेकिन बस्तर का भविष्य तभी बदलेगा, जब हम यहाँ की मिट्टी, लोगों और उनकी जरूरतों को समझेंगे। अगर ये सबक सीख लिया, तो बस्तर सचमुच छत्तीसगढ़ का ‘ताज’ बन सकता है। वरना, ऐसे सपने फिर टूटेंगे।

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