कभी कई एकड़ जमीन के थे मालिक, आज ढाई डिसमिल में सिमटकर रह गयी जिंदगी…

गन और गणतंत्र के बीच शरणार्थी बनकर रह गए सैकड़ों आदिवासी बस्ती को मिला “जुडूम पारा” का तमगा

  • पी रंजन दास. बीजापुर।

बस्तर में माओवाद के खिलाफ डेढ़ दशक पहले उठी विद्रोह की चिंगारी आग की लपटों की तरह समूचे दक्षिण बस्तर में फैलने के बाद उसकी आंच ठंडी पड़ गई, लेकिन जिस माओवाद के खात्मे के लिए विद्रोह उपजा था, माओवाद पर नियंत्रण के बजाए यह समस्या और भी नासूर बन गई। गन और गणतंत्र की इस लड़ाई में अंततः हजारों आदिवासी परिवारों का अस्तित्व दो पाटो में फंसकर रह गया।

जिस अम्बेली गांव से जुडूम के नाम से मुखालफल शुरू हुई थी, अम्बेली की तरह कुटरू तथा बेदरे इलाके में दर्जनों बसाहटों में आज भी सैकड़ों आदिवासी शिविरार्थियों की तरह मुफ़लिसी में जीने मजबूर है।

5 जून 2005 को आदिवासियों द्वारा माओवादियों के खिलाफ शुरू किए गए सलवा जुडूम अभियान के बाद नक्सल प्रभाव वाले इलाकों में बसने वाले आदिवासियों को उनके गांव से उठाकर राष्ट्रीय राजमार्ग और थानों के समीप बेस कैम्पों में लाकर बसाया गया था, जिन्हें राहत शिविर का नाम दिया गया था।

वर्ष 2008 में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की याचिका पर सुप्रीप कोर्ट ने ग्यारह साल पहले सुनवाई करते हुए इस अभियान को हिंसक आंदोलन करार देते हुए इस पर रोक लगा दी थी, जिसके बाद बेस कैम्पों में आकर बसने वाले हजारों ग्रामीण सरकारी सुविधाएं ना मिलने के कारण वापस अपने-अपने गांव लौट गए।

जिला मुख्यालय से 45 किमी दूर इंद्रावती नदी के तट पर बसा गांव बेदरे भी इस आंदोलन से अछूता नहीं रहा है, क्यों कि बेदरे से दस किमी दूर बसे अम्बेली गांव से ही सलवा जुडूम की शुरूआत हुई थी।

अलग-अगल क्षेत्रों में बसाए गए लोगों के शरण स्थल को राहत शिविर का नाम दिया गया था, परंतु बेदरे ही एक ऐसा गांव है जहां लोगों के शरण स्थल को राहत शिविर नहीं बल्कि सलवा जुडूम के नाम पर जुडूम पारा का नाम दिया गया। जहां इस समय 50 से अधिक परिवार रहकर जीवन यापन कर रहे हैं।

बेदरे का यही एक पारा है जिसने आज तक सलवा जुडूम के नाम को जीवित रखा है। इंद्रावती नदी के तट पर बसा यह गांव सलवा जुडूम से पहले नक्सलियों का आधार इलाका माना जाता था, क्योंकि नदी के दूसरे छोर पर बसे अबूझमाड़ को नक्सलियों का पनाहगाह भी कहा जाता है।

शायद यही एक वजह थी कि सलवा जुडूम की आग की लपटें भी इसी इलाके से उठी थी, वह भी नक्सल हिंसा के खिलाफ शांति की मांग को लेकर ही लोगों ने इस अभियान की शुरूआत की। इस आंदोलन के बाद भाजपा शासित पिछली सरकार ने लोगों को राहत शिविरों तक लाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी।

यही नहीं बल्कि राहत षिविरों में रहने वाले सभी लोगों के सुरक्षा की जिम्मेदारी भी सरकार की ही थी। उस दौरान जहां-जहां लोगों को बसाया गया, सरकार की ओर से दो से ढाई डिसमिल जमीन मात्र उन्हें प्रदान किया गया था, परंतु मकान और छत के लिए सरकार से कोई सहायता उन्हें नहीं मिली। परिणामस्वरूप गांव, घर और जमीन-जायदाद छोड़कर आए लोगों ने जैसे-तैसे मकान तो खड़े कर लिए पर छत के नाम पर जो शीट सरकार की ओर से उन्हें प्रदान किया जाना था, उसके बदले बिचौलियों ने ग्रामीणों से पैसे एंठने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी, ऐसा ही शिविर बेदरे में बसाया गया है, जो जिले में एकमात्र ऐसा शिविर है जिसका नामकरण सलवा जुडूम के नाम पर रखते हुए जुडूम पारा रखा गया। इस दौरान इस शिविर में 50 से अधिक परिवार तथा सहायक आरक्षक व आरक्षक निवास करते हैं। जिनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी बेदरे पुलिस को सौंपी गई है।

वही दूसरी ओर बेदरे से और इस षिविर से दस किमी दूर सलवा जुडूम क ेजनक स्थल अम्बेली गांव में ना तो सुविधाएं है और ना ही कोई सुरक्षा, नतीजतन आज भी वहां के लोगां को नक्सलियों के भय के बीच जीवन यापन करने की मजबूरी है।

जुडूम पारा में बसे लोगों की मानें तो जिस सरकार ने उन्हें यहां लाकर बसाया था, उसने करीब एक साल तक राषन की व्यवस्था तो जरूर की थी, परंतु उसके बाद उन्हें पूरी तरह भूला दिया गया, उसके बाद वे वापस अपने हाल पे आ चुके थे।

इस बीच वे अपने गांव लौटकर जाना भी चाहते थे, परंतु नक्सलियों के भय के चलते वे कभी वापस गांव नहीं लौट पाए और यही रहकर किसी तरह जीवन यापन कर रहे हैं। शिविर में आने के बाद जो युवक एसपीओ बन गए थे वे आज अच्छी जिंदगी जी रहे हैं, परंतु अन्य लोग जिनके पास ना तो नौकरी है ना ही रोजगार के साधन, उनके लिए यहां जी पाना बेहद मुश्किल काम है।

सलवा जुडूम बंद होने के बाद आज भी बेदरे के जुडूम पारा की तरह ही फरसेगढ़, बासागुड़ा, आवापल्ली, भैरमगढ़, माटवाड़ा, जांगला, बीजापुर, चेरपाल और गंगालूर में भी लोग राहत शिविरों में रहकर ही जीवन यापन कर रहे हैं।

इन शिविरों में रहने वाले ग्रामीण बताते हैं कि इस समय शिविराें में ऐसे लोग ही बचे हुए हैं, जो या तो घर से बेघर हो गए हैं या फिर नक्सलियों के निशाने पर है, जबकि अधिकांश लोग अपने गांव लौटकर नए सिरे से जीवन यापन कर रहे हैं। उनका यह भी आरोप हैं कि सरकार ने उनसे शिविरों में लाने से पहले जो वायदा किया था, उसमें से एक भी पूरा नहीं हो पाया। शायद यही एक बड़ी वजह है कि सलवा जुडूम ने समय से पहले और मंजिल को पाने से पहले दम तोड़ दिया।

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