प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चीन यात्रा, वैश्विक चुनौतियां और आत्मनिर्भरता की राह…
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सुरेश महापात्र
आज भारत दुनिया में तेजी से अपनी जगह बना रहा है। G20, BRICS और क्वाड जैसे मंचों पर भारत की सक्रियता और आर्थिक तरक्की इसे एक बड़ा खिलाड़ी बनाती है। लेकिन बड़ी ताकतें जैसे अमेरिका, चीन और रूस अक्सर भारत को दूसरी प्राथमिकता देती हैं। अमेरिका और चीन पहले पाकिस्तान को तवज्जो देते हैं, और रूस अब चीन की तरफ ज्यादा झुका है। ऐसे में भारत के सामने मौका भी है और चुनौती भी।
पहले अमेरिका ने आतंकवाद और अफगानिस्तान की वजह से पाकिस्तान को अहमियत दी। हाल के सालों में भारत के साथ उसकी दोस्ती बढ़ी है, खासकर क्वाड और रक्षा सौदों के जरिए, क्योंकि भारत को चीन के खिलाफ इंडो-पैसिफिक में बड़ा साझेदार माना जाता है। लेकिन पाकिस्तान से उसके रिश्ते पूरी तरह खत्म नहीं हुए। उधर, चीन का पाकिस्तान के साथ गहरा रिश्ता है, खासकर CPEC प्रोजेक्ट के जरिए। भारत के साथ 2020 के गलवान झड़प के बाद से चीन के रिश्ते तनावपूर्ण हैं। रूस, जो भारत का पुराना दोस्त रहा है, अब यूक्रेन युद्ध और पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद चीन और पाकिस्तान की तरफ बढ़ा है, जो भारत के लिए चिंता की बात है।
पहलगाम में हुए आतंकी हमले ने भारत को कड़ा जवाब देने के लिए मजबूर किया। ऑपरेशन सिंदूर में स्वदेशी हथियारों से भारत ने पाकिस्तान के आतंकी ठिकानों को तबाह किया। लेकिन हैरानी की बात है कि इस ऑपरेशन को रोकने का ऐलान पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने किया। उन्होंने पाकिस्तानी सेना प्रमुख को डिनर पर बुलाया और दावा किया कि उन्होंने भारत-पाकिस्तान युद्ध रोका। इसके बाद अमेरिका ने भारत के सामान पर 50% टैरिफ और रूसी तेल पर 25% अतिरिक्त शुल्क लगाया, जो भारत के व्यापार के लिए नुकसानदायक है। यह दिखाता है कि भारत को बाहरी दबावों के बीच अपनी नीति को मजबूत करना होगा।
2020 के गलवान संघर्ष के बाद भारत-चीन रिश्ते खराब रहे। विपक्ष ने सरकार पर सीमा पर चीनी घुसपैठ को लेकर चुप रहने का आरोप लगाया। भारत ने टिकटॉक जैसे चीनी ऐप्स पर बैन लगाकर सख्ती दिखाई, लेकिन अब टिकटॉक की वापसी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 31 अगस्त-1 सितंबर 2025 को SCO शिखर सम्मेलन के लिए चीन यात्रा की तैयारी बताती है कि भारत रिश्तों को सुधारने की कोशिश कर रहा है। यह यात्रा, जो सात साल बाद पहली होगी, न सिर्फ SCO के लिए है, बल्कि व्यापार और शांति की दिशा में भी बड़ा कदम हो सकती है। यह अमेरिका के टैरिफ दबाव के खिलाफ भारत की स्वतंत्र नीति को दिखाता है।
भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव की वजह से 2013 से द्विपक्षीय क्रिकेट रुका हुआ है। हाल ही में सीनियर क्रिकेट सेमीफाइनल में भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ खेलने से मना किया, लेकिन एशिया कप में दोनों के बीच मैच का रास्ता खुल गया। यह दिखाता है कि भारत दुनिया के मंच पर जिम्मेदार छवि बनाना चाहता है, लेकिन पाकिस्तान के साथ सख्ती भी बरकरार रखता है।
आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया जैसी योजनाएँ भारत को मजबूत बना रही हैं। ऑपरेशन सिंदूर में स्वदेशी हथियारों का इस्तेमाल और तेजस, अर्जुन टैंक, ब्रह्मोस जैसे हथियार भारत को विदेशी हथियारों पर निर्भरता से मुक्ति दे रहे हैं। सेमीकंडक्टर मिशन, स्टार्टअप इंडिया और इसरो की अंतरिक्ष में उपलब्धियाँ, जैसे स्पेस डॉकिंग, भारत को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में आत्मनिर्भर बना रही हैं। IMF का कहना है कि भारत जल्द ही दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है। तकनीक, शिक्षा और अनुसंधान में निवेश भारत को दुनिया में और मजबूत करेगा।
भारत की नीति है कि वह किसी एक देश या गुट के साथ पूरी तरह न बंधे, बल्कि अमेरिका, रूस, चीन जैसे देशों के साथ संतुलन बनाए। रूस जैसे पुराने दोस्तों के साथ रिश्ते और गहरे करने होंगे और चीन के साथ तनाव कम करना होगा, लेकिन अपने हितों को पहले रखकर। दक्षिण एशिया में बांग्लादेश, श्रीलंका और नेपाल जैसे पड़ोसियों के साथ दोस्ती बढ़ानी होगी। भारत की सॉफ्ट पावर—योग, आयुर्वेद और बॉलीवुड—दुनिया में उसका प्रभाव और बढ़ा सकती है।
प्रधानमंत्री की चीन यात्रा भारत को दुनिया में अपनी स्वतंत्र नीति दिखाने का मौका देगी। पहलगाम हमले और ऑपरेशन सिंदूर ने भारत की ताकत दिखाई, लेकिन ट्रंप की बयानबाजी और अमेरिका-चीन टैरिफ की लड़ाई ने चुनौतियाँ बढ़ाई हैं। आत्मनिर्भरता और संतुलित नीति से भारत न सिर्फ आर्थिक और सैन्य तौर पर मजबूत होगा, बल्कि दुनिया में अपनी सही जगह भी बनाएगा। यह वक्त है कि भारत अपनी स्वतंत्र नीति और आत्मनिर्भरता के दम पर वैश्विक ताकत बनकर उभरे।
