जोगी जी के साथ जो चला गया…

दबी जुबां से…/ सुरेश महापात्र।

जोगी जी नहीं रहे…

छत्तीसगढ़ की राजनीति में अजित जोगी का मतलब सदैव चुनौती ही रहा। आखिरी बार वे जिंदगी की जंग में पराजित हो ही गए। जोगी जी की हम पत्रकारों के लिए ऐसी भूमिका रही कि छत्तीसगढ़ की राजनीति की चर्चा में यदि जोगी जी का एंगल ना हो तो पत्रकार अपढ़ स्थापित हो जाए…

वे एक ऐसे राजनेता जिसे सुनने के लिए बस्तर में बिन बुलाए भीड़ जुट जाती थी। उनके भाषण यथार्थ से परे होकर भी श्रोताओं को वास्तविकता से ऐसे बांधे रखते थे जैसे उन्हें झुठलाना संभव ना था।

बस्तर में दो चीजें जुबान पर रहती ही हैं एक इंद्रावती का पानी और दूसरा माता दंतेश्वरी का आशीर्वाद। बस्तर का विश्वास हासिल करने इन दोनों का उपयोग उन्होंने जमकर किया। बस्तर में आम सभा के दौरान पहली बार जब जोगी जी ने अपने भाषण में माता दंतेश्वरी के सपने में आने का जिक्र किया तो वहां की राजनीतिक फिज़ा ही बदल गई। सपने का जिक्र ही कुछ इस तरह से जो किया था।

वे इस जुमले का इस तरह से प्रयोग करते कि आदिशक्ति की श्रद्धा व आस्थावान आदिवासी उनकी बात पर भरोसा नहीं करने का विचार तक नहीं ला सके…

यह उनके साथ कायम एक विश्वास था कि हर चुनाव में लगता जोगी बाजी पलट देंगे। इस बार मतगणना से पहले तक कोई नहीं कह सका जोगी अपनी बाजी हार चुके हैं।

अब जोगी जी नहीं रहे। सो फिलहाल छत्तीसगढ़ की राजनीति के त्रिकोण का अंत उनके साथ ही हो गया है। राजनीतिक दल, पत्रकार और ब्यूरोक्रेट के बीच अजित जोगी राज्य गठन के बाद से हमेशा हम सबकी जुबान में रहे, विमर्श का हिस्सा रहे, चुनावी बहस का एंगल रहे पर अब नहीं रहेंगे। हर शब्द में उनकी कमी खलती रहेगी… अलविदा जोगी जी।

शिक्षा का आलोक

छत्तीसगढ़ की शिक्षा अब आगे भी आलोकित होती रहेगी। आज स्कूल शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव डा. आलोक शुक्ला की शासकीय सेवा का अंतिम दिन था। जब तक मुख्यमंत्री सचिवालय से संविदा नियुक्ति का आदेश नहीं निकला तब तक ब्यूरोक्रेट, सत्तारूढ़ पार्टी के नेता, विभागीय मंत्री तक फैसले का इंतजार करते रहे।

वजह ये नहीं थी कि किसी अफसर को पोस्ट रिटायरमेंट नियुक्ति दी जा रही है। बल्कि सत्ता के केंद्र में चल रही राजनीति का एक मजबूत मोहरा को शतरंज की बिसात पर उपयोग करने का मसला रहा… देर शाम इसका प्रभाव भी दिख गया जब नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक ने इस मामले को कोर्ट ले जाने की घोषणा की।

वैसे भी यह तो महज बोनस है असल में सरकार एक ऐसा ब्यूरोक्रेट चाहती थी जो बिना ना नुकुर यस बॉस करे… तो इनसे बेहतर फिलहाल दूसरा कोई विकल्प है भी नहीं… जिसके पास अब खोने के लिए कुछ शेष नहीं पाने के लिए पूरा आसमान है… बस विश्वास की यही कड़ी काम कर गई।

लॉक डाउन 5.0

छत्तीसगढ़ लॉक डाउन के मामले में केंद्र सरकार के उलट चलने की लगातार कोशिश कर रहा है। इस बार केंद्र की गाइड लाइन में यात्रा आवाजाही के लिए ई-पास को समाप्त कर दिया गया। लोग बेहद खुश हुए कि चलो छुटकारा मिला। पर 31 मई की शाम राज्य सरकार की ओर से ई-पास की अनिवार्यता की घोषणा ने लोगों को दुखी कर दिया है। लोग पास के चक्कर में फंसने से ज्यादा पास लेने के बाद की मुसीबत से परेशान हैं। पास लेकर पहुंचते ही आस-पड़ोस के चेहरे पर सवालिया निशान रास्ते की चैकिंग से ज्यादा चुभ रहा है।

तबादला विश्वास का…

आखिरकार प्रदेश का सबसे बड़ा प्रशासनिक फेरबदल हो ही गया। 23 कलेक्टर बदल दिए। केवल 5 बचे। बीते सप्ताह इसी कॉलम में बताया था लिस्ट फाइनल है चिड़िया बिठाते ही काम खतम। हुआ भी कुछ ऐसा ही। कई नए चेहरों को मौका मिला है। चुनौती दी है कुछ नया करके दिखाने की। जिलों में कलेक्टर पहुंचे और काम शुरू कर दिया। कोरोना के दौर में रेड से ग्रीन जोन जाने वाले कलेक्टरों को क्वारंटीन से विशेष राहत दी गई थी। वे सभी काम पर जुट गए। बैठकें ली, प्रेस से मिले और भ्रमण भी किया… सूत्र कहते हैं सरकार का विश्वास पाने इन नव पदस्थ अफसरों पर नवाचार का जबरदस्त दबाव है। यानी काम न दिखा तो पवैलियन वापस…

सीएमओ हेल्थ का जलवा

प्रदेश का कांकेर जिला राजनीतिक तौर पर बेहद महत्वपूर्ण है। यहां कांग्रेस की राजनीति का एक ध्रुव है। इसलिए यहां होने वाली हर घटना के राजनीतिक मायने खुद ब खुद निकल जाते हैं। कोरोना संकट के इस दौर में पूरी दुनिया का स्वास्थ्य विभाग मुस्तैद है। कांकेर का भी… इतना मुस्तैद कि विभाग का कर्मचारी ही कोरोना पाजिटिव होकर उपचार करता रहा। जिले के सीएमओ हैल्थ कांग्रेस नेता के करीबी हैं। सो मन मर्जी के मालिक भी हैं… अब सरकार उनसे जवाब तलब कैसे करे कि संक्रमण रोकने की जगह फैलाव का कारक बनने क्यों दिया?

और अंत में…
सीएम सचिवालय की गोपनीयता को लेकर सवाल है… उधर नोटशीट पर चिड़िया बैठती है और इधर उसकी कॉपी मार्केट में… यह सिस्टम है या उसमे छेद… बूझ नहीं पा रहे लोग…

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