साठ का दशक: तब पड़ोसी राज्य आंध्र प्रदेश से बंजारे मवेशियों को लेकर बीजापुर पँहुचते थे.(यादों के झरोखे से..)

“बस्तर संभाग के वरिष्ठ पत्रकार एस करीमुद्दीन ने अपने यादों के झरोखे से बीते बस्तर की तस्वीर बताई है…  जिसे सुधि पाठकों के लिए प्रस्तुत किया गया है” 

पड़ोसी राज्य आंध्रप्रदेश इलाके में 60 की दशक में बंजारा परिवार हर साल बीजापुर अपने पालतु जानवरों के साथ आया करते थे। और बीजापुर के जंगलों में अपने जानवरों को चराया करते थे। उस समय वन विभाग का सख्त कानून था कि पालतु जानवरों को जंगल में चराने के लिए भी इजाजत लेनी पड़ती थी। बस्तर में सहज ही इजाजत मिल जाती थी परंतु आंध्रप्रदेश में पालतु जानवरों को चराने के लिए टैक्स पटाना पड़ता था। मोदकपाल गांव धीरे-धीरे बसा, हर साल 50 परिवार जानवर चराने आया करते थे। नदी का किनारा और मैदान होने के कारण बंजारे लोगों का डेरा इसी जगह डालने लगे। हर साल पांच-छै: परिवार रूक जाते थे और धीरे-धीरे वे अपनी छोपड़ी बनाने लगे, आगे चलकर यहां गांव बस गया जिसका नाम मोदकपाल पड़ा। इस गांव में बंजारे आते थे और जानवर चराते थे, बिक्री भी करते थे। इस इलाके में दूध का प्रचलन उतना नहीं था जो आज है। उस समय क्विंटलों से दूध मोदकपाल में होता था, घी बनता था और रोजाना एक कावंड़ दूध हमारे घर में लाकर देते थे। उनके पिताजी रेंजर थे, घर में मॉ इस दूध को पूरे मोहल्ले में बांट देती थी। कभी-कभी घी भी लाया करते थे। इनके एवज में जब पैसा देते थे तो लेने से इंकार करते थे। मोदकपाल का दूध और घी धीरे-धीरे जगदलपुर आने लगा और घी तो रायपुर तक जाने लगा। और यह बस्ती धीरे-धीरे दूध-घी के नाम से प्रसिद्ध हो गया।
जंगल में जब पालतु जानवर चरने जाते थे। जब शाम को वापस आते थे साथ में जंगली जानवर हिरण भी आ जाते थे। धीरे-धीरे पालतु जानवरों के लिए इन बंजारे लोगों ने नदी के पास जंगल पालने की परंपरा भी प्रारंभ की।

एस. करीमुद्दीन, लेखक बस्तर के वरिष्ठ पत्रकार है..

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