साठ का दशक: जब फ़िल्म अभिनेता शम्मी कपूर भी शिकार खेलने बीजापुर आये थे..(यादों के झरोखे से)

“बस्तर संभाग के वरिष्ठ पत्रकार एस करीमुद्दीन ने अपने यादों के झरोखे से बीते बस्तर की तस्वीर बताई है…  जिसे सुधि पाठकों के लिए प्रस्तुत किया गया है” अविभाजित बस्तर जिले में बीजापुर क्षेत्र ने जल, जंगल ,जमीन और जानवर के संदर्भ मंे देश दुनिया में अपनी अलग पहचान बनायी. यहां वन्य जीवों की बहुलता के चलते यह स्थान पूर्व काल में शिकारियों को अपनी ओर आकर्षिक करता था. 60 के दशक में इस इलाके में शिकार करने के लिए देश के साथ-साथ विदेश के भी शिकारी गर्मी के दिनों में आया करते थे. और इन इलाकों में बाघ, गवर, वन भैसा आदि जंगली जीवों की बड़ी संख्या देखकर ताज्जूब किया करते थे. हिरण तो एक-एक जगह में पचास से अधिक के समूहों में नजर आते थे. यहां आने वाले शिकारियों में जाने माने फिल्म अभिनेता शम्मी कपूर भी बीजापुर, भोपालपटन में शिकार के लिए आये थे. इसके साथ-साथ हैदराबाद के निजाम परिवार की महिलाएं भी शिकार करने हर साल आया करतीं थीं . ये आमतौर पर बाघ और चीते का शिकार किया करते थे. और अपने स्वयं के खाने के लिए हिरण का भी शिकार किया करते थे. एक हप्ते रूकने का इनका आमतौर पर समय रहता था और यह समय सीमा तत्कालीन मध्यप्रदेश के वन-अधिकारी तय करते थे. क्यांेकि शिकार के पहले उन्हें लिख कर देना पड़ता था कि कितने शिकार करेंगे और कौन-कौन से जानवरों का शिकार करेंगे आधुनिक हथियारों से लैस ये शिकारी बीजापुर, भोपालपटनम में डेरा डाले रहते थे और अपने ही वाहन से पूरे जंगल में घूमते थे. भैरमगढ़ से भोपालपटनम तक लगभग सौ किलोमीटर तक रोड़ के दोनों ओर लगातार जानवर दिखते थे. शिकारियों के पास सर्च लाईट हुआ करती थी और खूली जीप हुआ करती थी. जब वह सर्च लाईट जंगलों में दिखाते थे तब ढे़र सारे जंगली जानवरों की आंखें चमकने लगती थी. असंख्य चमकती इन आंखों की झलक मात्र से शिकारी खुश हो जाते थे क्योंकि देश में ऐसा घना जंगल और इतनी तादाद में वन्यजीव एक निश्चित दायरे के भीतर मिलना उस काल में भी कठिन ही था. इस सौ किलोमीटर की दूरी में बाघों का अलग-अलग वास स्थान रहा करता था जहां शिकारी पहुंचकर बाघ का शिकार करते थे. इसके अलावा भोपालपटनम से सैन्डरा मार्ग पर वन भैसे भी बाघ, नदी के किनारे नजर आ जाया करते थे. शिकार के उदेश्य से बस्तर आने वाले शिकारी यहां स्थानीय वन वासियों द्वारा उपयोग में लाये जाने वाले पारम्परिक हथियारों के बजाये स्वयं के हथियार का उपयोग ज्यादातर करते थे. कभी-कभी हल्के फुल्के शौकिया शिकार के लिए पारम्परिक हथियार जैसे तीनकमान का उपयोग उनके द्वारा किया जाता था.
मूझे अच्छी तरह से याद है सेन्ड्रा मार्ग पर मट्टी मारका के आगे नदी के किनारे मचान बनाकर शिकारी उस मचान पर बैठते थे और पास ही एक पालतू जानवर को बांध देते थे. बाघ पानी पीने के लिए जब शाम के समय में नदी केनारे आता था और जब उसकी नजर पालतू जानवर पर पड़ती थी तब उस पर आक्रमण हेतु आगे बढ़ता था इसी बीच शिकारी पूरी तस्वीर खिंचवाता था और उसके बाद बाघ का शिकार करता था.
निजाम परिवार की महिलाएं जब आती थीं वों भी मचान बनाकर बाघ का शिकार करती थी एक बार तारलागुड़ा मार्ग पर भद्रा काली के समीप निजाम परिवार की एक मोटी तगड़ी महिला बाघ को मारने के लिए नदी के किनारे मचान बनाकर बैठी थी जब बाघ पालतू जानवर के पास पहुंचा जब दो लोग मचान में थे अचानक मचान टूट गया और नीचे गिर गई. और वे सब बाल-बाल बचे. इसके बावजूद भी दूसरे दिन इसी जगह में मचान बनाकर पुनः बैठे और उन्होंने बाघ का शिकार किया. जितने भी शिकारी आते थे अपने साथ खानसामा तथा कुछ और लोगों को भी लेकर आते थे एक बार अमेरिका से एक शिकारी आया था जो अपने साथ फोर्ड गाड़ी लेकर आया था. इस गाड़ी की खासियत थी कि जमीन के अलावा पानी में भी चलायी जा सकती थी. इस गाड़ी के दोनों ओर नाव की चप्पूओं की तरह कुछ उपकरण लगे थे जिनकी सहायता से उक्त वाहन पानी में भी चलाया जा सकता था.
हम छोटे थे पिताजी के साथ हमने यह नजारा खुद देखा है उस जमाने में एन.एस. भील वन मण्ड़ल अधिकारी हुआ करते थे जब वह शिकारियों के साथ तारलागुड़ा पहुंचे वहां का दृष्य देखकर उनकी इच्छा हुई कि नदी के किनारे एक चक्कर लगायंे श्री भील और मेरे पिताजी और उनके साथ मैं भी था उक्त फोर्ड गाड़ी के ड्राइवर ने गाड़ी को नाव की तरह बनाकर नदी में उतारा और उक्त में वाहन में सवार हम लोग नदी का एक चक्कर लगाकर वापस उसी किनारे आये फिर उक्त वाहन को कुछ हेर-फेर करके ड्राइवर वाहन को पूर्ववत रोड़ में चलाने लगा. पिताजी के वनविभाग में होने के कारण उनके साथ अंदरूनी इलाकों में मुझे बहुत घूमने का मौका मिला मैने बहुत शिकारियों को देखा उनकी बंन्दूकंे देखी. धीरे -धीरे जानवरों से हमें जो दहशत था वह दूर होता गया. इसी प्रकार शिकारियों और शिकार के बहुत सारे किस्से है. धीरे-धीरे जब-जब यादें ताजी होती जायेगीं तब उन्हें आप सब के साथ साझा करूंगा। (एस.करीमुद्दीन, लेखक बस्तर के वरिष्ठ पत्रकार है)

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